केजरी और AAP के सामने वजूद का संकट
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आम आदमी पार्टी का गढ़ दिल्ली ही अब उससे दूर है। यह पार्टी अब अपनी ही जमीन पर पकड़ बनाने के लिए जूझ रही है।
अपने नेताओं की टोली और विधायकों को दूसरी पार्टियों के प्रलोभन से बचाने के साथ पार्टी के भविष्य पर सवाल उठाने वालों से जूझने में आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल को खासी मशक्कत करनी पड़ रही है। केजरीवाल अपना राजनीतिक अस्तित्व बचाने और पार्टी को पुनर्जीवित करने की मुश्किल लड़ाई में फंसे हैं।
जिन लोगों ने अरविंद को रक्षक और दिल्ली के भविष्य की तरह पेश किया था वही अब उनसे दूर होते जा रहे हैं। खास कर दिल्ली के मध्य और निम्न मध्य वर्ग के लोग। आम आदमी के लिए ये परेशानी पैदा करने वाले संकेत हैं।
केजरीवाल के वोटरों ने ये क्या किया?
केजरीवाल के वोटर ही अब उन्हें लापता करार दे रहे हैं। नई दिल्ली के वोटरों ने तो उन्हें लापता घोषित कर खोजने वाले को ईनाम देने की घोषणा कर डाली है।
हालांकि अपने 49 दिन के शासन के दौरान भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान छेड़ने की वजह से गरीबों और निम्न आय वर्ग के लोगों में उनका समर्थन मजबूत बना हुआ है। एक स्थानीय आरडब्ल्यूए सदस्य ने कहा, यह बड़े दुख की बात है कि केजरीवाल का समर्थन करने वाले नई दिल्ली और दूसरे विधानसभा क्षेत्र के लोग अपमानित महसूस कर रहे हैं।
उन्होंने न सिर्फ वाराणसी में चुनाव लड़ कर लोगों का सिर नीचा किया है बल्कि अब वह परिदृश्य से पूरी तरह गायब भी हो चुके हैं। बहरहाल, केजरीवाल से संपर्क करने की पिछले तीन दिन की कोशिश बेकार साबित हुई है। उन्हें लगातार फोन किए गए लेकिन उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया।
शुरू होगी सिसोदिया की खोज?
लोकसभा में आम आदमी पार्टी के खराब प्रदर्शन की वजह से केजरीवाल अब एक कमजोर और राजनीतिक हाशिये पर धकेल दिए गए शख्स में तब्दील हो गए हैं।
ऐसा लगता है कि उनकी निजी ‘राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा’ ने आम आदमी पार्टी को काफी चोट पहुंचाई है। पार्टी में अब फूट दिखाई पड़ी है और वह राजनीतिक तौर पर किनारे हो गई है। कई प्रमुख चेहरे निराश और हताश होकर पार्टी छोड़ चुके हैं।
अब तो खुद केजरीवाल और उनके नजदीकी सहयोगी मनीष सिसोदिया ही अपने अहंकार और अकड़ की वजह से ‘आम आदमी’ के गुस्से का निशाना बन रहे हैं। अब तो पूर्वी दिल्ली में सिसोदिया को खोजते पोस्टरों के सामने आने की संभावना पैदा हो गई है। साफ है कि एक समय में सिसोदिया के समर्थक रहे लोगों का अब उनसे मोहभंग हो रहा है।
केजरीवाल को ले डूबी ये जल्दबाजी?
राजनीतिक गर्मागर्मी में मुख्यमंत्री पद छोड़ने की जल्दबाजी केजरीवाल को अब भी परेशान कर रही है लेकिन लगता है उन्होंने इससे कोई सबक नहीं लिया है। दरअसल यह कहा जा रहा है कि सिसोदिया के जरूरत से ज्यादा वर्चस्ववादी स्वभाव ने पार्टी के अंदर और बाहर कइयों को नाराज कर दिया है।
भले ही आम आदमी पार्टी इससे इनकार करे लेकिन अब यह कोई रहस्य नहीं रहा कि केजरीवाल और उनके नजदीकी सहयोगी ने दिल्ली में सरकार बनाने के लिए सौदेबाजी की है। आम आदमी पार्टी चाहती है कि वह सरकार बनाए और कांग्रेस उसका समर्थन करे।
सबसे ज्यादा भ्रम पैदा करने वाली चीज अरविंद केजरीवाल के रुख में पल-पल दिख रहा बदलाव है। एक दफा वह दिल्ली के लेफ्टिनेंट गवर्नर को अच्छा व्यक्ति करार देते हैं और फिर अगले ही पल उन पर गलत काम करने का आरोप लगा देते हैं।
AAP के लिए मुसीबत है ये स्थिति
आम आदमी के ही एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि दिल्ली विधानसभा का लगातार राष्ट्रपति शासन में रहना पार्टी के लिए मुसीबत बनता जा रहा है। उसे अब अपने नेताओं को साथ रखना मुश्किल हो रहा है।
आप चाहती है कि दिल्ली में जल्दी ही नए चुनाव हो जाएं या फिर कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बना ली जाए। लेकिन दोनों चीजें संभव नहीं हो पा रही हैं और हर गुजरते दिन के साथ आप की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। अगले कुछ महीनों में हरियाणा विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं।
केजरीवाल और आप को यह फैसला करना पड़ेगा कि इसमें कूद पड़ें या फिर खुद को दिल्ली में चुनाव लड़ने तक सीमित रखें। या फिर अपने विस्तार का सही मौका देख कर आगे बढ़ें।