"गिलौरी खाया करो 'गुलफाम', जुबान काबू में रहती है"
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दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को विशाल भारद्वाज की फिल्म मकबूल के एक सीन से काफी कुछ सीखने की जरूरत है। इस फिल्म मे पंकज कपूर जो कि अब्बा जी की भूमिका में हैं, एक राजनेता से परेशान होकर पान थूकते हुए एक डायलॉग बोलते हैं कि "गिलौरी खाया करो, गुलफाम, जुबान काबू में रहती है"
सिर्फ यही डायलॉग ही केजरीवाल की पाठशाला नहीं है जो इस तरह की बात कह रहा है बल्कि किसी भी राजनेता को जनता से सामने कुछ भी बोलने से पहले सोच जरूर लेना चाहिए।
अगर वो ऐसा नहीं करता है तो आने वाले समय में उसे अपने ही शब्द खुद लीलने (बरदाश्त) पड़ते हैं, जैसे केजरीवाल का करना पड़ रहा है।
कुछ साथियों को ही जवाब देना चाहते थे केजरीवाल
चुनाव जीते तो केजरीवाल बोले कि हमारे कुछ साथी कहते हैं कि देशभर में हमें पार्टी को फैलाना चाहिए तो इसमें अहंकार साफ दिखाई देता है। अब केजरीवाल पलटते हुए जब ये कह रहे हैं कि वो पार्टी का पूरे देश में विस्तार करेंगे तो उन्हें अपने शब्दों को वापस लेना पड़ेगा।
पार्टी की जब पीएसी की मीटिंग में 'समुद्रमंथन' (विचार-विमर्श) हुआ तो उसमें से अमृत रूपी बयान आया कि पार्टी को देश भर में विस्तार करना चाहिए।
अब ऐसे में जब पार्टी के इस मंथन से अमृत निकला है तो विष भी निकलना तय था। ये विष है केजरीवाल के पुराने शब्द। केजरीवाल के पुराने बोले गए शब्द ही विष की तरह उनके सामने आ गए हैं। जिन्हें उन्हें खुद पीकर अपनी गर्दन को नीला करना पड़ेगा।
पहले बोले कि विस्तार नहीं करेगी पार्टी
पार्टी जीत के बाद आंतरिक तौर पर चल रही कलह को खत्म कर देना चाहती थी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। पार्टी ने साफ किया जो भी नेता विस्तारवादी नीति के बारे में सोच रहे हैं वो इसे त्याग दें। पार्टी को अब लग रहा है कि कार्यकर्ताओं को भूलने की कोशिश की तो ये आप और केजरीवाल दोनों के लिए आत्महत्या जैसा होगा।
रामलीला मैदान में केजरीवाल ने उन लोगों की जुबान पर लगाम लगाने की कोशिश की थी जो कि दिल्ली के अलावा पार्टी के विस्तार के बारे में सोच रहे थे। भले ही केजरीवाल विस्तारवादी सोच का अब भी विरोध कर रहे हों, लेकिन उन्हें कार्यकर्ताओं के दबाव में ऐसा करना पड़ेगा।
क्योंकि यही वो राजनीति है जिस पर आप शुरू हुई, जिस राजनीति की बात केजरीवाल करते रहे हैं, और यही आन्तरिक लोकतंत्र है। हां इतना जरूर है कि केजरीवाल जो कि पार्टी के लिए फेस वैल्यू की तरह है उनकी छवि उनके बयानों के पलटने की वजह से जरूर धूमिल होगी।
इस राजनीतिक नियम को भूल गए थे केजरीवाल
केजरीवाल ने जब शुरूआत में बयान दिया तो वो शायद भूल गए थे कि पार्टी कार्यकर्ताओं को इकट्ठा कर वॉलेंटियर्स को जमा करना और फिर उन्हें वापस भेज देना एक राजनीतिक नियम नहीं है। केजरीवाल राजनीति के सिद्धांत को बदलकर नई राजनीति करना चाहते हैं, जो कि व्यावहारिकता में संभव नहीं है।
दिल्ली चुनावों के दौरान केजरीवाल ने देश ही नहीं विदेश में रहने वाले लोगों से भी अपील की वो दिल्ली चुनाव में पार्टी का सपोर्ट करें। ऐसा हुआ भी केजरीवाल को आदर्श मानने वाले लोगों का जमावड़ा लग गया। दिल्ली में भीड़ जुटी कैम्पेन चला और चमत्कारिक आंकड़े से चुनाव भी जीत गए और इतिहास रच दिया।
ऐसे में अब आप के साथ जुड़े उन कार्यकर्ताओं का क्या जो चुनाव में पार्टी के साथ जुड़े। क्या अब वो घर वापस चले जाएं। ये सवाल केजरीवाल को परेशान जरूर कर रहे होंगे।
तो इस वजह से केजरीवाल ने लिया ये फैसला
योगेंद्र और प्रशांत भूषण को पीएसी से निकालने के बाद से पार्टी की स्थिति डामाडोल हो गई। सैकड़ो कार्यकर्ता जो कि दिल्ली से बाहर के हैं योगेंद्र के उस फैसले का स्वागत करते हैं जिसमें उन्होंने पार्टी विस्तार की बात कही थी।
पार्टी का वो बड़ा धड़ा जो राजस्थान महाराष्ट्र और पंजाब में है वो इन दोनों के पक्ष में है। पार्टी को लगता है कि राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में अगर चुनाव विस्तार की बात पर मामला अटक गया तो केजरीवाल खेमे के लिए परेशानी हो सकती है।
ऐसे में अब पार्टी विस्तार का फैसला ले लिया गया। हां इस पूरे मामले के बाद केजरीवाल को मकबूल फिल्म का डायलॉग जरूर याद कर लेना चाहिए।