जहां चाह होती है राह अपने आप बन जाती है। अरनिया क्षेत्र के गांव हलपुरा निवासी नौ वर्षीय अर्जुन के साथ भी ऐसा ही हुआ। दुर्गम पहाड़ियों पर बर्फीला तूफान भी उसके हौसले को रोक नहीं पाया। माइनस सात से नौ डिग्री तक के तापमान ने उसकी सांसे उखाड़ने की कोशिश की, लेकिन हिम्मत के आगे सब मात खा गए। वह खतरनाक दरारों को पार करता हुआ आगे बढ़ता रहा। अपने पिता समेत 15 सदस्यों की टीम के साथ 14110 फुट ऊंची पहाड़ी सतोपंथ स्वर्गारोहिणी तक का सफर तय करते हुए पांच दिन के भीतर अर्जुन वापस लौट आया।
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सतोपंथ स्वर्गारोहिणी पहाड़ी फतह करने वाला नौ वर्षीय अर्जुन
- फोटो : अमर उजाला
अरनिया क्षेत्र में छोटे से गांव हलपुरा निवासी नरेन्द्र चौहान का आठ वर्षीय बेटा अर्जुन चौथी कक्षा का छात्र है। पेशे से किसान पिता नरेन्द्र चौहान एक ग्रुप घुमक्कड़ी दिल से जुड़े हुए हैं। जो भारत और उसके बाहर भ्रमण करते रहते हैं। इस बार इस ग्रुप के 14 सदस्यों के साथ नरेन्द्र चौहान का नौ वर्षीय बेटा अर्जुन भी 14100 फुट की ऊंचाई पर उत्तराखंड के चमोली स्थित सतोपंथ स्वर्गारोहिणी ताल तक का सफर तय किया।
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सतोपंथ स्वर्गारोहिणी पहाड़ी फतह करने वाला नौ वर्षीय अर्जुन
- फोटो : अमर उजाला
हिमालय में हुई अधिक बर्फबारी के कारण ट्रैक कुछ ज्यादा ही जोखिम और खतरनाक हो गया था। अर्जुन के पिता नरेन्द्र चौहान ने बताया कि ट्रैक पर ऑक्सीजन की कमी शून्य से भी कम तापमान के कारण अर्जुन की सांसे उखड़ने लगी थीं। तब मन हुआ कि लौट चलें, लेकिन अर्जुन ने वापस लौटने से मना कर दिया। उन्होंने बताया कि दुर्गम सफर को तय करते हुए 17 जून की दोपहर को 14110 फुट ऊंचाई पर स्थित सतोपंथ स्वर्गारोहिणी ताल पर पहुंच गए।
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सतोपंथ स्वर्गारोहिणी पहाड़ी फतह करने वाला नौ वर्षीय अर्जुन
- फोटो : अमर उजाला
उसके बाद वहां से पैदल ही दुर्गम रास्तों को पार करते हुए अर्जुन टीम के साथ 18 जून की दोपहर बद्रीनाथ वापस आ गया। अरनिया क्षेत्र के सुरजावली स्थित ब्लू स्काई पब्लिक स्कूल के चौथी कक्षा के साहसी बच्चे अर्जुन को ट्रैक पूरा करने पर भारत के विभिन्न ट्रेकरों से बधाई मिल रही है। भारत की पहली महिला एवरेस्ट विजेता बछेन्द्री पाल की सहयोगी रही पर्वतारोही विजया पंत ने अर्जुन को बधाई दी है। अर्जुन के साथ इस ट्रैक को पूरा करने वालों में संजय कौशिक, डॉ अजय त्यागी, अनिल दीक्षित, नरेन्द्र चौहान, पूर्व भारतीय सैन्य कर्मी राजीव कुमार, हरजिंदर धालीवाल, मनोज धारसे, आलोक जोशी, गिरीश यादव, शुभम चौहान और राहत अली आदि भी साथ थे। पौराणिक मान्यता है कि महाभारत युद्ध के बाद युद्धिष्ठिर को इसी स्थान से उनके कुत्ते समेत देवदूत साथ लेकर गए थे।