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Delhi NCR News: दिल्ली की अदालतों में 3.02 लाख मुकदमे लंबित, अभियोजकों के 42.6 फीसदी पद खाली
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रोहिणी कोर्ट में एक अभियोजक पर मजिस्ट्रेट अदालतों के औसतन 3065 लंबित मुकदमों का बोझ
एलजी ने अनावश्यक तारीखें रोकने और गवाहों को समय पर पेश करने के दिए निर्देश
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली।
राजधानी की जिला अदालतों में मुकदमों का बढ़ता बोझ, अभियोजकों की कमी और मामलों के निपटारे में देरी न्याय व्यवस्था के सामने बड़ी चुनौती बनकर उभरी है। जिला अदालतों में 3,02,477 मुकदमे लंबित हैं, जबकि अभियोजन निदेशालय में अभियोजकों के 507 स्वीकृत पदों में से 216 पद खाली पड़े हैं। यानी करीब 42.6 फीसदी पदों पर नियुक्तियां नहीं हुई हैं।
उपराज्यपाल तरनजीत सिंह संधू ने सोमवार को अभियोजन निदेशालय की समीक्षा बैठक में इन स्थितियों पर चिंता जताते हुए जवाबदेही बढ़ाने और न्याय प्रक्रिया में तेजी लाने के निर्देश दिए। बैठक में बताया गया कि 30 सितंबर तक लंबित मुकदमों में से 2,54,597 मजिस्ट्रेट अदालतों और 47,880 सत्र अदालतों में थे।
सत्र अदालतों में तैनात 155 सरकारी और अतिरिक्त सरकारी अभियोजकों पर औसतन 309 लंबित मुकदमों का बोझ है। रोहिणी में यह आंकड़ा बढ़कर 627 मुकदमे प्रति अभियोजक तक पहुंच जाता है। वहीं, मजिस्ट्रेट अदालतों में तैनात 126 अतिरिक्त सरकारी और सहायक सरकारी अभियोजकों पर औसतन 2,021 मुकदमे हैं। रोहिणी में यह औसत 3,065 तक पहुंच गया है।
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कर्मचारियों की कमी दूर करने पर जोर
अभियोजन निदेशालय में अभियोजकों के अलावा सहायक कर्मचारियों की भी कमी है। सहायक कर्मचारियों के 71 स्वीकृत पदों में से 42 रिक्त हैं। बैठक में अदालत कक्षों, अभियोजकों के चैंबर और रिकॉर्ड रूम की कमी का मुद्दा भी उठाया गया। एलजी ने कहा कि कर्मचारियों की नियुक्ति में तेजी लाने के लिए संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) और लोक निर्माण विभाग के समक्ष मामला उठाया जाएगा।
-बैठक में बताया गया कि सहायक सरकारी अभियोजकों के 140 पदों के लिए यूपीएससी ने विज्ञापन जारी किया है। इसके अलावा 50 पदों पर संविदा नियुक्ति और 32 अतिरिक्त सरकारी अभियोजकों की प्रतिनियुक्ति से नियुक्ति की प्रक्रिया भी चल रही है।
बरी होने के मामलों की होगी समीक्षा
एलजी ने अभियोजन पक्ष को आरोपपत्रों और साक्ष्यों की गहन जांच करने तथा अभियोजन की चूकों की पहचान कर सुधारात्मक कदम उठाने के निर्देश दिए। बैठक में जानकारी दी गई कि अगस्त 2014 से बरी किए जाने के आदेशों की समीक्षा के लिए गठित समिति की 34 बैठकें हो चुकी हैं। इस दौरान 64,210 मामलों पर विचार किया गया।
-उन्होंने महिलाओं और बच्चों से जुड़े मामलों को प्राथमिकता देने तथा पीड़ितों के साथ प्रभावी संवाद बनाए रखने पर भी जोर दिया। साथ ही, अनावश्यक तारीखों को कम करने, गवाहों को समय पर अदालत में पेश करने और मुकदमों के निपटारे के लिए निर्धारित समयसीमा का पालन सुनिश्चित करने के निर्देश दिए।
डिजिटल सुनवाई और नए कानूनों पर फोकस
एलजी ने पात्र मामलों में आरोपी की अनुपस्थिति में सुनवाई, डिजिटल केस ट्रैकिंग, इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के इस्तेमाल को बढ़ावा देने को कहा। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 के तहत निर्धारित समयसीमा का पालन सुनिश्चित करने के साथ अभियोजकों को नए आपराधिक कानूनों, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों और फॉरेंसिक जांच का प्रशिक्षण देने पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि अभियोजन व्यवस्था की जवाबदेही बढ़ाकर न्याय में देरी कम करना जरूरी है। न्याय मिलने में देरी को न्याय से वंचित होने की स्थिति नहीं बनने दिया जा सकता।
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एलजी ने अनावश्यक तारीखें रोकने और गवाहों को समय पर पेश करने के दिए निर्देश
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली।
राजधानी की जिला अदालतों में मुकदमों का बढ़ता बोझ, अभियोजकों की कमी और मामलों के निपटारे में देरी न्याय व्यवस्था के सामने बड़ी चुनौती बनकर उभरी है। जिला अदालतों में 3,02,477 मुकदमे लंबित हैं, जबकि अभियोजन निदेशालय में अभियोजकों के 507 स्वीकृत पदों में से 216 पद खाली पड़े हैं। यानी करीब 42.6 फीसदी पदों पर नियुक्तियां नहीं हुई हैं।
उपराज्यपाल तरनजीत सिंह संधू ने सोमवार को अभियोजन निदेशालय की समीक्षा बैठक में इन स्थितियों पर चिंता जताते हुए जवाबदेही बढ़ाने और न्याय प्रक्रिया में तेजी लाने के निर्देश दिए। बैठक में बताया गया कि 30 सितंबर तक लंबित मुकदमों में से 2,54,597 मजिस्ट्रेट अदालतों और 47,880 सत्र अदालतों में थे।
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सत्र अदालतों में तैनात 155 सरकारी और अतिरिक्त सरकारी अभियोजकों पर औसतन 309 लंबित मुकदमों का बोझ है। रोहिणी में यह आंकड़ा बढ़कर 627 मुकदमे प्रति अभियोजक तक पहुंच जाता है। वहीं, मजिस्ट्रेट अदालतों में तैनात 126 अतिरिक्त सरकारी और सहायक सरकारी अभियोजकों पर औसतन 2,021 मुकदमे हैं। रोहिणी में यह औसत 3,065 तक पहुंच गया है।
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कर्मचारियों की कमी दूर करने पर जोर
अभियोजन निदेशालय में अभियोजकों के अलावा सहायक कर्मचारियों की भी कमी है। सहायक कर्मचारियों के 71 स्वीकृत पदों में से 42 रिक्त हैं। बैठक में अदालत कक्षों, अभियोजकों के चैंबर और रिकॉर्ड रूम की कमी का मुद्दा भी उठाया गया। एलजी ने कहा कि कर्मचारियों की नियुक्ति में तेजी लाने के लिए संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) और लोक निर्माण विभाग के समक्ष मामला उठाया जाएगा।
-बैठक में बताया गया कि सहायक सरकारी अभियोजकों के 140 पदों के लिए यूपीएससी ने विज्ञापन जारी किया है। इसके अलावा 50 पदों पर संविदा नियुक्ति और 32 अतिरिक्त सरकारी अभियोजकों की प्रतिनियुक्ति से नियुक्ति की प्रक्रिया भी चल रही है।
बरी होने के मामलों की होगी समीक्षा
एलजी ने अभियोजन पक्ष को आरोपपत्रों और साक्ष्यों की गहन जांच करने तथा अभियोजन की चूकों की पहचान कर सुधारात्मक कदम उठाने के निर्देश दिए। बैठक में जानकारी दी गई कि अगस्त 2014 से बरी किए जाने के आदेशों की समीक्षा के लिए गठित समिति की 34 बैठकें हो चुकी हैं। इस दौरान 64,210 मामलों पर विचार किया गया।
-उन्होंने महिलाओं और बच्चों से जुड़े मामलों को प्राथमिकता देने तथा पीड़ितों के साथ प्रभावी संवाद बनाए रखने पर भी जोर दिया। साथ ही, अनावश्यक तारीखों को कम करने, गवाहों को समय पर अदालत में पेश करने और मुकदमों के निपटारे के लिए निर्धारित समयसीमा का पालन सुनिश्चित करने के निर्देश दिए।
डिजिटल सुनवाई और नए कानूनों पर फोकस
एलजी ने पात्र मामलों में आरोपी की अनुपस्थिति में सुनवाई, डिजिटल केस ट्रैकिंग, इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के इस्तेमाल को बढ़ावा देने को कहा। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 के तहत निर्धारित समयसीमा का पालन सुनिश्चित करने के साथ अभियोजकों को नए आपराधिक कानूनों, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों और फॉरेंसिक जांच का प्रशिक्षण देने पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि अभियोजन व्यवस्था की जवाबदेही बढ़ाकर न्याय में देरी कम करना जरूरी है। न्याय मिलने में देरी को न्याय से वंचित होने की स्थिति नहीं बनने दिया जा सकता।