Wolf Attack: आसान शिकार, आदत और हालात से भेड़िये बन जाते हैं जान के दुश्मन...1997 की घटना थी बेहद डरावनी
देश में 2500 से 3000 तक भेड़ियों की संख्या है। गुजरात, महाराष्ट्र में भेड़ियों की अच्छी संख्या है। भेड़िया बेहद चालाक होता है। इसे घोस्ट आफ द ग्रासलैंड कहा जाता है।
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इन दिनों यूपी के बहराइच में भेड़िया मुसीबत का सबब बना हुआ है। पर इन भेड़ियों का वास उच्च हिमालयीय क्षेत्र से लेकर मैदान तक है। वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट आफ इंडिया (डब्लूआईआई) के अनुसार देश में इनकी संख्या ढाई से तीन हजार तक है। यहां के विशेषज्ञों के अनुसार भेड़ियों के इंसानी पर हमले की घटना कभी-कभार होती है। इसमें एक झुंड होता है जो आसान शिकार के लिए बच्चों पर हमला करता है।
वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार भेड़िया बेहद चालाक होता है, इसमें सूंघने की गजब की क्षमता होती है और वह दूर से हलचल का पता कर लेता है। डब्लूआईआई के वैज्ञानिक व पीआरओ डॉ. बिलाल हबीब कहते हैं कि इन गुणों के चलते ही भेड़िये बचे हुए हैं। इनको घोस्ट आफ द ग्रासलैंड कहा जाता है। देश में इनकी संख्या ढाई से तीन हजार तक है।
झुंड में बार- बार करने लगता है हमले
इसमें गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान में अच्छी संख्या है। यूपी की बात करें तो यहां पर 50 से 60 भेड़िये हैं।उन्होंने कहा कि भेड़िये के व्यवहार में आक्रमकता नहीं आई है, ऐसा होता तो गुजरात, महाराष्ट्र आदि जगह पर 400 से 500 तक भेड़िये हैं? इसके लिए कई बार स्थितियां हो जाती हैं।
बरसात में घर के पास घास आदि बड़ी हो जाती है। खेतों में फसल लगी होती है, जो लंबी है। भेड़िया चुपके से घरों के पास पहुंच जाता है, फिर वह देखता है कि यहां से बच्चा उठाना आसान है। वहीं, बारिश में जंगल में उसका शिकार करना कठिन हो जाता है। ऐसे में एक बार वह सीख लेता है तो झुंड में वह बार- बार हमले करने लगता है।
छह से आठ तक होते हैं झुंड में
डॉ. बिलाल कहते हैं कि संख्या तय नहीं होती है। छह से आठ या दस तक भी झुंड में हो सकते हैं। इसमें अल्फा भेड़िया महत्वपूर्ण होता है। यह ग्रुप का लीडर होता है। यह रात के समय हलचल करते हैं। उस समय इंसानी गतिविधि भी कम होती है। यह काबू में आ जाए तो स्थिति को नियंत्रित करने में अधिक मदद मिलती है। अगर सावधानी की बात करें तो घर के आसपास सफाई रखें, झाड़ी आदि को हटा दें। रोशनी रखें। अगर आसपास के कई घर हैं तो एक जगह पर बच्चों को सुला सकते हैं।
1997 में कई जिलों में हुई थी घटना
उत्तराखंड वन विभाग से सेवानिवृत्त आईएफएस आरएन झा कहते हैं कि वर्ष 1997 में यूपी के प्रतापगढ़, सुल्तानपुर, जौनपुर समेत कई जिलों में भेड़ियों का आतंक था। भेड़ियों के हमले की घटना फरवरी से शुरू हुई थी, जो अक्तूबर तक चली थी। उस अवधि में भेड़ियों के हमले की 75 घटनाएं हुई थी। उस समय एकीकृत यूपी था, उनको प्रतापगढ़ वन प्रभाग का डीएफओ बनाकर भेजा गया था। वहां एक योजना बनाकर अभियान शाम से सुबह तक चलाया गया। इस अवधि में 18 भेड़ियों को गोली मारी गई थी। वह कहते हैं कि भेड़िया बहुत चालाक होता है। अगर यूपी वन विभाग की टीम ने कई भेड़ियों को पकड़ लिया है तो यह भी बड़ी उपलब्धि है।
उच्च हिमालयीय क्षेत्र में भी भेड़िया का वास
उच्च हिमालीय क्षेत्रों में भी भेड़ियों का वास है। कुमाऊं में बागेश्वर के सुंदरढूंगा में 2014 में हिम तेंदुआ की उपस्थिति का पता लगाने के लिए कैमरा ट्रैप को लगाया गया था। डब्लूडब्लूआई के वन्यजीव विशेषज्ञ डॉ. विपुल मौर्य कहते हैं कि उस समय उत्तराखंड वन विभाग के साथ हिम तेंदुओं को लेकर अध्ययन चल रहा था, जब कैमरा ट्रैप में फोटो को देखा गया तो उसमें तिब्बती भेड़िये की फोटो थी, यह पहला तिब्बती भेड़िये के होने का पहला वैज्ञानिक साक्ष्य था।
डब्लूआईआई के विशेषज्ञ को यूपी भेजा गया
यूपी में घटना को देखते हुए एक डब्लूआईआई से एक विशेषज्ञ को भेजा गया है। डब्लूआईआई के पीआरओ डॉ बिलाल हबीब ने बताया कि भेड़ियों के जानकार डॉ. शहीर खान को भेजा गया है। वह यूपी वन विभाग की मदद करेंगे।
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