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जमा पूंजी खर्च करने के बाद भी इनसे नहीं मिले सीएम
नलिनी गुसाईं/ अमर उजाला, देहरादून
Updated Fri, 10 Jan 2014 09:39 AM IST
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पिथौरागढ़ के मुनस्यारी ब्लॉक के दुर्गम नामिक गांव से 28 किलोमीटर का बर्फीला रास्ता तय कर मुख्यमंत्री से मिलने आए ग्रामीणों को खाली हाथ लौटना पड़ा।
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अपनी जमा पूंजी लगा दी
मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहे इस गांव का एक काफिला मुख्यमंत्री को दुख-दर्द सुनाने के लिए कठिन डगर पर चल पड़ा। दस ग्रामीणों की इस टोली के पास जमा पूंजी थी चंदे की वह रकम जो उन्होंने अपनों से ही मिल-बांटकर बटोरी थी।
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दो दिन की मशक्कत और मेहनत ने उन्हें मंजिल तक तो पहुंचा दिया लेकिन यहां भी मुश्किलें उनके पीछे खड़ी थीं। यहां मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा से मिलने की उनकी कोशिशें कामयाब नहीं होने दी गईं।
अड़तालीस घंटों की जद्दोजहद के बीच मजबूरन गांववालों के कदम राजभवन की ओर मुड़ गए। राज्यपाल डॉ. अजीज कुरैशी गांववालों से मिले और उन्हें गले भी लगाया। इनकी व्यथा सुनकर राज्यपाल भावुक हो गए। राजभवन में इनकी खातिरदारी हुई और खैरियत भी पूछी गई।
नामिक गांव के लोग हैं परेशान
राज्यपाल ने गांव आने का भरोसा देकर पिथौरागढ़ के इन ग्रामीणों का दिल भी जीत लिया। इस हाइटेक दौर में भी मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहे पिथौरागढ़ के नामिक गांव के लोग इस कदर हैरान-परेशान हैं कि चंदा कर दस लोगों का काफिला सीएम से मिलने के लिए दून के लिए निकल पड़ा।
28 किलोमीटर के दुर्गम बर्फीले रास्ते से गुजर कर किसी तरह दो दिनों के बाद ये लोग देहरादून तो पहुंच गए लेकिन बदकिस्मती यहां भी इनके साथ चली आई। सीएम से मिलने के लिए दो दिनों तक ये लोग इधर-उधर भटकते रहे लेकिन मुख्यमंत्री आवास के स्टाफ ने इनका दर्द नहीं समझा।
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मुसीबतों से पार पाने के लिए यहां पहुंचे इन गांव वालों की जेब से चंदे की रकम कब और कैसे खर्च हो गई पता तक नहीं चला। इन लोगों को सीएम आवास के कर्मचारियों ने गेट से ही टरका दिया। इनका नंबर लेकर इन्हें लौटा दिया गया।
सीएम आवास के कारिंदों ने भोले-भाले गांव वालों को कहानी समझा दी कि सीएम आएंगे तो आपलोगों तक काल जाएगी। फोन भी इनके एक ऐसे साथी के पास ही था जो नामिक नहीं बल्कि नचनी गांव का था। नामिक गांव में तो मोबाइल की पहुंच भी नहीं है।
गांव के पूर्व उपप्रधान भुवन सिंह ने बताया कि पहली बार दून आए तो यहां की सुविधाएं और ताम-झाम देखकर हम चकित रह गए। जीवन सिंह दानू ने बताया कि गांव में कोई मार्ग नहीं। खच्चरों का रास्ता भी आपदा की भेंट चढ़ गया।
बर्फ से ढके हुए 27 किमी पैदल मार्ग पर लगातार चलने के बाद लोग 12 घंटे में मोटर मार्ग तक पहुंचे। 6 जनवरी को सुबह चार बजे घर से रोटी बांधकर निकले लोग शाम चार बजे तक मोटर मार्ग पर पहुंच पाए। रात नाचनी गांव के एक होटल में गुजारी।
सात तारीख को सुबह सात बजे ये लोग हल्द्वानी से जीप बुक कराकर दून के लिए निकल पड़े। आठ जनवरी को ये लोग सीधे सुबह सीएम आवास पहुंचे। जहां सीएम के न होने का पता लगने के बाद वे द्रोण होटल में ठहरे। नौ जनवरी को ये लोग फिर से सीएम आवास पहुंचे लेकिन वहां फिर निराशा मिली।
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थक-हार कर गांव वाले राज्यपाल से मिलने पहुंच गए। सौभाग्य से दो बजे इन लोगों की मुलाकात राज्यपाल से हो गई। राज्यपाल ने जब इन लोगों की पीड़ा सुनी तो वह भावुक हो गए। उन्होंने गांववालों के खाने-पीने की व्यवस्था कराई और शीघ्र ही उनके गांव आने की बात भी कही।
उन्होंने गांव की समस्याओं के समाधान का भी भरोसा दिलाया। पूर्व प्रधान भगत राम ने बताया कि यदि हम रात-दिन पैदल चले तो शायद 11 तारीख तक पहुंच जाएं वरना 12 जनवरी तक ही गांव पहुंच पाएंगे। 6 जनवरी को ये लोग गांव से निकले थे। दून पहुंचने वालों में खुशहाल सिंह, लक्ष्मण सिंह, महेंद्र सिंह, बच्ची राम, भवान सिंह आदि शामिल थे।
दसवीं के बाद स्कूल नहीं जा पातीं लड़कियां
निवर्तमान प्रधान तुलसी देवी ने कहा कि स्कूल में एक ही टीचर है। उसी के हवाले जूनियर और हाईस्कूल है। अध्यापक भगवान सिंह ने कुछ छात्रों को पैसा देकर वहां पढ़ाने के लिए अपने साथ लगाया है।
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दसवीं के आगे स्कूल मुनस्यारी (66 किमी) और पिथौरागढ़ (160 किमी) में है। यही वजह है कि दसवीं के बाद लोग लड़कियों को स्कूल नहीं भेजते और वे खेती, गाय आदि के काम में लग जाती हैं।
यहां अस्पताल के लिए उठती है डोली
आसपास कोई अस्पताल नहीं है। ऐसे में गांव से पचास किमी दूर तेजम गांव में ही मरीजों को ले जाना पड़ता है। पूर्व पंचायत सदस्य मोहन सिंह ने बताया कि तेजम के अस्पताल में भी कोई खास व्यवस्था नहीं है। नजदीक यही अस्पताल है तो मरीजों को डोली में बिठाकर पैदल पचास किमी तक ले जाना पड़ता है। अधिकतर लोग रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं।
मोबाइल के लिए सात किमी चढ़ाई
गांव में ना ही तो बिजली की सुविधा है और न कोई मोबाइल टॉवर। लोग जहां घर-घर में उजियारा चाहते हैं वहीं दूर पढ़ने वाले अपने बच्चों की कु शल-क्षेम को लेकर भी परेशान रहते हैं। गांव में जब भी कोई छात्र मोबाइल लेकर आता है तो लोग बात करने के लिए सात किमी चढ़ाई चढ़ कर नेटवर्क वाला कोना ढूंढते हैं। तब कहीं जाकर नेटवर्क पकड़ता है।