Uttarakhand: वन्यजीवों से फसलों को बचाने के लिए सौर ऊर्जा बाड़ नहीं, अब होगी बॉयो-फेंसिंग
अब तक फसलों को नुकसान से बचाने के लिए सौर ऊर्जा बाड़ ही लगाई जाती थी, लेकिन इसे लगाने में खर्च अधिक आता है। विभाग की ओर से एक बार बाड़ लगाने के बाद इसे ग्रामीणों को सौंप दिया जाता है।
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उत्तराखंड में वन्यजीवों की ओर से फसलों के नुकसान को कम करने के लिए सौर ऊर्जा बाड़ की जगह अब बॉयो-फेंसिंग को बढ़ावा दिया जाएगा। सरकार की ओर से इसके लिए सेल गठित करने के साथ ही विशेष अधिकारी नियुक्त किए जाने के निर्देश दिए गए हैं। यह सेल बायो-फेंसिंग को बढ़ावा देने के साथ ही इन विषयों पर शोध भी करेगी।
अब तक फसलों को नुकसान से बचाने के लिए सौर ऊर्जा बाड़ ही लगाई जाती थी, लेकिन इसे लगाने में खर्च अधिक आता है। विभाग की ओर से एक बार बाड़ लगाने के बाद इसे ग्रामीणों को सौंप दिया जाता है। ठीक से रखरखाव नहीं हाेने के कारण यह बाड़ जल्दी ही खराब हो जाती है और लाभार्थियों को अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पाते हैं।
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इस समस्या से बचने के लिए अब सरकार ने बॉयो-फेंसिंग बाड़ को बढ़ावा दिए जाने का निर्णय लिया है। बीते दिनों मुख्य सचिव डॉ. संधु ने कैंपा (वनारोपण निधि प्रबंधन व योजना प्राधिकरण) संचालन समिति की बैठक में वनाधिकारियों को इसके निर्देश दिए थे। प्रदेश में खासतौर पर जंगली सूअर, हाथी और बंदर फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं। जिस क्षेत्र में जिस वन्यजीव का आतंक अधिक है, उस क्षेत्र में उसी के अनुरूप बॉयो-फेंसिंग की जाएगी।
इन प्रजाति के पौधों की होती है बॉयो-फेंसिंग
मौसम, जलवायु और भौगोलिक स्थितियों को देखते हुए अलग-अलग जगह पर अलग-अलग बॉयो-फेंसिंग की जाती है। इसमें आमतौर पर काला बांस, कांटा बांस, राम बांस, जेरेनियम, लेमनग्रास, विभिन्न प्रकार के कैक्टस, यूफोरबिया एंटीकोरम (त्रिधारा), डेविल्स बैकबोन, पूर्वी लाल, क्लेरोडेंड्रम इनर्मिस, बोगनविलिया, करौंदा, जेट्रोफा करकस, डुरंटा इरेक्टा, हाईब्रिड विलेट्री, लीलैंड सरू और हेमेलिया आदि।
सफल रहा था मधुमक्खी बाड़ का प्रयोग
देहरादून वन प्रभाग के वनाधिकारी नीतीशमणि त्रिपाठी ने बताया कि उन्होंने यह प्रयोग वर्ष 2015 में लैंसडौन में किया था, जो सफल रहा। इसके तहत मधुमक्खी पालन का बॉयो-फेंसिंग के रूप में प्रयोग किया जाता है। इसमें मधुमक्खी के डिब्बों को खेत के किनारे जमीन पर रखने के बजाय पेड़ों या खूंटों की मदद से जमीन से ऊपर एक तार की सहायता से लटका दिया जाता है। जैसे ही कोई जानवर इस तार को हिलाता है, मधुमिक्खयां बाहर आकर उस पर हमला कर देती हैं। हाथियों को खेतों से दूर रखने में यह तरीका कारगर साबित हुआ है। कुछ समय पहले रामनगर में भी यह तरीका अपनाया गया। वन्यजीव मधुमक्खियों से दूरी बनाए रखते हैं। इस प्रकार की फेंसिंग अनेक देशों में प्रयोग की जा रही है।
इसलिए बेहतर है बॉयो-फेंसिंग
- सौर ऊर्जा बाढ़ से सस्ती पड़ती है
- लगाने के बाद रखरखाव का बहुत ज्यादा झंझट नहीं
- विभिन्न प्रकार की बाड़ से विभिन्न प्रकार के उत्पादन भी मिलते हैं
- भूमि का कटाव रोकती है
- यह दीवार बनाने या गड्ढे खोदने से ज्यादा सस्ता सौदा है
प्रदेश में बॉयो-फेंसिंग को बढ़ावा दिए जाने के सरकार से निर्देश प्राप्त हुए हैंं। इसके लिए सेल गठन की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। कैंपा फंड में ही इसके लिए बजट की व्यवस्था की जाएगी। अलग-अलग फेंसिंग के लिए पौधों की प्रजाति का अध्ययन कराया जाएगा।
- डॉ. समीर सिन्हा, मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक, वन विभाग