तीन अंकों ने रोका था सपना, फिर ऐसे किया पूरा: 18 साल बाद उठाईं किताबें, नीट पास कर एमबीबीएस में लिया प्रवेश
दीपिका ने बताया कि 2008 में महज तीन अंकों ने उनका एमबीबीएस बनने का सपना अधूरा रह गया था। लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अब अपना सपना पूरा किया।
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कहते हैं सपने पूरे करने की कोई उम्र नहीं होती, जरूरत होती है तो बस उन्हें साकार करने के जज्बे की। इसे सच कर दिखाया एक मां ने, जिसने करीब 18 साल बाद फिर किताबें उठाईं और अपने अधूरे सपने को नई उड़ान दी। 2008 में महज तीन अंकों ने एमबीबीएस बनने का सपना अधूरा रह गया तो बीडीएस की पढ़ाई की। इसके बाद अब 2026 में एमबीबीएस क्वालिफाई कर देहरादून मेडिकल कॉलेज में सीट हालिस कर ली है। यह कहानी है दीपिका खांडूजा की जो वर्तमान में हिमालयन इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (हिम्स), जौलीग्रांट के न्यूरोलॉजी विभाग में स्ट्रोक काउंसलर के रूप में कार्य कर रही हैं।
दीपिका बताती हैं कि उन्होंने वर्ष 2008 से 2013 के बीच बीडीएस की पढ़ाई की। उस समय मेडिकल क्षेत्र में आगे बढ़ने और न्यूरोलॉजी के क्षेत्र में चिकित्सक बनने का सपना था, लेकिन प्रवेश परीक्षा में वह महज तीन अंकों से पीछे रह गईं। वर्ष 2016 में उनका विवाह हुआ और इसके बाद बेटे के जन्म के साथ परिवार की जिम्मेदारियां भी बढ़ीं। आमतौर पर ऐसे पड़ाव पर लोग अपने अधूरे सपनों को पीछे छोड़ देते हैं लेकिन दीपिका ने ऐसा नहीं किया। उन्होंने अपने सपने को पूरा करने की दिशा में पहला कदम आईसीएमआर प्रोजेक्ट के अंतर्गत स्ट्रोक काउंसलर के रूप में हिम्स जौलीग्रांट के न्यूरोलॉजी विभाग से जुड़कर बढ़ाया।
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दीपिका कहती हैं कि न्यूरोलॉजी विभाग में कार्य करते हुए वरिष्ठ न्यूरो चिकित्सक डॉ. दीपक गोयल ने उनकी क्षमता और सीखने की ललक को पहचाना। उन्होंने उन्हें दोबारा मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी करने और चिकित्सक बनने के लिए लगातार प्रेरित किया। इस दौरान उनके अभिभावक व अन्य परिजनों ने भी हौसला दिया।
स्वामी राम हिमालयन विश्वविद्यालय के अध्यक्ष डॉ. विजय धस्माणा ने डॉ. दीपिका खांडूजा को इस उल्लेखनीय उपलब्धि के लिए शुभकामनाएं दीं। एक परीक्षा जिंदगी का फैसला नहीं होती। दीपिका की यह उपलब्धि ऐसे समय में सामने आई है, जब हाल ही में नीट परीक्षा के परिणाम और परीक्षा के दबाव से जुड़ी कई दुखद घटनाओं ने समाज और अभिभावकों को सोचने पर मजबूर किया है।