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Haldwani: सड़क हमारे गांव आते-आते बहुत देर कर दी...विनोद कापड़ी की फिल्म पायर से जुदा नहीं इस गांव की कहानी

Sat, 30 Nov 2024 05:53 PM IST
रेनू सकलानी अमर उजाला ब्यूरो, हल्द्वानी
अमर उजाला ब्यूरो, हल्द्वानी Published by: रेनू सकलानी Updated Sat, 30 Nov 2024 05:53 PM IST
सार

मलान और मितड़ा गांव की वीरानगी डरा रही है। मितड़ा गांव में बने कई कमरों के मकान में केवल 74 साल की पार्वती देवी ही रहती है। वर्षों बाद गांव तक सड़क तो पहुंची लेकिन सफर करने वाले कम ही नजर आते हैं। 

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Uttarakhand migration Malan and Mitda villages story is not different from Vinod Kapri film Pyar Haldwani News
पलायन का दंश झेल रहे मलान और मितड़ा गांव - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

पलायन का दंश झेल रहे मलान और मितड़ा गांव की कहानी विनोद कापड़ी की फिल्म पायर से जुदा नहीं है। इस गांव में अधेड़ और बुजुर्ग बचे हैं। हालांकि, दोनों गांवों के लिए अब सड़क बन गई है लेकिन यहां रह रहे बुजुर्गों का कहना है कि सड़क हमारे गांव आते-आते तुमने बहुत देर कर दी है। बंदरलीमा से मितड़ा तक बनी लगभग सात किलोमीटर लंबी सड़क पर वाहन नजर नहीं आते हैं। इक्का-दुक्का वाहन ही सप्ताह या माह में नजर आते हैं।

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छात्र रोज पैदल नापते थे आठ से 16 किलोमीटर की दूरी

शासन-प्रशासन की उपेक्षा के कारण पलायन की मार झेल रहे मलान व मितड़ा गांव के लोगों ने बड़ा संघर्ष झेला है। मलान में पहले केवल एक प्राथमिक विद्यालय हुआ करता था। पांचवीं कक्षा पास करने के बाद यहां के छात्र-छात्राओं को आठवीं के लिए चार किमी दूर गुड़ौली और हाईस्कूल, इंटर के लिए आठ किमी दूर कनालीछीना जाना पड़ता था।
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इन संघर्षों के बावजूद यहां के छात्रों ने अच्छे पदों पर नौकरियां पाईं। मलान गांव के अशोक जोशी वर्तमान में अपर जिलाधिकारी हैं। नवीन जोशी, जेपी जोशी सहित तमाम अन्य युवाओं ने इंजीनियरिंग में अच्छा मुकाम हासिल किया। मितड़ा के ओम प्रकाश पाटनी विदेश में चिकित्सा विशेषज्ञ हैं।
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इसके अलावा, गांव के कई युवा इंजीनियर, शिक्षक सहित अन्य पदों पर कार्यरत हैं। मलान गांव के सेवानिवृत्त शिक्षक पुष्कर दत्त जोशी कहते हैं कि यदि समय पर गांव तक सड़क पहुंच जाती तो पलायन से इस तरह गांव खाली नहीं होते। वह कहते हैं कि गांव सड़क से जुड़ गए हैं तो आने वाले समय में कुछ लोग जरूर गांवों की ओर लौटेंगे।


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खेती बंद, लहलहा रही वीरानगी की फसल
मलान, मितड़ा गांव फल उत्पादन की दृष्टि से उपयुक्त हैं। इन गांवों में आम, अमरूद, लीची, केले की अच्छी पैदावार होती है। जब लोग बेरोजगार थे तो सड़क नहीं होने से फल बाजार तक नहीं पहुंच पाते थे। अब सड़क पहुंची तो फलों की देखरेख करने वाला कोई नहीं है। पहले धान, गेहूं, मडुवा, उड़द, गहत, मसूर, मटर और सब्जियों की खूब खेती होती थी लेकिन पलायन होने से यह सब बंद हो
गया। खेती करने वाला कोई बचा ही नहीं। जो बुजुर्ग हैं, उनके बस की बात नहीं कि वे जंगली जानवरों से अपने खेती को बचा सकें, इसलिए वह खेती करते ही नहीं हैं। अब दोनों ही गांवों में वीरानगी की फसल लहलहा रही है।

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कैलाश मानसरोवर यात्रा का पड़ाव था मलान
मलान गांव समय पर सड़क सुविधा नहीं मिलने से वीरान सा हो गया है। यह कभी कैलाश मानसरोवर यात्रा का पड़ाव था। 1960 से पहले काठगोदाम और टनकपुर से जो कैलाश यात्री आते थे वे पिथौरागढ़-सतगढ़-मलान-अस्कोट होते हुए पैदल तिब्बत जाते थे। उस समय कई यात्री यहां ठहरते थे। इसी रास्ते से अस्कोट के पाल राजा लाव-लश्कर के साथ घोड़े पर सवार होकर अल्मोड़ा के लिए निकलते थे। मलान में दुकानें थीं तो यहां चहल-पहल रहा करती थी।

क्षेत्र का सबसे पुराना पोस्ट ऑफिस भी मलान में था। गुड़ौली सहित अन्य गांव जो अब नेशनल हाईवे से जुड़ने के कारण सुविधा संपन्न माने जाते है, पूर्व में वहां के लोग खरीदारी, पोस्ट ऑफिस आदि के काम से मलान आते थे। अब मलान के बाजार में केवल एक छोटी सी दुकान है, जिसमें पूरे दिन गिने-चुने ग्राहक ही आते हैं।

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