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Harish Rawat Book Launch: हरदा बोले- मैं कांग्रेस में बालिका-वधू की तरह आया था, अब घर की दादी मां बन गया

Sun, 30 Apr 2023 12:47 PM IST
अलका त्यागी विनोद मुसान, अमर उजाला, देहरादून
विनोद मुसान, अमर उजाला, देहरादून Published by: अलका त्यागी Updated Sun, 30 Apr 2023 12:47 PM IST
सार

हरीश रावत की यह किताब उनके लिए बेहद उपयुक्त हो सकती है। इस किताब में हरीश के अनुभवों का खजाना है तो उत्तराखंड की संस्कृति, विरासत, प्रकृति और पर्यावरण के प्रति उनके लगाव की प्रतिबद्धता भी स्पष्ट झलकती है।

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Uttarakhand Former CM Harish Rawat Told his political Experience in congress on Book Launch
पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

वर्ष 1969 में कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण करने के बाद आज 54 वर्ष हो गए। मैं कांग्रेस में बालिका-बधू की तरह आया था और आज कांग्रेस की दादी मां बन गया। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने अपनी किताब ‘मेरा जीवन लक्ष्य उत्तराखंडियत’ की शुरुआत कुछ इसी अंदाज में की है।

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किताब की प्रस्तावना ‘एक हरीश पर कथा अनंता’ लिखते हुए वरिष्ठ पत्रकार विनोद अग्निहोत्री लिखते हैं, सही मायने में अगर किसी को उत्तराखंड को जानना है तो हरीश रावत की यह किताब उनके लिए बेहद उपयुक्त हो सकती है। इस किताब में हरीश के अनुभवों का खजाना है तो उत्तराखंड की संस्कृति, विरासत, प्रकृति और पर्यावरण के प्रति उनके लगाव की प्रतिबद्धता भी स्पष्ट झलकती है। उनके मन में उत्तराखंड के लिए बहुत कुछ करने की ललक के साथ-साथ अपने सीमित कार्यकाल में बहुत कुछ नहीं कर पाने का दर्द भी झलकता है।
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हरीश रावत की इस किताब में सिर्फ राजनीतिक चालबाजियों और अपनी सरकार की उपलब्धियों का जिक्र मात्र नहीं है, कई लेखों में उत्तराखंड के गांव और दूरदराज के इलाकों के जीवन संघर्षों, चुनौतियों, पिछले तीन-चार दशकों में आए सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक बदलाव का भी बेहद बारिकी से चित्रण किया गया है। हरीश रावत की इस किताब में एक तरफ राज्य की राजनीति और उसकी उठापटक के किस्से हैं तो दूसरी तरफ हिमालय की गोद में बसे इस खूबसूरत राज्य के समाज, संस्कृति, सभ्यता, इतिहास, यहां के महापुरुषों, भाषा, संगीत, नृत्य, खेलकूद का परिचय भी बेहद करीब से कराया गया है।

इतना ही नहीं हरीश रावत अपनी इस यात्रा में देवभूमि की नदियों, पहाड़ों, झरनाें, तीर्थ, लोक परंपराओं, त्योहार, महान विभूतियों से रूबरू कराते हुए किसी अनंत विचार यात्रा पर आगे बढ़ते हैं, जिसमें जितना गहरे उतरें, उतना ही और गहराई में जाने का मन करता है। कुल मिलाकर पूरी किताब हमको हरीश रावत के साथ उत्तराखंड के इतिहास, भूगोल, संस्कृति और समाज की यात्रा पर ले चलने का एक बेहद रोचक माध्यम बनकर आई है। यह एक ऐसी नदी की तरह है, जिसके किनारे पर बैठकर सिर्फ लहरें गिनने से ज्यादा आनंद उसमें डुबकी लगाने और तैरने में है।

राजनीति के कटु अनुभवों को भी साझा किया
हरीश रावत ने अपनी इस किताब में कई राजनीतिक कटु प्रसंगों का भी विस्तार से जिक्र किया है। एक प्रसंग में वह लिखते हैं- बजट प्रस्तुत करते वक्त हमें आने वाले तूफान का आभास नहीं था। दिल्ली वाले एक सुनियोजित षड्यंत्र के तहत लोकतंत्र पर इतना कठोर प्रहार करेंगे, सोचा भी नहीं जा सकता था। धन शक्ति एवं सत्ता शक्ति का ऐसा नवीन खेल केंद्र सरकार की ओर से शुरू किया गया, जो अकल्पनीय था।

राहुल एक निश्चयशील व्यक्तित्व
हरीश ने अपनी किताब में राहुल गांधी को एक निश्चयशील व्यक्तित्व बताया है जो शिव भक्त हैं। उन्होंने वर्ष 2013 में केदारनाथ जलप्रलय के बाद बाबा केदार के दर पर पैदल पंगडंडियों को पार करते हुए यात्रा पूरी की थी। वे अकसर एक तपस्वी साधक के रूप में दिखाई देते हैं। भाजपा और संघ के हजारों बमवर्षक सोशल मीडिया और नियमित मीडिया पर उन्हें निशाना बनाते हैं। लेकिन राहुल आज आमजन के सवालों को ध्वनि बनाकर जवाब दे रहे हैं।

यूपीए के सारे घटक दल सोनिया को बनाना चाहते थे पीएम
हरीश ने अपनी किताब में सोनिया गांधी का जिक्र करते हुए लिखा है कि वर्ष 2004 में जब यूपीए की सरकार बनी, सभी घटक दल सोनिया को प्रधानमंत्री बनाना चाहते थे। कांग्रेस के सभी सांसद उन्हें प्रधानमंत्री देखना चाहते थे, लेकिन उन्होंने त्याग का महान उदाहरण पेश किया।

कभी नारायण दत्त तिवारी के बहुत करीब थे हरीश
कांग्रेस की राजनीति में हरीश रावत को नारायण दत्त तिवारी का मुखर विरोधी माना जाता रहा है। लेकिन, यह बात भी सच है कि हरीश कभी नारायण दत्त तिवारी के बहुत करीबी होते थे। हरीश रावत ने लिखा है कि किस तरह से एनडी के संपर्क में वह आए और आगे चलकर तिवारी उनके आदर्श पुरुष बन गए।

गैरसैंण की गंगा में पूरा गोता नहीं लगा पाया
उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने अपनी किताब मेरा जीवन लक्ष्य उत्तराखंडियत में गैरसैंण का दर्द को बयान करना भी नहीं भूले। किताब की भूमिका में ही उन्होंने गैरसैंण को उत्तराखंडी सर्वांगीण विकास की गंगा की मिसाल दी। लिखा, गैरसैंण की गंगा पूरा गोता नहीं लगा पाया। फिर सवाल छोड़ा क्या हमारी सांसों के थमने के बदा राजधानी गैरसैंण का सपना साकार होगा? गैरसैंण के बारे में ये बातें उन्होंने पुस्तक की भूमिका में लिखी हैं। पुस्तक के 16वें पन्ने पर उन्होंने लिखा, गैरसैंण राजधानी, पुण्य ही पुण्य है। गैरसैंण उत्तराखंडी सर्वांगीण विकास की गंगा है।

मैं गैरसैंण की गंगा से कुछ ही अंजलि जल लेकर नहा पाया, पूरा गोता नहीं लगा पाया। कल कोई अवश्य आएगा, साहस दिखाएगा। मुझे उम्मीद है, इस अधूरे संकल्प को अवश्य पूरा किया जाएगा। मेरे मुख्यमंत्री पद से हटनेके बाद गैरसैंण में राजधानी निर्माण से संबंधित सारे निर्णयों पर काम बंद है। सत्ता को गैरसैंण पर आगे बढ़ना चाहिए। अन्यथा उत्तराखंड को आगे बढ़कर खुद संकर्घ का नेतृत्व संभालना चाहिएष उम्र बीत रही है। मन कह रहा है। कब होगा राजधानी गैरसैंण का सपना साकार। क्या हमारी सांसों के थमने के बाद? वे पुस्तक संघर्ष का आह्वान करते हैं। पुस्तक में लिखा, संघर्ष की जागर लगाइए। मैं कमतर ही सही, गैरसैंण का जागरियां हूं, जागर लगाता रहूंगा।

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