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स्मृति शेषः पक्ष ही नहीं विपक्ष पार्टी भी थी प्रकाश पंत के इन गुणों की मुरीद, साझा किए राेचक अनुभव

Thu, 06 Jun 2019 01:37 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal मो. यामीन अंसारी, अमर उजाला, सितारगंज
मो. यामीन अंसारी, अमर उजाला, सितारगंज Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal Updated Thu, 06 Jun 2019 01:37 PM IST
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Uttarakhand Finance minister prakash pant passed away every leader praised him
प्रकाश पंत - फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो

उत्तराखंड के कद्दावर भाजपा नेता प्रकाश पंत का नाम सितारगंज विधानसभा की राजनीति से भी जुड़ा है। दो बार सत्ता पर काबिज रही भाजपा सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे प्रकाश पंत ने कांग्रेस की सरकार बनने पर सीएम के सामने चुनाव लड़ने की चुनौती को स्वीकार की थी और सितारगंज विधानसभा के उपचुनाव में भाजपा की साख को बचाने के लिए मैदान में उतर आए थे। इसके बाद से सितारगंज में प्रकाश पंत लोकप्रिय नेता बन गए।

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वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में उत्तराखंड सरकार के नतीजे बड़े ही दिलचस्प रहे थे। सत्ता पर काबिज भाजपा केवल दो सीटों से दुबारा सरकार बनाने से चूक गई थी। कांग्रेस को 32, भाजपा को 31 सीटें मिली थीं। कांग्रेस ने बसपा के तीन व निर्दल विधायकों के समर्थन से सरकार बना ली और फिर 13 मार्च को टिहरी सांसद विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री बना दिया। 

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विजय बहुगुणा भी भाजपा के सितारगंज से विधायक किरन मंडल को तोड़ कर सितारगंज से मैदान में उतरे। उस समय, भाजपा हाईकमान की सहमति पर पूर्व पर्यटन मंत्री प्रकाश पंत ने यहां चुनाव लड़ने की चुनौती स्वीकार की। सितारगंज में चले दो माह के उपचुनाव में सीएम को जिताने के लिए पूरी सरकार मैदान में उतर आई तो वहीं पंत ने भी हिम्मत नहीं हारी और दमखम के साथ चुनाव लड़ा। इसके बाद से लगातार प्रकाश पंत इस क्षेत्र और कार्यकर्ताओं से जुड़े रहे। उन्होंने नानकमत्ता के नानकसागर बैराज को पर्यटक स्थल बनाने के लिए सरकार में पहल भी की थी।  उनके निधन की खबर से क्षेत्र में गहरी शोक की लहर है। भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष राजू भंडारी ने कहा कि यह पूरे प्रदेश के लिए अपूर्णीय क्षति है।

मेरा प्रथम बजट भाषण सुनकर आशीर्वाद दें : इंदिरा

नेता प्रतिपक्ष डॉ. इंदिरा हृदयेश ने कहा कि त्रिवेंद्र सरकार में पहली बार वित्त मंत्री बने प्रकाश पंत बजट भाषण से पहले उनके कक्ष में आए और अनुरोध किया कि मेरा प्रथम बजट भाषण है और आप उस दौरान सदन में जरूर रहें साथ ही आशीर्वाद दें। पूरे बजट भाषण में वह सदन में मौजूद रहीं और उनको बधाई भी दी। राज्य बनने के बाद उत्तराखंड विधानसभा के स्पीकर बने। स्पीकर के रूप में उनका कार्यकाल और सदन संचालन का तरीका देखा। वह कुशाग्र बुद्धि के प्रतिभाशाली एवं विनम्र स्वभाव के व्यक्ति थे। इतनी अल्प आयु में उनकी मृत्यु की कल्पना नहीं की जा सकती थी। यह त्रिवेंद्र सरकार के लिए भी अपूर्णनीय क्षति है। 

नेता प्रतिपक्ष डॉ. इंदिरा हृदयेश ने बताया कि उत्तराखंड राज्य के गठन का प्रस्ताव जब उत्तर प्रदेश की विधान परिषद में आया तब प्रकाश पंत विधान परिषद के सदस्य हो गए थे। मैंने उत्तराखंड राज्य गठन के बारे में अपना एक संशोधन प्रस्ताव विधान परिषद में पेश किया था। उसके उत्तर में प्रकाश पंत ने भी एक संशोधन रखा। मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ कि एक नया सदस्य इतनी बुद्धिमानी से एक सार्थक संशोधन को प्रस्तुत कर रहा है। यह बात मैं अकसर पंत से कहती थी। उसी समय लग गया था पंत एक प्रतिभाशाली व्यक्ति हैं और आगे चलकर सक्रिय राजनीति में भी अपना स्थान बनाएंगे। 

नेता प्रतिपक्ष डॉ. इंदिरा हृदयेश ने बताया कि प्रकाश पंत खरीददारी में थी होशियार थे। उत्तराखंड बनने से पहले विधान परिषद के अध्यक्ष के नेतृत्व में विदेश जाने का अवसर मिला था। मैं (डॉ. इंदिरा हृदयेश), अजय भट्ट और प्रकाश पंत को चीन, जापना और कनाडा गए थे। वहां की बाजारों में पंत गिफ्ट आदि ऐसे खरीद रहे थे जैसे विदेश में ही रहते हों। मैं और अजय भट्ट उनको देखते ही रह जाते थे। पहली बार विदेश जाने के बाद भी नहीं लग रहा था कि पहली बार आए हैं। जब उनसे पूछा कि इतने सारे गिफ्ट किसके लिए तो जवाब दिया कि जाकर अपने क्षेत्र के लोगों में बांट दूंगा। 

...किताब से शुरू हुआ रिश्ता, हमेशा रहा मजबूत

...2002 की बात रही होगी, मुझे विधानसभा अध्यक्ष बनाए जाने की चर्चा चल रही थी। इसी बीच एक दिन हल्द्वानी स्थित मेरे आवास पर प्रकाश पंत जी पहुंचे और संसदीय कार्यों से जुड़ी किताब भेंट की थी। उनसे यह पहली मुलाकात थी..उसके बाद से रिश्ते मजबूत होते चले गए। वह संसदीय कार्यों के ज्ञाता थे। हम एक दूसरे से विकास योजनाओं आदि पर लंबी बातचीत करते थे। इस सरकार हम दोनों मंत्री बने और उसके बाद से विचारों का आदान-प्रदान और बढ़ गया।
 
यह संस्मरण अमर उजाला से कैबिनेट मंत्री यशपाल आर्य ने साझा किया। उन्होंने कहा कि उन्होंने कई जिम्मेदारी कुशलतापूर्वक संभाली। वह हर विषय के ज्ञाता था, वह खूब पढ़ाई करते थे। संसदीय कार्यों के बारे में उनका अनुभव और जानकारी काफी थी। सरल व्यक्ति में असाधारण क्षमता थी। वह संवेदनशील व्यक्ति  थे और हर किसी की मदद के लिए तैयार रहते थे। वह अजातशुत्र की तरह थी, उनका जाना अपूरणीय क्षति है... इसकी भरपाई नहीं हो पाएगी।

विपक्ष को चुटकियों में संतुष्ट कर लेने का अदभुद हुनर था पंत में

हसमुख और मिलनसार स्वभाव के मंत्री प्रकाश पंत के हुनर और ज्ञान की दाद विपक्षी भी देते थे। विपक्षियों के हर वार से सरकार को बचाने का हुनर उनमें इतना कूट-कूट कर भरा था कि प्रश्न पूछने वाले विधायक भी निरुत्तर हो चुप होकर बैठे जाते थे। यह कहना है भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और डीडीहाट के मौजूदा विधायक विशन सिंह चुफाल का। विधायक चुफाल बुधवार को दिल्ली जा रहे थे। इसी बीच अचानक उन्हें मंत्री पंत के निधन की दुखद सूचना मिली तो मुरादाबाद से वापस आ गए। चुफाल ने बताया कि प्रकाश हमेशा से ही बेहद मिलनसार रहे।

वर्ष 1985 में जब चुफाल भाजपा के जिलाध्यक्ष थे तब पंत उनकी टीम में महामंत्री के पद पर थे। वर्ष 1989 में पंत खड़कोट-पांडेगांव से नगरपालिका के सभासद चुने गए। वर्ष 1998 में वे कुमाऊं की स्थानीय निकाय सीट से एमएलसी चुने गए। बकौल चुफाल पंत में विपक्षी विधायकों के तीखे सवालों से निपटने का अद्भुत हुनर था। जब भी विधानसभा में कोई मंत्री विपक्षी विधायकों के तीखे हमले से घिर जाता और उन्हें अपने जवाब से संतुष्ट नहीं कर पाता था, सरकार घिर जाती थी, ऐसे में संकटमोचन बनकर पंत खड़े हो जाते थे।

वे अपने निराले ही अंदाज में विपक्षियों को शांत कर देते थे। कई बार विपक्षी विधायकों को चुटीले अंदाज में शांत कर अपनी कुर्सी पर बिठा दिया। पंत को संविधान, संसदीय ज्ञान, विधानसभा नियमावली का गहरे तक ज्ञान था। अपने मृदुभाषी व्यवहार और संसदीय ज्ञान के कौशल के चलते पंत भाजपा ही नहीं विपक्षी दलों में भी काफी लोकप्रिय थे। चुफाल ने कहा कि पंत का निधन उत्तराखंड की राजनीति के लिए अपूर्णीय क्षति है जिसे कभी भी नहीं भरा जा सकता है।

जैसा धवल वेश वैसा ही पवित्र हृदय भी था पंत का

उत्तराखंड के दिग्गज नेता प्रकाश पंत जीवन में सदैव सादगी, विनम्रता, परहित और सतत अध्ययन के हिमायती रहे। नैनीताल से उनका विशेष लगाव था, विषेशकर साहित्यिक कार्यक्रमों में उनकी उपस्थिति हमेशा बनी रहती थी। पुस्तकों के प्रति उनका असीम लगाव था। जब उत्तराखंड राज्य का गठन हुआ था तब वह राज्य के पहले विधानसभा अध्यक्ष बने। उस दौरान केसरीनाथ त्रिपाठी उत्तर प्रदेश के विधानसभा अध्यक्ष थे। पंत ने बंटवारे में उनसे उत्तराखंड को पुस्तकें भी दिए जाने की मांग की और उन्हीं के आग्रह पर कई लाख पुस्तकें उत्तराखंड को मिलीं भी। 

बीते वर्ष सात जुलाई को पंत नैनीताल में लेक सिटी क्लब के स्व. पीडी तिवारी स्मृति मेधावी विद्यार्थी सम्मान समारोह में आए थे। इसी साल कुमाऊं विवि के पत्रकारिता विभाग के विश्व पुस्तक दिवस कार्यक्रम, रबिंद्रनाथ टैगोर जन्मोत्सव में रामगढ़ आए थे। इन कार्यक्रमों में उन्होंने सतत अध्ययन पर जोर देते हुए कहा था कि जीवन के किसी भी क्षेत्र में वही व्यक्ति ऊंचाइयों तक जा सकता है जो अपने विषय के अलावा अन्य विषयों में अध्ययनशील रहे। 

पंत हमेशा पारिवारिक मूल्यों के हिमायती रहे। अनेक बार चर्चा में वे सलाह देते थे कि रात का भोजन परिवार के सदस्य एक साथ करें तो इससे परिवार में जुड़ाव बढ़ता है और परिवार टूटने से बचते हैं। पंत ने पिथौरागढ़ में जब फार्मासिस्ट की नौकरी छोड़ कर अपनी दवा की दुकान खोली तभी से अपने आध्यात्मिक गुरु की सलाह पर उन्होंने केवल श्वेत वस्त्र ही धारण किए, लेकिन उनका मन भी इन्हीं धवल वस्त्रों के समान साफ था। बेहद सादा और बहुत कम भोजन लेने वाले पंत अक्सर कहते थे कि वे खाने के लिए नहीं जीते बल्कि जीने भर के लिए खाते हैं। वे उदाहरण देते थे कि लोगों को रावण के उस उपदेश पर अमल करना चाहिए जो मृत्यु पूर्व रावण ने लक्ष्मण को दिया था। उपदेश था कि यदि कोई अच्छा कार्य करना हो तो तुरंत कर लेना चाहिए और बुरा काम हो तो टाल देना चाहिए। वह इसी नीति पर चलते हैं और दावा करते थे कि जीवन में उन्होंने कभी किसी का बुरा नहीं किया, जहां तक बन पड़ा भला ही किया। अपने विरोधियों के काम भी सहजता से करने के उनके स्वभाव का हर कोई कायल था भी। पंत अपने भाषण में सदैव विकास की कतार में खड़े अंतिम व्यक्ति से विकास की शुरुआत करने की वकालत करते थे। विनम्र स्वभाव के पंत हिंदी भाषा को बढ़ावा देने की हिमायत करते थे और स्वयं भी बेहतरीन हिंदी वक्ता थे।

....सूर्य हूं मैं हर एक पल जला हूं सदा’

‘सूर्य हूं मैं हर एक पल जला हूं सदा/ चांद बन रात में भी चला हूं सदा/ हार के टूटने का मैं आदी नहीं/ मैं कमल कीच में भी खिला हूं सदा।’ ये चार पंक्तियां दर्ज हैं, प्रदेश सरकार के उस बजट अभिभाषण के आखिरी पन्ने में, जिसे प्रकाश पंत, वित्त मंत्री के तौर पर नहीं पढ़ पाए। सदन में जब वे आधे भाषण तक पहुंचे थे तो उनके पांव लड़खड़ा गए। वे अचेत हुए तो उपस्थित सदन स्तब्ध था। जैसे-तैसे खुद संभालते वे फिर भाषण पढ़ने लगे, लेकिन काया निढाल होने लगी। उन्हें भाषण बीच में छोड़ना पड़ा। 

तब किसी ने भी नहीं सोचा था कि उनके फेफड़ों में एक ऐसा रोग दाखिल हो चुका है, जो उनके प्राणों को हर लेगा। लेकिन सच्चाई यही है कि सज्जन, मृदभाषी और कवि हृदय प्रकाश पंत अब हमारे बीच नहीं रहे। बजट भाषण में जो चार पंक्तियां उन्होंने लिखी, वे उनके व्यक्तित्व का आइना बन गई। जिन्हें उनका सानिध्य प्राप्त हुआ है, वे उनके राजनीतिक संघर्ष को जानते हैं। एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्में पंत फार्मासिस्ट से राजनीति में आए और अपनी काबलियत के दम पर संसदीय, विधायी और वित्त सरीखे मंत्रालय के मंत्री बनें। ये उनकी राजनीतिक शख्सियत ही थी कि बीसी खंडूड़ी, भगत सिंह कोश्यारी और डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक सरीखे दिग्गज राजनेताओं के मध्य उन्हें भी मुख्यमंत्री पद के प्रमुख और गंभीर दावेदार के तौर पर देखा गया।

सत्ता हो या संगठन दोनों ही जगह पंत ने अपनी काबलियत को साबित किया। सदन के भीतर जब-जब उनकी सरकार और मंत्रियों पर विपक्ष हमलावर हुआ तो वे ढाल बनकर सामने खड़े हो गए। मुस्कराहट उनका सबसे प्रमुख हथियार था, जिसके आगे विपक्षी अकसर हथियार डाल देते थे। उनकी चांद सी ठंडी मुस्कराहट जब चेहरे पर पसरती तो कई नाराजगियां और मसले हल हो जाते। चाहे वे लंबित मांगों से आंदोलन पर रहे प्रदेश के कर्मचारी ही क्यों न रहे हों। पंत की सहज और सरल बातों में कर्मचारियों की नाराजगी भी छू मंतर होती रही। प्रदेश की सरकार, राजनीतिक दल, उनके नेता, कर्मचारी और प्रदेश की जनता के लिए पंत वीआईपी संस्कृति से जुदा एक सज्जन पुरुष थे। वे बेशक हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी सज्जनता सदैव यादों में रहेगी। उनका कमल सा खिलखिलाता चेहरा कभी नहीं भुलाया जा सकेगा।

‘नर सेवा नारायण सेवा’ था पंत का ध्येय वाक्य

वित्त मंत्री स्वर्गीय प्रकाश पंत के जीवन का मुख्य ध्येय वाक्य नर सेवा नारायण सेवा था। उनके मन में समाज के अंतिम छोर में खड़े वंचित व्यक्ति को लेकर चिंता थी। इसे उनकी फेसबुक की उस पोस्ट से जाना जा सकता है, जिसमें उन्होंने लिखा, ‘हमारे जीवन का मुख्य ध्येय है नर सेवा नारायण सेवा। हमारा लक्ष्य है, विकास की इस अनवरत प्रक्रिया में समाज के अंतिम छोर पर खड़े वंचित व्यक्ति के जीवन स्तर में सुधार लाना, विकास की धारा को उस अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना।’ इससे समाज के कमजोर और वंचित वर्ग के प्रति उनकी संवेदनशीलता का पता चलता है।

उन्होंने आगे लिखा कि ‘आज की इन विषम परिस्थितियों में जो वंचित है, दु:खी है, जिनके जीवन में आशा मरणासन्न है ऐसे व्यक्तियों के जीवन में आशा की किरण जगाना और उसके जीवन में सकारात्मक बदलाव लाना ही हमारे जीवन का उद्देश्य है। विकास एक अनवरत चलने वाली प्रक्रिया है और इस प्रक्रिया में कोई पीछे न छूटे यही हमारा प्रयास है । 

पंत के जीवन का यह था संकल्प 
हमारा संकल्प है, पूरा करेंगे 
गरीबी से मुक्त, समृद्धि से युक्त
भेदभाव से मुक्त, समानता से युक्त
अन्याय से मुक्त, न्याय से युक्त
गंदगी से मुक्त, स्वच्छता से युक्त
भ्रष्टाचार से मुक्त, पारदर्शिता से युक्त
निराशा से मुक्त, आशा से युक्त
उत्तराखंड बनाएंगे।

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