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उत्तराखंड सत्ता संग्राम 2022: राम लहर में लहलहाई तो मोदी लहर में छायी भाजपा, पहाड़ में ऐसे बुलंद हुआ भगवा 

Mon, 29 Nov 2021 12:29 PM IST
अलका त्यागी राकेश खंडूड़ी, अमर उजाला, देहरादून
राकेश खंडूड़ी, अमर उजाला, देहरादून Published by: अलका त्यागी Updated Mon, 29 Nov 2021 12:29 PM IST
सार

Uttarakhand Election 2022: 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने अबकी बार 60 पार का नारा दिया। इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए एक फिर पार्टी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लहर के भरोसे है।

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Uttarakhand Election 2022: special Report on BJP Political winning History in State
भाजपा - फोटो : प्रतीकात्मक तस्वीर

विस्तार

अविभाजित उत्तर प्रदेश से लेकर उत्तराखंड तक भाजपा की राजनीतिक यात्रा कई उतार-चढ़ाव और घुमावदार मोड़ों से होते हुए शीर्ष तक पहुंची। नब्बे के दशक में सक्रिय रहकर राम लहर पर सवार होकर उसने पहाड़ की चुनावी सियासत में भगवा बुलंद किया। उसके बाद अटल बिहारी वाजपेयी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लहर के जरिये उत्तराखंड की राजनीति में प्रचंडता के दम पर अपनी जड़ों को और अधिक मजबूत करने में सफल रही। उत्तराखंड में भाजपा का हिंदुत्व की राजनीति के साथ उदय हुआ। हिंदुत्व की राजनीति, अलग राज्य आंदोलन की लड़ाई के दम पर उसने उत्तराखंड में पहली बार लहलहाई और मोदी लहर में प्रचंड जीत से वह पूरी तरह से छा गई। 

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 2002 के विधानसभा चुनाव में 19 सीटों पर सिमटी भाजपा ने 2017 के विधानसभा चुनाव में सारे रिकाॅर्ड तोड़ डाले। यह मोदी लहर का कमाल था कि पार्टी ने 70 में से 57 सीटें जीतीं। इतना ही नहीं भाजपा ने इससे पूर्व तीन विधानसभा चुनावों में पूर्ण बहुमत हासिल न कर पाने की कसक को भी प्रचंड बहुमत से मिटा डाला। 
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2007 के चुनाव के बाद भाजपा राज्य में सरकार बनाने में कामयाब तो रही, लेकिन इसके लिए उसे जोड़तोड़ करनी पड़ी। चूंकि 69 सीटों पर चुनाव हुए थे, इसलिए सरकार बनाने के लिए उसे 35 की जादुई संख्या की दरकरार थी, लेकिन इससे वह दो सीटें दूर थीं। इसे बहुमत में बदलने के लिए भाजपा ने यूकेडी के तीन विधायक दिवाकर भट्ट, ओम गोपाल और पुष्पेश त्रिपाठी और दो निर्दलीय विधायक के सहयोग से सरकार बनाईं। नंदप्रयाग से जीते निर्दलीय विधायक भंडारी को बदले में खंडूड़ी सरकार में मंत्री पद मिला। बाजपुर विधानसभा उपचुनाव में भाजपा के अरविंद पांडे भी जीत गए। खंडूड़ी के लिए जनरल टीपीएस रावत ने धूमाकोट सीट छोड़ी। धूमाकोट उपचुनाव जीतकर जीतकर भाजपा अब बहुमत को लेकर सहज थी।
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2012 के विधानसभा चुनाव में एक बार फिर वह 36 के जादुई आंकड़े से पांच सीटें दूर हो गई। जोड़ तोड़ की गुंजाइश भी नहीं दिखी। लेकिन कांग्रेस इतिहास दोहराया। कांग्रेस के 32 सीटें थी उसने चार निर्दलीय विधायकों के सहयोग से सरकार बनाई। 2017 के विधानसभा चुनाव मैदान में भाजपा पीएम नरेंद्र मोदी के चेहरे के साथ उतरी और 69 सीटों में से 56 सीटों के साथ भाजपा ने प्रचंड जीत का कीर्तिमान बनाया।

राम लहर का देवभूमि में व्यापक असर

उत्तराखंड में भाजपा ने राम मंदिर निर्माण आंदोलन के जरिये अपनी राजनीतिक जमीन तैयार की। पहले वह मंडल कमीशन के आंदोलन में कूदी और उसके बाद पार्टी ने राम मंदिर आंदोलन छेड़ दिया। वह उत्तराखंड को अलग राज्य बनाए जाने के आंदोलन का भी दौर था। भाजपा ने राम मंदिर और उत्तराखंड आंदोलन में सक्रिय रहकर मैदान से लेकर पहाड़ तक में अपना सांगठनिक तंत्र तैयार किया। अलग राज्य बनने से लेकर चार विधानसभा चुनाव तक कुल 26 साल की राजनीतिक यात्रा के बाद आज मोदी लहर में भाजपा लहलहाने लगी। 

पहाड़ में ली हिंदुत्व की सियासत ने नई करवट
अविभाजित उत्तरप्रदेश के समय में हिंदुत्व की सियासत का दारोमदार जनसंघ के हाथों में था। 1977 में आपातकाल के खिलाफ कद्दावर राजनीतिज्ञ जय प्रकाश नारायण की अगुआई में गैर कांग्रेसी सियासी दलों के गठबंधन में छेड़े गए आंदोलन में जन संघ प्रमुख सियासी दल था। चुनाव में यूपी के साथ राज्य के पर्वतीय भूभाग में कांग्रेस का तकरीबन सफाया हो गया। जनता पार्टी ने 20 में से 17 सीटें जीतीं। काशीपुर से सिर्फ नारायण दत्त तिवारी जीते। लेकिन जनता पार्टी से मतभेद उभरने के बाद 1980 में भारतीय जनता पार्टी का उदय हुआ। पहाड़ में भाजपा हिंदुत्व के एजेंडे पर चली।अस्सी के दशक के उत्तरार्द्ध तक पहाड़ की राजनीति में कांग्रेस का एक छत्र राज था। लेकिन मंडल बनाम कमंडल की सियासत के चलते पहाड़ में कांग्रेस के वर्चस्व को चुनौती देने के लिए भाजपा नई राजनीतिक ताकत बनकर उभरी। लाल कृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा के साथ राम मंदिर की लहर में भाजपा पूरे पहाड़ में छा गई। राम लहर में भाजपा के कई नेता तर गए।

...यूं लिखी गई कांग्रेस के सफाये की पटकथा
 1991 के यूपी विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 22 में से 18 सीटें जीतकर कांग्रेस की पहाड़ से विदाई की पटकथा लिखी। इसके बाद उत्तराखंड के अस्तित्व में आने से पहले यूपी के दो विधानसभा चुनाव में भाजपा लगातार बढ़त में रही। 1993 में भाजपा ने पहाड़ की 22 में से 13 और 1996 में 17 सीटें जीतीं। नब्बे के दशक उत्तराखंड राज्य आंदोलन के चरम का दौर था। सुखद परिणाम सामने आए। केंद्र में अटल सरकार ने उत्तराखंड, छत्तीसगढ़ और झारखंड नए राज्यों के गठन का तोहफा दिया। नौ नवंबर 2000 में भाजपा ने अंतरिम सरकार बनाई।

अंतरिम सरकार के समय भाजपा 
नौ नवंबर 2000 को उत्तराखंड में बनी अंतरिम विधानसभा में 30 में से भाजपा के 23 सदस्य थे जिनमें 17 विधायक और छह विधान परिषद सदस्य  थे। कांग्रेस तिवारी का सिर्फ एक विधायक था। जबकि सपा के तीन और बसपा के एक विधायक थे।

बहुमत मिला वह भी प्रचंड
राज्य गठन के बाद हुए तीन विधानसभा चुनाव में भाजपा अपने दम पर बहुमत का आंकड़ा 
नहीं छू पाई। वर्ष 2002 के विधानसभा चुनाव में 19 सीटों पर सिमट गई। वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में वह बहुमत से दो सीट दूर रही। उसे जोड़तोड़ से सरकार बनाने के लिए यूकेडी और निर्दलीय विधायक का सहयोग लेना पड़ा। वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में भाजपा 31 सीटों पर सिमट गई। अलबत्ता 2017 के विस चुनाव में 57 सीटें जीतकर भाजपा ने चुनावी इतिहास के सारे रिकाॅर्ड तोड़ डाले। 

बहुमत के पास ले आया खंडूड़ी हैं जरूरी का नारा

2012 के विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा ने मेजर जनरल(सेनि) बीसी खंडूड़ी की छवि पर चुनाव लड़ा। खंडूड़ी हैं जरूरी नारा दिया। लेकिन यह नारा भाजपा की सत्ता में वापसी नहीं करा पाया। लेकिन भाजपा बहुमत के आंकड़े के पास जरूर पहुंच गई।

कोटद्वार के सियासी भंवर में डूब गया जनरल का जहाज
भाजपा जिस जनरल के नेतृत्व में कांग्रेस पर फतह करने के लिए चुनावी जंग के मैदान में उतरी थी, उन्हीं का जहाज कोटद्वार के सियासी भंवर में डूब गया। कोटद्वार विस चुनाव में मुख्यमंत्री खंडूड़ी की पराजय भाजपा के लिए बहुत बड़ा झटका थी। जनरल को कांग्रेस के सुरेंद्र सिंह नेगी ने हराया। जनरल के सामने जोड़तोड़ सरकार बनाने का विकल्प मौजूद था। लेकिन छवि और उसूलों के चलते उन्होंने पार्टी को विपक्ष में बैठने की सलाह दी।

कांग्रेस में लगाई सेंध और उड़ा ले गया मोदी का तूफान
वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लहर में कांग्रेस के बड़े-बड़े दिग्गज ढेर हो गए। मोदी की आंधी ने बसपा और अन्य क्षेत्रीय दलों का भी सूपड़ा साफ कर दिया। भाजपा ने चुनाव से पहले कांग्रेस में सेंध लगाई। पहले सतपाल महाराज और उनकी विधायक पत्नी अमृता रावत को तोड़ा। उसके बाद कांग्रेस विधायक यशपाल आर्य और उनके बेटे को पार्टी में शामिल कराया। फिर एक बड़े उलटफेर के तहत पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुुगुणा समेत नौ विधायक भाजपा में शामिल हुए। बहुगुणा के बेटे सौरभ बहुगुणा को टिकट दिया और महाराज चौबट्टाखाल से चुनाव लड़े। बाकी भाजपा में आए सभी कांग्रेसियों को पार्टी ने अपना उम्मीदवार बनाया। प्रयोग कामयाब रहा और नौ पूर्व कांग्रेसी चुनाव जीते।

पूर्व मुख्यमंत्री स्वामी भी हारे थे
अंतरिम सरकार में मुख्यमंत्री रहे नित्यानंद स्वामी ने  2002 में विधानसभा का चुनाव लड़ा। तब यह चर्चा थी कि भाजपा की सरकार बनेगी तो कोश्यारी, खंडूड़ी, निशंक, फोनिया में से कोई  मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठेगा। लेकिन कुर्सी की खींचतान में बात नहीं बनी तो लॉटरी स्वामी की ही लगेगी। लेकिन स्वामी समर्थकों के ये अरमान पूरे नहीं हो सके। स्वामी चुनाव हार गए। तब यह चर्चा काफी गर्म रही कि स्वामी हारे नहीं हराये गए। यही कहानी कोटद्वार में जनरल खंडूड़ी के साथ दोहराई गई।

विधानसभा चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन
चुनाव    सीटें     मत जप्रतिशत   राज्य में स्थिति
2002   19          26.91       सत्ता गंवाई
2007   34           29.59       समर्थन से सरकार बनाई
2012   31         33.38        सत्ता गंवाई
2017   57          46.51        सरकार बनाई

सीएम की कुर्सी बदलने का भी रिकाॅर्ड
उत्तराखंड में भाजपा के नाम प्रचंड जीत दर्ज करने के अलावा सीएम की कुर्सी बदलने का भी रिकाॅर्ड है। वह प्रदेश की अकेली ऐसी पार्टी है जिसकी राज्य में तीन बार सरकार रही और उसे आठ बार मुख्यमंत्री बदलने पड़े। अंतरिम सरकार मे नित्यानंद स्वामी और भगत सिंह कोश्यारी, 2007 में बनी सरकार में मेजर जनरल बीसी खंडूड़ी(सेनि) और डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक और 2017 में त्रिवेंद्र सिंह रावत, तीरथ सिंह रावत और पुष्कर सिंह धामी मुख्यमंत्री रहे।  

मोदी भी आए थे अंतरिम सरकार में सीएम तलाशने

अंतरिम सरकार के लिए मुख्यमंत्री खोज में भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण ने एक दल को उत्तराखंड भेजा था। इस दल में पार्टी के तत्कालीन राष्ट्रीय महामंत्री नरेंद्र मोदी भी शामिल थे। दल में पूर्व अध्यक्ष कुशाभाऊ ठाकरे, जेना कृष्णामूर्ति भी थे। तब मुख्यमंत्री पद की दौड़ में मेजर जनरल बीसी खंडूड़ी, केसी पंत, भगत सिंह कोश्यारी, डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक और केदार सिंह फोनिया के नाम शामिल थे। लेकिन विधान परिषद सदस्य नित्यानंद स्वामी छुपे रुस्तम निकले और राज्य के पहले मुख्यमंत्री बने।

21 सालों से जारी है सीएम की कुर्सी की लड़ाई
कांग्रेस की गुटबाजी की भाजपा चाहे जितनी दुहाई दे, लेकिन सच्चाई यही है कि मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए अंतरिम सरकार से शुरू हुई लड़ाई 21 सालों तक जारी है। नित्यानंद स्वामी सीएम बनें तो कुर्सी के प्रबल दावेदार कोश्यारी और निशंक की नाराजगी के चर्चे हुए। मंत्री बनाए जाने के बावजूद उनका शपथग्रहण से बाहर रहने को पार्टी में गुटबाजी के तौर पर देखा गया। खंडूड़ी सरकार में निशंक-कोश्यारी और खंडूड़ी खेमे एक-दूसरे के आमने सामने आ गए। त्रिवेंद्र सरकार में पार्टी विधायकों के एक गुट ने केंद्रीय नेतृत्व को पार्टी छोड़ने की धमकी तक दे डाली। लिहाजा सरकार को प्रचंड बहुमत के बावजूद चार साल में मुख्यमंत्री बदलना पड़ा। त्रिवेंद्र विदा हुए तो अब तीरथ की भी कुर्सी खिसक गई और अब धामी मुख्यमंत्री हैं। 

इन नेताओं के परिश्रम से बना भाजपा का वैभव
जनसंघ से भाजपा की राजनीतिक यात्रा में कई ऐसे नाम हैं, जिन्होंने अपने परिश्रम से पार्टी की उत्तराखंड पहचान बनाई। राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के पक्षधर रहे ऐसे नेताओं में सोबन सिहं जीना, देवेंद्र शास्त्री, मोहन सिंह गांववासी, मनोहर कांत ध्यानी, खुशाल मणि घिल्डियाल, प्रताप सिंह पुष्पवाण, ऋषिबल्लभ सुंदरियाल प्रमुख नाम हैं। कई ऐसे नेता रहे जो निस्वार्थ भाव से पार्टी की सेवा करते रहे और गुमनामी के अंधेरे में खो गए।

डॉ. मुरली मनोहर जोशी सबसे बड़े शक्तिपीठ
उत्तराखंड भाजपा के नेताओं के लिए पार्टी के पहले राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. मुरली मनोहर जोशी एक बड़े शक्तिपीठ की तरह थे। गढ़वाल हो या कुमाऊं यहां के नेता दिल्ली जाते तो डॉ. जोशी का आशीर्वाद लेना नहीं भूलते। जोशी भी उत्तराखंड की राजनीति में संतुलन बनाने के एक बड़े निर्णायक रहे। उनकी बात राज्य के नेता आसानी से नहीं काटते थे। उत्तराखंड राज्य बनाने से लेकर राज्य में मुख्यमंत्री के चयन तक में जोशी की अहम भूूमिका रही। 

भाजपा और उत्तराखंड आंदोलन

उत्तराखंड भाजपा की जड़ों को खाद पानी देने वाले को मुद्दों में उत्तराखंड को अलग राज्य बनाने की लड़ाई भी अहम रही है। उक्रांद व अन्य राजनीतिक दलों से इतर भाजपा ने राज्य आंदोलन को अपनी रणनीति से लड़ा।1980 में भाजपा बनी। झांसी में उत्तरप्रदेश भाजपा की कार्यकारिणी की बैठक हुई। इसमें वरिष्ठ भाजपा नेता मोहन सिंह गांववासी ने उत्तराखंड राज्य के गठन का प्रस्ताव रखा। तब लालकृष्ण आडवाणी राष्ट्रीय महामंत्री होते थे। उन्होंने इस मुद्दे को राष्ट्रीय कार्यकारिणी में रखने का भरोसा दिया। राज्य गठन की मांग के लिए गांववासी माणा से दिल्ली तक पदयात्रा पर निकल गए। 1988 में उत्तरांचल प्रदेश संघर्ष समिति का गठन हुआ। सोबन सिंह चीना अध्यक्ष और मोहन सिंह गांववासी महामंत्री बनें। जीना का निधन हुआ तो समिति की कमान देवेंद्र शास्त्री के हाथों में आ गई। अप्रैल 1990 को डॉ. मुरली मनोहर जोशी के नेतृत्व में दिल्ली बोट क्लब पर रैली हुई।

1991 में लोस के चुनाव में भाजपा ने चारों लोकसभा सीटें जीतीं। विधानसभा में 19 में से 15 सीटों पर कब्जा जमाया। जोशी की सलाह पर पूरनचंद शर्मा, हरबंस कपूर, हरक सिंह रावत राज्यमंत्री और बच्ची सिंह रावत व राजेंद्र शाह उपमंत्री बनें। समिति की कमान बीसी खंडूड़ी के हाथों में आई। 1998 में समिति भंग कर भाजपा ने राज्य आंदोलन की बागडोर सीधे अपने हाथों में ले ली। पार्टी के स्थानीय नेताओं के दबाव में 30 जून 1998 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़ राज्य बनाने का फैसला किया। लेकिन उत्तर प्रदेश पुनर्गठन विधेयक विधानसभा में आने में दो वर्ष छह माह का समय लग गया। 24 जुलाई 2000 को मानसून सत्र में  राज्य गठन विधेयक को सदन की मंजूरी मिली।

90 दिन का वचन, ढाई साल से अधिक में पूरा
1998 में लोकसभा के चुनाव में प्रचार अटल बिहारी वाजयेपी ने हल्द्वानी और कल्याण सिंह पौड़ी में एक जनसभा में राज्य के लोगों को 90 दिन में उत्तराखंड राज्य बनाने का वचन दिया। लेकिन वचन पूरा होने में दो साल 6 माह का समय लग गया। इस दौरान भाजपा कार्यकर्ताओं में असंतोष भी दिखा और पार्टी के स्थानीय नेता जन आक्रोश के शिकार हुए।

इस बार 60 पार का नारा, फिर मोदी लहर का सहारा
2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने अबकी बार 60 पार का नारा दिया। इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए एक फिर पार्टी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लहर के भरोसे है। हालांकि युवा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी अपने छोटे से कार्यकाल में 300 से ज्यादा घोषणाएं कर चुके हैं। लेकिन पार्टी का मानना है कि चारधाम ऑलवेदर रोड, ऋषिकेश कर्णप्रयाग रेल लाइन, सड़कों और पुलों के कार्य, केंद्र, यूपी और उत्तराखंड में ट्रिपल इंजन का दम दिखाकर ही चुनावी वैतरणी पार होगी। उनके मुताबिक, इसमें पीएम मोदी की छवि अहम भू्िमका निभाएगी।

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