हिमालयी क्षेत्रों में बांध बनाने के लिए नए सिरे से सोचने की जरूरत: पद्मभूषण अनिल जोशी
- ग्लेशियरों के मुहान पर बांध का बनना पर्यावरण व प्राकृतिक दृष्टि से सही नहीं
- हिमालय क्षेत्रों में धड़ाधड़ बन रहे बांधों पर तय हो जवाबदेही
उत्तराखंड को खुद चिंतन करना होगा कि कितने बांध चाहिए
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पर्यावरणविद् पद्मभूषण डॉ.अनिल जोशी ने कहा कि हिमालयी क्षेत्रों में बांध बनाने के लिए नए सिरे से सोचने की आवश्यकता है। ग्लेशियरों के मुहाने पर बांध का निर्माण करना पर्यावरण और प्राकृतिक दृष्टिकोण से सही नहीं है। नीती घाटी तपोवन क्षेत्र में ग्लेशियर टूटने के दुष्परिणाम सामने हैं। हिमालयी क्षेत्रों में बांधों के निर्माण नेे ग्लेशियरों की जड़ें हिला दी हैं। धड़ाधड़ बन रहे बांधों पर जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि हिमालयी क्षेत्रों में असंतुलित विकास का परिणाम है कि सर्दियों के मौसम में ग्लेशियरों के टूटने से तबाही मच रही है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि ग्लेशियर क्यों टूटे रहे हैं। दो दिन पहले ही बर्फबारी व बारिश हुई है। इन दिनों जो बर्फ पड़ती है वह ग्लेशियरों पर टिकाऊ नहीं होती है। तेज धूप पड़ने से बर्फ पिघलने के कारण ग्लेशियर का बड़ा हिस्सा टूट गया है। ग्लेशियर के मुहाने पर रैणी गांव के पास बना बांध भी तबाह हो गया।
डॉ.जोशी का कहना है कि बांधों के प्रति तीन पहलुओं पर नए सिरे से सोचने की जरूरत है। पहला यह है कि हम बांध बनाने के लिए ग्लेशियरों के कितने नजदीक जा रहे हैं। दूसरा कितने बड़े बांधों को बनाया जाना चाहिए। तीसरा पहलू यह है कि उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्रों में धड़ाधड़ बांध बनाने के लिए केंद्र की आतुरता दिखा रहा है। इस पर जवाबदेही तय होनी चाहिए। उत्तराखंड को खुद ही इस बात पर चिंतन करना होगा कि कितने बांध चाहिए। जिससे पर्यावरण संरक्षण के साथ ही सतत विकास हो सके।
उत्तराखंड में बड़े बांधों का निर्माण पर्यावरण के लिए घातक
मैती आंदोलन के संस्थापक पद्मश्री कल्याण सिंह रावत ने कहा कि उत्तराखंड में बड़े बांधों का निर्माण पर्यावरण के लिए घातक है। हिमालयी क्षेत्र में मानव हस्तक्षेप बढ़ने के कारण प्राकृतिक आपदा की घटनाएं बढ़ रही है। पहली बार सर्दियों के मौसम में ग्लेशियर टूटने से तबाही मची है।
रावत का कहना है कि एक रिपोर्ट के अनुसार हिमालयी क्षेत्रों में दो सौ छोटे-छोटे ग्लेशियर जल कुंड में बदल चुके हैं। चमोली जिला भूकंप की दृष्टि से भी जोन पांच में है। ऐसे क्षेत्रों में बांधों का निर्माण से भूगर्भीय दबाव बढ़ने के कारण ग्लेशियर टूट रहे हैं। नदियों पर जगह-जगह बांधों का निर्माण किया जा रहा है। इसका सीधा प्रभाव पर्यावरण पर पड़ रहा है। उत्तराखंड में छोटे-छोटे बांध का निर्माण होना चाहिए।
सतत विकास के लिए कैरिंग क्षमता का होना चाहिए अध्ययन
पर्यावरण संरक्षण पर काम कर रहे सोशल डेवलपमेंट फॉर कम्युनफिटी फाउंडेशन के संस्थापक अनूप नौटियाल का कहना है कि हिमालयी क्षेत्रों में सतत विकास के लिए सबसे पहले कैरिंग क्षमता पर अध्ययन होना चाहिए। 20 सालों में यह तय नहीं हो पाया कि पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन बनाने के लिए क्या मॉडल होना चाहिए। केदारनाथ आपदा के बाद चमोली जिले में ग्लेशियर टूटने से मची तबाही एक बार फिर चेतावनी है। हिमालयी क्षेत्रों में बड़े बांधों का निर्माण खतरे की घंटी है। अभी तक हम सतत विकास के लिए वैज्ञानिक अध्ययन का मॉडल नहीं बना पाए हैं। जब तक कैरिंग क्षमता का अध्ययन कर विकास कार्य नहीं करते हैं तब तक प्रकृति अपना रूप इसकी तरह से दिखाती रहेगी।
प्रकृति को रोकने की क्षमता मनुष्यों के बनाए बांधों में नहीं: सुरेश भाई
नदी बचाओ अभियान से जुड़े पर्यावरण प्रेमी व समाजसेवी सुरेश भाई ने कहा कि हिमालय में टूटने वाले ग्लेशियरों और अन्य प्राकृतिक घटनाओं को रोकने की क्षमता मनुष्यों के बनाए बांधों में नहीं है। हिमालय के उद्गम से 150 किमी तक किसी भी तरह के बांध या बड़े निर्माण कार्यों पर पूरी तरह से रोक होनी चाहिए। यदि हम नहीं संभलेंगे तो हमें कोई नहीं बचा सकेगा।
ग्लेशियर टूटने से आए जलजले में ऋषिगंगा जल विद्युत परियोजना का बांध टूटने की घटना पर चिंता जाहिर करते हुए उन्होंने कहा कि वर्ष 2008 में हमने नदी बचाओ अभियान शुरू किया था। तब उत्तराखंड सरकार को यह लिखकर दिया था कि राज्य की नदियां और पहाड़ संवेदनशील हैं। वहां बड़े-बड़े निर्माण कार्य नहीं होने चाहिए। कम से कम हिमालय में ग्लेशियरों के उद्गम से 150 किमी तक किसी भी तरह की बड़ी परियोजना वाटर बम जैसी खतरनाक है, लेकिन सरकारों ने हमारी चिंताओं और चेतावनियों को नजरअंदाज किया।
रैणी गांव में जल विद्युत परियोजना इसका दुखद उदाहरण है। यही हालात रहे तो हिमालय के लोग जलवायु शरणार्थी बन जाएंगे। प्रदेश सरकार ने जलवायु एक्शन प्लान तो बनाया लेकिन उसका पालन नहीं किया जा रहा। हमारा सरकार से निवेदन है कि वह नदियों पर बांध और पहाड़ों में सुरंग बनाने की अनुमति न दे। अब बिजली बनाने के लिए वैकल्पिक साधनों की जरूरत है। पानी को रोकने की क्षमता हिमालय के पहाड़ों में नहीं है।