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एक्सक्लूसिव: उत्तराखंड में आठ लाख की आबादी पर चमोली जैसी आपदा का खतरा

Sun, 14 Feb 2021 02:40 PM IST
अलका त्यागी सुधाकर भट्ट, अमर उजाला, देहरादून
सुधाकर भट्ट, अमर उजाला, देहरादून Published by: अलका त्यागी Updated Sun, 14 Feb 2021 02:40 PM IST
सार

  • विश्व बैंक की मदद से हाल में पूरी हुई शोध परियोजना में यह आया था सामने
  • जलवायु परिवर्तन के कारण अब लगातार बढ़ रहा है जोखिम

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Uttarakhand Chamoli News: Eight Lakh Population in Danger like Chamoli disaster
चमोली में आपदा के बाद का नजारा - फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो

विस्तार

उत्तराखंड में अचानक आने वाली बाढ़ की जद में करीब आठ लाख आबादी है। यह आंकलन प्रदेश में विश्व बैंक की मदद से किए गए एक अध्ययन में सामने आया है। चार साल की शोध परियोजना 2019 में पूरी हुई और इसके तहत आपदा के जोखिम का आंकलन किया गया था।

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प्रदेश में वैसे सबसे अधिक नुकसान की आशंका भूूकंप से ही रहती है। जोन पांच और चार में पूरा राज्य है और इस वजह से आपदा प्रबंधन का पूरा फोकस भी भूकंप के प्रति तैयारी पर रहता है। पिछले कुछ समय से मौसम बदलाव के कारण अति वृष्टि या बेहद अधिक बारिश, जीएलओएफ या ग्लेशियर में बन रही झीलों के टूटने से आने वाली बाढ़ के मामले बढ़ रहे हैं। 2013 की आपदा में अत्यधिक बारिश और चोराबाड़ी ताल को टूटना वजह बताया गया था।
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इस बार सात फरवरी को चमोली जिले में ऋषि गंगा में आए जल प्रलय के पीछे भी इसी तरह के कारण सामने आए हैं। विश्व बैंक की मदद से तैयार की गई रिपोर्ट में सामने आया था कि फ्लश फ्लड या अचानक आने वाली बाढ़ के अधिक जोखिम का सामना करीब आठ लाख लोग कर रहे हैं।  आपदा प्रबंधन विभाग की माने तो अब यह जोखिम और बढ़ गया है। फरवरी में उच्च हिमालयी क्षेत्र में फ्लश फ्लड का यह पहला मामला है। ऐसे में अब फ्लैश फ्लड को और अधिक तवज्जो देने की जरूरत है।

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किस-किस तरह का हो सकता है नुकसान

आबादी - प्रदेश की जनसंख्या एक करोड़ से अधिक है। इसमें से करीब आठ प्रतिशत हैं जो फ्लैश फ्लड से प्रत्यक्ष रूप से और अधिक प्रभावित हैं। यह संख्या करीब आठ लाख बनती है।

पर्यटक - यह माना गया है कि करीब एक प्रतिशत पर्यटक किसी भी समय इसके प्रत्यक्ष खतरे की जद में रह सकते हैं। इससे पर्यटन राजस्व के एक प्रतिशत का नुकसान का अनुमान है।

जल विद्युत परियोजनाएं - सबसे अधिक नुकसान की आशंका इन परियोजनाओं को लेकर ही है। रिपोर्ट के मुताबिक करीब 40 प्रतिशत जल विद्युत परियोजनाओं के लिए फ्लैश फ्लड का खतरा अधिक है।

सड़क और स्वास्थ्य केंद्र - करीब दो प्रतिशत सड़क और दो प्रतिशत स्वास्थ्य केंद्र भी प्रदेश में फ्लैश फ्लड की जद में हैं। केदारनाथ आपदा और चमोली में आई प्राकृतिक आपदा में भी यह सामने आया।


उच्च हिमालयी क्षेत्र में जिस तरह के बदलाव हो रहे हैं, उससे जाहिर है कि अतिवृष्टि, जीएलओएफ आदि की घटनाओं में इजाफा होगा। यह जलवायु परिवर्तन के कारण भी हो रहा है और यही वजह है कि इस तरह के मामले अब अब मानसून तक सीमित नहीं रह गए हैं। सितंबर में अतिवृष्टि के मामले सामने आए हैं। ऐसे में ग्लेशियरों को अधिक तवज्जो देने की भी जरूरत है।
- अनूप नौटियाल, सोशल डेवलपमेंट फॉर कम्यूनिटी फाउंडेशन के संस्थापक

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