वैली ऑफ वर्ड्स: संसद बाधित करने की फिक्सिंग करते हैं सत्ता पक्ष व विपक्ष- केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश
संसद की कार्रवाई बाधित करने के लिए कई बार सत्ता पक्ष और विपक्ष मिलकर फिक्सिंग करते हैं। सदन चलाना सरकार की जिम्मेदारी है लेकिन कई बार वह खुद ही इसमें व्यवधान पैदा करती है। इसके लिए विपक्ष को आगे किया जाता है। वैली ऑफ वर्ड्स लिटरेचर फेस्टिवल के दूसरे दिन परिचर्चा में संसद के मौजूदा व पूर्व सदस्यों ने यह बात कही।
संसद के बाहर और भीतर होने वाली बहसों के स्तर को लेकर हुई परिचर्चा में हिस्सा लेते हुए पूर्व केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश ने कहा कि संसद बाधित करने के लिए बहुत बार फिक्सिंग की जाती है। उसके बावजूद संसद में राज्य विधानसभाओं से कई गुना बेहतर बहस होती है। विधानसभाओं को संसद से बेहतर बहस करना सीखना चाहिए। पूर्व राज्यसभा सांसद डीपी त्रिपाठी ने भी उनकी बात का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि संसद को चलाते भी दोनों है और बाधित भी दोनों ही करते हैं। त्रिपाठी ने कहा कि पिछले डेढ़-दो दशक में भारतीय संसद में व्यवधान डालने का चलन बढ़ा है। संसद में जो बोलते हैं, वो सुनते भी हैं।
कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी ने कहा कि संसद से अच्छी बहस कहीं नहीं हो सकती। पूर्व राज्यसभा सांसद तरुण विजय ने कहा कि संसद से बाहर भी बहुत अच्छी-अच्छी बहस होती है लेकिन जो सम्मान और महत्व संसद की बहस का है, उससे किसी की तुलना नहीं की जा सकती। आरजेडी सांसद मनोज झा ने कहा कि संसद में तर्कों की ताकत पर बहस होती है जबकि टीवी की बहस ताकत के तर्कों से होती है। सौरभ शुक्ला ने कहा कि संसद को चलाने में प्रति मिनट ढ़ाई लाख रुपये का खर्च आता है। संसद के साथ ही पिछले कुछ समय में ट्विटर पर भी बहसों का दौर बढ़ा है। इनमें से ज्यादातर बहसों का स्तर काफी अच्छा भी होता है।
मोदी अच्छे वक्ता, बहसकर्ता नहीं
पूर्व केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश ने कहा कि संसद में कुछ अच्छे वक्ता हैं लेकिन वह अच्छी बहस नहीं कर सकते। प्रधानमंत्री मोदी उनमें से एक हैं। वह अच्छे ढंग से बहस नहीं कर सकते क्योंकि वह सुनना नहीं चाहते। तरुण विजय ने भी कहा कि सुनने के लिए धैर्य होना आवश्यक है।
हर विरोधी को बोलने का मौका देते थे नेहरू
पूर्व राज्यसभा सांसद डीपी त्रिपाठी ने कहा कि जवाहर लाल नेहरू के समय विपक्ष के हर सदस्य को बोलने का पर्याप्त अवसर मिलता था। पिछले कुछ वर्षों में केवल भाजपा और कांग्रेस जैसे बड़े दलों के सदस्यों को ही बोलने का अवसर दिया जाता है। मनोनीत सदस्यों की हालत तो बेहत खराब है। उन्हें महज दो मिनट का ही समय दिया जाता है। मनोज झा ने कहा कि नेहरू खुद भी संसद को पूरा वक्त देते थे। उनके बाद किसी भी प्रधानमंत्री ने संसद को इतना समय और महत्व नहीं दिया।
शालीन प्रवक्ताओं का दौर खत्म
मनोज झा ने कहा कि टीवी की बहसों ने शालीन प्रवक्ताओं का दौर अब खत्म कर दिया है। टीवी पर यह देखकर वक्ताओं को बुलाया जाता है कि वह कितना चिल्ला सकता है। दूसरे की बात को काटने, चिल्लाने और विवादास्पद बोलने के आधार पर मूल्यांकन किया जाता है। उन्होंने कहा कि टीवी बहसों में शामिल होने से उन्हें बीपी और शुगर की दिक्कत बढ़ गई है।
सबसे ज्यादा असहिष्णु पीएम थे नेहरू
तरुण विजय ने कहा कि जवाहर लाल नेहरू सबसे ज्यादा असहिष्णु प्रधानमंत्री थे। इस पर मनोज झा समेत अन्य सदस्यों ने विरोध जताया। झा ने कहा कि नेहरू के सुभाष चंद्र बोस और सरदार पटेल से रिश्तों की गलत व्याख्या की जाती है। जयराम रमेश ने कहा कि नेहरू न केवल विपक्ष को महत्व देते थे। बल्कि प्रमुख विपक्षी नेताओं को सम्मान देते हुए उन्हें महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां भी देते थे।