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शिक्षक दिवस पर विशेष: स्कूल को दिलाया राष्ट्रीय सम्मान, धरती को दी हरियाली की सौगात, सतेंद्र सिंह अनोखी पहल

Sat, 05 Sep 2026 05:31 PM IST
Renu Saklani विजयलक्ष्मी भट्ट, अमर उजाला ब्यूरो, देहरादून
विजयलक्ष्मी भट्ट, अमर उजाला ब्यूरो, देहरादून Published by: Renu Saklani Updated Sat, 05 Sep 2026 05:31 PM IST
सार

एक शिक्षक ने ठान लिया कि बदलाव सिर्फ किताबों और कक्षाओं तक सीमित नहीं रहेगा। उनकी पहल ने स्कूल की तस्वीर बदली और बच्चों के साथ गांवों को भी प्रकृति बचाने की मुहिम से जोड़ दिया।

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Teacher Day Special Rudraprayag Teacher Earns National Recognition Creates Green Forests with Students
शिक्षक सतेंद्र सिंह भंडारी - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी

विस्तार

सरकारी स्कूल में शिक्षा के साथ पर्यावरण संरक्षण की अलख जगाने वाले शिक्षक सतेंद्र सिंह भंडारी समाज के लिए एक मिसाल बन गए हैं। उन्होंने आधुनिक शिक्षा से जोड़कर स्कूल को न केवल राष्ट्रीय पुरस्कार दिलाया बल्कि बच्चों के साथ आठ गांवों के लोगों को पर्यावरण संरक्षण से जोड़कर बांज के 10 घने जंगल भी विकसित किए हैं।

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रुद्रप्रयाग जिले के कोठगी भटवाड़ी गांव के रहने वाले शिक्षक भंडारी प्राथमिक विद्यालय कोटतल्ला में तैनात हैं। वे बताते हैं कि जब उनकी तैनाती वर्ष 2009 में स्कूल में हुई तो भवन के नाम पर बस टिनशेड था। स्कूल की बदहाल हालत को देखकर उन्होंने इसको आदर्श विद्यालय के रूप में विकसित करने की ठानी। उन्होंने अभिभावकों के सामने प्रस्ताव रखा तो ग्रामीण स्कूल को भूमि दान करने के लिए तैयार हो गए। फिर भी कुछ कमी थी तो उन्होंने स्वयं सात नाली भूमि स्कूल के लिए खरीदी।

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भंडारी बताते हैं कि फिर बजट मिलते ही भवन बनकर तैयार हुआ। स्कूल के बच्चों को आधुनिक शिक्षा से जोड़ने के लिए उन्होंने विद्यालय में 11 कंप्यूटर, एक किलोवाट सोलर पैनल, स्मार्ट बोर्ड, सीसीटीवी कैमरे, खेल उपकरण सहित कई सुविधाएं स्वयं के संसाधनों से जोड़ा। शिक्षक भंडारी की मेहनत रंग लाई और उनका स्कूल राज्य में ही नहीं बल्कि देश में भी सरकारी विद्यालयों में पहले स्थान पर रहा और उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजा गया।

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बांज व औषधीय पेड़ों के तैयार हो गए हैं 10 जंगल

भंडारी ने बच्चों को आधुनिक शिक्षा से ही नहीं जोड़ा बल्कि पर्यावरण संरक्षण के प्रति भी उन्हें जागरूक किया। उन्होंने बच्चों के साथ मिलकर पौधरोपण अभियान चलाकर हर बच्चे के नाम से करीब डेढ़ सौ पौधे रोपे। फिर धीरे-धीरे उनकी इस मुहिम में अभिभावक भी जुड़ गए। वे बताते हैं कि शुरुआत में तो लोगों को यह बताने में काफी मशक्कत करनी पड़ी कि पेड़ मानव जीवन के लिए कितने जरूरी हैं लेकिन जब विपरीत वातावरण में रोपे गए बांज के पौधे पेड़ बने और ग्रामीणों की चारे, लकड़ी की समस्या हल होने लगी तो इस अभियान से आठ गांव के लोग जुड़ गए हैं। करीब डेढ़ लाख से ज्यादा रोपे गए पौधों से अब बांज और औषधी के 10 घने जंगल तैयार हो गए हैं। भंडारी बताते हैं कि अब गांव के लोगों ने जंगलों के संरक्षण के लिए नौ समितियां बनाई है जिसमें करीब 85 महिलाएं जुड़ी हैं जो जंगल की देखभाल करने के साथ ही हर साल पौधे रोपण करती हैं।

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पूर्वजों की याद में तैयार किया पित्रवन

भंडारी ने बताया कि श्राद्ध पक्ष में अपने पित्रों को तर्पण देते हैं तो लगा क्यों न उन्हीं पूर्वजों के नाम पर पौधे रोपे जाए। इससे पेड़ की छाया, फल के रूप में वे हमारे साथ हमेशा रहेंगे और हम आने वाली पीड़ी को भी एक बेहतर पर्यावरण देंगे। फिर क्या था मुहिम रंग लाई और आज एक पितृ वन बनकर तैयार हो गया है जिसमें सैकड़ों पेड़ लोगों ने अपने पित्रों के नाम पर लगाए हैं।

 

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