इस विदेशी ने 14 साल तक देवभूमि को जाना, अब लिखेंगे किताब

ब्यूरो / अमर उजाला, देवप्रयाग Updated Tue, 06 Jun 2017 05:07 PM IST
stephen fayol
stephen fayol - फोटो : amar ujala
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उत्तराखंड की लोक वाद्यकला पर शोध कर रहे अमेरिकी शोधकर्ता स्टीफन फ्योल उर्फ फ्योंलीदास अपने अनुभवों को किताब के जरिए लोगों से साझा करेंगे। इस पुस्तक में वह पिछले 14 सालों के दौरान गढ़वाल और कुमाऊं के वादकों से ढोल-दमाऊं और जागर पर एकत्रित की गई जानकारी को पाठकों के सामने प्रस्तुत करेंगे।
अमेरिका के सिनसिनाटी विश्वविद्यालय में संगीत विभाग  के प्रो. स्टीफन फ्योल ने वर्ष 2003  में उत्तराखंड के लोक वाद्ययंत्र ढोल-दमाऊं पर शोध शुरू किया। उन्होंने देवप्रयाग स्थित नक्षत्र वेधशाला शोध केंद्र में आचार्य भास्कर जोशी से ढोल सागर के इतिहास और उसकी बारीकियों को समझते हुए इस परंपरा के सिद्धहस्त लोकवादकों की जानकारी भी एकत्रित की। 

इस सिलसिले में उन्होंने टिहरी जिले के देवप्रयाग ब्लाक के पुजार गांव में ढोलवादक सोहनलाल के साथ रहकर ढोल-दमाऊ की तालों, वार्ता व जागरों को सीखा। साथ ही उन्होंने अपना नाम फ्योंलीदास रखकर गढ़वाली और हिंदी भाषा भी सीखी। अमर उजाला के साथ बातचीत में उन्होंने बताया कि 1930 में उनके दादा अपने चार बेटों को पढ़ाने मसूरी आए थे।

बाद में उनके पिता अमेरिका में बस गए, लेकिन स्टीफन के मन उत्तराखंड बस हुआ था। वह 1999 में उत्तराखंड के साधु संतों से मिले। बाद में उन्होंने ढोल, दमाऊ और डौंर आदि वाद्ययंत्रों पर शोध शुरू किया। अब अमेरिका में उनके कई शिष्य ढोल दमाऊं बजाने में निपुण हो गए हैं। प्रो. ने बताया कि उत्तराखंड में शोध के दौरान उन्हें जो अनुभव मिले, उसको वह किताब का रुप देना चाहते हैं। 

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