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आयरन लेडी स्व इंदिरा गांधी का पहाङो की रानी मसूरी से रहा था विशेष लगाव ,मसूरी की हरियाली को बचाने के लिए किए थे इंदिरा ने विशेष
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देश की पहली महिला प्रधानमंत्री रहीं स्व. इंदिरा गांधी की मसूरी से कई यादें जुड़ी हैं। बाल्यकाल से ही इंदिरा गांधी का मसूरी में आना-जाना लगा रहा। आज जिस खूबसूरत हिल स्टेशन को निहारने के लिए देश दुनिया के लोग मसूरी पहुंचते हैं, उसकी हरियाली को बचाने के लिए पूर्व प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी की भूमिका अहम रही।
करीब 60 से 70 के दशक में जब मसूरी के जॉर्ज एवरेस्ट की पहाड़ी, हाथी पांव के जंगलों और कॉटमैकेंजी रोड स्थित पहाड़ियों को चूने के लिए खोदा जाता था। तब यहां हरियाली भी करीब समाप्ति की ओर थी। उस वक्त पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने हाथी पांव क्षेत्र की माइनिंग के कार्य को बंद करने के लिए व्यक्तिगत तौर पर प्रयास शुरू किए। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट को मसूरी की चूने की खदानों को बंद करने के लिए आगे आना पड़ा था। इंदिरा गांधी प्रयास नहीं करतीं तो आज मसूरी में हरियाली भी देखने को नहीं मिलती।
मसूरी के इतिहासकार जयप्रकाश उत्तराखंडी ने कहा कि 1930 में जब इंदिरा गांधी 13 साल की थीं। उस दौरान उनकी मां कमला नेहरू बहुत बीमार थीं। उन दिनों मसूरी में बेहतरीन चिकित्सा व्यवस्था थी। अपनी बीमार मां कमला नेहरू के साथ इंदिरा गांधी मसूरी में काफी लंबे समय तक रहीं। कहा कि 1937 में घनानंद स्कूल में मसूरी के एक अध्यापक मौलाना शफी जिलानी इंदिरा गांधी को उर्दू पढ़ाने उनके मसूरी स्थित घर आते थे। इंदिरा गांधी बतौर प्रधानमंत्री मसूरी 1970 के दशक और 1982 के आसपास भी आई थीं। वह यहां अक्सर कपूरथला प्रिंसेस सीता देवी के यहां ठहरतीं थीं। बताया कि मसूरी के कुछ प्रमुख नागरिकों की मांग पर उन्होंने लाइब्रेरी-मार्डन स्कूल से हाथी पांव जाने वाले चूनापत्थर के ट्रकों की आवाजाही बंद करवाई। बताया इस मार्ग से कई चूने के ट्रक गुजरते थे, जिसके चलते इन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ता था। इसके बाद प्रशासन ने इस रोड का नाम मोतीलाल नेहरू रोड कर दिया था। 1972 में राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी के नामकरण समारोह में इंदिरा गांधी मसूरी पहुंचीं थीं।
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नाली किनारे स्थापित की है स्व. इंदिरा गांधी की प्रतिमा
यह दुर्भाग्य ही है कि जिन्होंने मसूरी की सुंदरता को बचाने के लिए कई प्रयास किए। उनकी प्रतिमा को मालरोड पर नाली किनारे स्थापित किया गया है। यहां अक्सर गदंगी और कचरा फैला रहता है। इस संबंध में नगर पालिका अध्यक्ष अनुज गुप्ता ने बताया कि स्व. इंदिरा गांधी की प्रतिमा को अन्य स्थान पर शिफ्ट करने का प्रयास किया जाएगा।
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करीब 60 से 70 के दशक में जब मसूरी के जॉर्ज एवरेस्ट की पहाड़ी, हाथी पांव के जंगलों और कॉटमैकेंजी रोड स्थित पहाड़ियों को चूने के लिए खोदा जाता था। तब यहां हरियाली भी करीब समाप्ति की ओर थी। उस वक्त पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने हाथी पांव क्षेत्र की माइनिंग के कार्य को बंद करने के लिए व्यक्तिगत तौर पर प्रयास शुरू किए। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट को मसूरी की चूने की खदानों को बंद करने के लिए आगे आना पड़ा था। इंदिरा गांधी प्रयास नहीं करतीं तो आज मसूरी में हरियाली भी देखने को नहीं मिलती।
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मसूरी के इतिहासकार जयप्रकाश उत्तराखंडी ने कहा कि 1930 में जब इंदिरा गांधी 13 साल की थीं। उस दौरान उनकी मां कमला नेहरू बहुत बीमार थीं। उन दिनों मसूरी में बेहतरीन चिकित्सा व्यवस्था थी। अपनी बीमार मां कमला नेहरू के साथ इंदिरा गांधी मसूरी में काफी लंबे समय तक रहीं। कहा कि 1937 में घनानंद स्कूल में मसूरी के एक अध्यापक मौलाना शफी जिलानी इंदिरा गांधी को उर्दू पढ़ाने उनके मसूरी स्थित घर आते थे। इंदिरा गांधी बतौर प्रधानमंत्री मसूरी 1970 के दशक और 1982 के आसपास भी आई थीं। वह यहां अक्सर कपूरथला प्रिंसेस सीता देवी के यहां ठहरतीं थीं। बताया कि मसूरी के कुछ प्रमुख नागरिकों की मांग पर उन्होंने लाइब्रेरी-मार्डन स्कूल से हाथी पांव जाने वाले चूनापत्थर के ट्रकों की आवाजाही बंद करवाई। बताया इस मार्ग से कई चूने के ट्रक गुजरते थे, जिसके चलते इन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ता था। इसके बाद प्रशासन ने इस रोड का नाम मोतीलाल नेहरू रोड कर दिया था। 1972 में राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी के नामकरण समारोह में इंदिरा गांधी मसूरी पहुंचीं थीं।
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नाली किनारे स्थापित की है स्व. इंदिरा गांधी की प्रतिमा
यह दुर्भाग्य ही है कि जिन्होंने मसूरी की सुंदरता को बचाने के लिए कई प्रयास किए। उनकी प्रतिमा को मालरोड पर नाली किनारे स्थापित किया गया है। यहां अक्सर गदंगी और कचरा फैला रहता है। इस संबंध में नगर पालिका अध्यक्ष अनुज गुप्ता ने बताया कि स्व. इंदिरा गांधी की प्रतिमा को अन्य स्थान पर शिफ्ट करने का प्रयास किया जाएगा।