गंगा-यमुना बचाने को ‘भगीरथ’ बने मोहम्मद सलीम
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जिस यमुना नदी के किनारे मोहम्मद सलीम का बचपन बीता, प्रदूषण और गंदगी से हो रही उसकी दुर्दशा ने उन्हें अंदर तक हिला दिया। नदी की सफाई और संरक्षण को लेकर उन्होंने तमाम प्रयास किये लेकिन कोई सफलता नहीं मिली।
थक-हारकर करीब दो वर्ष पूर्व उन्होंने हाईकोर्ट की शरण ली। हाईकोर्ट ने न केवल उनकी याचिका स्वीकार की बल्कि सुनवाई करते हुए दोनों नदियों को भारतीय नागरिक का दर्जा भी दिया। कोर्ट के इस ऐतिहासिक निर्णय के बाद दोनों नदियों की दशा में सुधार की उम्मीद जगने लगी है।
गंगा-यमुना के संरक्षण के लिए आधुनिक युग के ‘भगीरथ’ बने मोहम्मद सलीम ने बताया कि बचपन में उनका घर यमुना नदी के किनारे हुआ करता था। नदी के साथ उनका और उनके परिवार का गहरा नाता था। पीने से लेकर नहाने तक के लिए नदी के पानी का इस्तेमाल होता था। लेकिन वक्त बीतने के साथ-साथ गंदगी और प्रदूषण से नदी की हालत खराब होने लगी।
वह नदी के संरक्षण और संवर्द्धन के लिए अपने स्तर से प्रयास करते लेकिन इसका कोई फायदा नहीं मिल सका। उन्होंने नदियों में गिरने वाले गंदे नालों, कूड़े और गंदगी पर रोक लगाने को जन सहभागिता से अभियान भी चलाया। इससे भी जब नदियों को कोई फायदा नहीं मिली तो उन्होंने हाईकोर्ट का रुख किया।
सरकार भी जिम्मेदार
नदियों का गला घोटने में सरकार भी कम जिम्मेदार नहीं है। पहाड़ में जल विद्युत परियोजनाओं के डैम के रूप में अधिकांश नदियों को बंधक बना लिया गया है।
विशेषज्ञों के अनुसार, रुका हुआ पानी अक्सर प्रदूषित हो जाता है। वहीं बीच के कई स्थानों पर नदी पूरी तरह सूख चुकी है। वहीं बड़ी संख्या में गिरने वाले नालों, कूड़े और गंदगी पर भी सरकार रोक नहीं लगा पा रही है।
हरिद्वार से आगे कैसे सुधरेंगे हालात
हाईकोर्ट के आदेश के बाद राज्य में नदियों के हालात सुधरने की उम्मीद की जा रही है। हालांकि सलीम हरिद्वार से आगे गंगा की निर्मलता और अविरलता को लेकर भी चिंतित हैं। वह कहते हैं कि उत्तर भारत को जीवन देने वाली दोनों नदियों के उद्गम से सागर में मिलने तक संरक्षण और संवर्द्धन के प्रयास किए जाने चाहिए।