फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttarakhand ›   Dehradun News ›   Rare species of moss found in Badrinath, Biodiesel, discovery of Microbiology Department of Garhwal University

बदरीनाथ में मिली काई की दुर्लभ प्रजाति: बायोडीजल का बन सकती है विकल्प, गुजरात सहित दो देशों में ही है पाई गई

Mon, 11 Jul 2022 05:26 PM IST
रेनू सकलानी संदीप थपलियाल, संवाद न्यूज एजेंसी, श्रीनगर
संदीप थपलियाल, संवाद न्यूज एजेंसी, श्रीनगर Published by: रेनू सकलानी Updated Mon, 11 Jul 2022 05:26 PM IST
सार

बदरीनाथ में तप्तकुंड के नीचे स्थित नारद कुंड की दीवार से शैवाल के नमूने लिए थे। इस कुंड में तप्त कुंड का गर्म पानी गिरता है। पानी का तापमान 30 से 40 डिग्री सेल्सियस रहता है। दुर्लभ प्रजाति के सूक्ष्म शैवाल मिलने के बाद बायो डीजल बनाने में इसकी उपयोगिता पर शोध किया गया।

विज्ञापन
Rare species of moss found in Badrinath, Biodiesel, discovery of Microbiology Department of Garhwal University
बदरीनाथ में मिली काई की दुर्लभ प्रजाति - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

एचएनबी गढ़वाल (केंद्रीय) विश्वविद्यालय के वनस्पति एवं सूक्ष्म जैविकी (बॉटनी एंड माइक्रोबायोलॉजी) विभाग ने बदरीनाथ के नारद कुंड में दुर्लभ प्रजाति के सूक्ष्म शैवाल (काई) की खोज की है। यह शैवाल अभी तक भारत के गुजरात प्रदेश सहित दो देशों में ही पाया गया है। सूडोबोहलिनिया नामक यह सूक्ष्म शैवाल बायो डीजल (जैव ईंधन) का सर्वोत्तम विकल्प बन सकता है।

विज्ञापन


गढ़वाल विवि के बॉटनी एंड माइक्रोबायोलॉजी विभाग के सहायक प्रो. डॉ.  धनंजय कुमार के निर्देशन में शोध कर रही प्रीति सिंह ने दुर्लभ प्रजाति के सूक्ष्म शैवाल को खोजने के साथ ही इसकी उत्पादकता का विश्लेषण किया है। उन्होंने बदरीनाथ में तप्तकुंड के नीचे स्थित नारद कुंड की दीवार से शैवाल के नमूने लिए थे। इस कुंड में तप्त कुंड का गर्म पानी गिरता है। पानी का तापमान 30 से 40 डिग्री सेल्सियस रहता है।
विज्ञापन


दीवार से नमूने लेने के बाद उन्होंने विभाग की प्रयोगशाला में इसका उत्पादन किया। एक साल तक चले अध्ययन में उन्हें सामान्य शैवाल के साथ ही चार सूक्ष्म शैवाल की प्रजातियां मिलीं। इनमें तीन तो अन्य जगहों पर देखी गईं थी लेकिन एक प्रजाति बिल्कुल अलग मिली।

विज्ञापन
विज्ञापन

 

लगभग 5 माइक्रोमीटर के इस शैवाल की बाहरी सतह पर कांटों के समान आकृति देखी गई। प्रीति बताती हैं कि इसके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं मिली। यह प्रजाति इससे पूर्व वर्ष 1980 में गुजरात में देखी गई थी। साथ ही वर्ष 1966 में अमरीका और वर्ष 1987 में बंग्लादेश में भी इसे देखा गया था।

तेजी से फैलता है और लिपिड भी ज्यादा

दुर्लभ प्रजाति के सूक्ष्म शैवाल मिलने के बाद बायो डीजल बनाने में इसकी उपयोगिता पर शोध किया गया। भारत में कुछ स्थानों पर शैवाल से बायो डीजल बनाने का काम चल रहा है। प्रीति ने बताया कि यह शैवाल तेजी से फैलता है और इसमें लिपिड (वसा) की भी अच्छी खासी मात्रा होती है। विश्वविद्यालय की एल्गल लैब में शोधकर्ताओं ने लगभग 109 प्रजाति के शैवालों में लिपिड का तुलनात्मक अध्ययन किया। सामान्यतया शैवाल में 25 से 30 फीसदी लिपिड मिलता है। वहीं, सूडोबोहलिनिया में सामान्य परिस्थिति में सबसे अधिक 33 फीसदी लिपिड मिला। अनुकूल वातावरण मिलने पर लिपिड की मात्रा काफी बढ़ गई जो बायो डीजल बनाने के लिए काफी बेहतर है। लिपिड ही बायो डीजल का प्रमुख स्रोत है।

ये भी पढ़ें...शुरुआती दौर में ही हांफने लगा रोपवे: 25 मिनट तक हवा में ही अटकी रहीं लोगों की सांसे, तस्वीरों में देखें आफत के वो पल

शैवाल पर काम की जरूरत

पेट्रोलियम ईंधन की सीमित मात्रा को देखते हुए विकल्प के तौर पर बायो डीजल पर जोर दिया जा रहा है। केंद्र सरकार की बायोफ्यूल नीति के तहत पेट्रोलियम ईंधन मेें 20 प्रतिशत तक बायो डीजल मिलाने का लक्ष्य है लेकिन यह लक्ष्य पूरा नहीं हो पा रहा है। यदि सरकार सूक्ष्म शैवाल के उत्पादन पर जोर देती है तो सूडोबोहलिनिया जैसी प्रजातियां बेहतर विकल्प बन सकती हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed