राजधानी पर राजनीति: अभी तो दूर लग रही है गैरसैंण की राह
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गैरसैंण में राजधानी के सवाल पर सरकार खामोश है। उसकी खामोशी तोड़ने के लिए विपक्ष ने खूब उलाहने दिए, ताने मारे और जब बात बनती नहीं दिखी तो उसने मौजूदा सत्र को ही अलविदा कर दिया। विपक्ष के इस व्यवहार से सरकार कतई स्तब्ध नहीं थी। बकौल सीएम, वो हमें राजधानी के सवाल पर फंसाना चाहते हैं? लेकिन हम उनके झांसे में आने वाले नहीं।
उधर, पक्ष-विपक्ष की राजधानी पर छिड़ी जुबानी जंग से जुदा समूचा गैरसैंण इस उम्मीद में है कि करोड़ों रुपये से जो तामझाम जुटाया गया है, सरकार कुछ तो करके ही जाएगी। मगर सदन के भीतर और बाहर पहले दिन जो सियासी तमाशा देखने को मिला है, उससे गैरसैंण की राह अभी दूर ही नजर आ रही है।
गैरसैंण के मुद्दे पर सत्र के पहले दिन सरकार जितनी असंवदेनशील दिखी, विपक्ष का व्यवहार भी उतना ही गैर जिम्मेदाराना रहा। देहरादून में जहां विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच गैरसैंण को राजधानी बनाने की सियासी रोटियां सेंकी जाती है। उसी के लिए आज सत्ता पक्ष और विपक्ष अपनी सियासी बंदूक चलाने के लिए एक दूसरे का कंधा तलाशते रहे।
गैरसैंण से जुड़ा एक भी विधेयक नहीं रखा पटल पर
गैरसैंण को राजधानी और उससे पहले जिला बनाने को लेकर सरकार का रुख स्पष्ट नहीं था तो विपक्ष ने भी प्रतीकात्मक विरोध कर भोजनावकाश के बाद सदन से वॉकआउट कर दिया। आलम यह रहा है कि विधानसभा सत्र के पहले दिन सरकार ने जितने भी विधेयक या अन्य प्रपोजल रखे उनमें से कोई भी गैरसैंण या स्थानीय लोगों के लिए नहीं थे।
जो गैरसैंण बरसों से राज्य की राजनीति की धूरी बना हुआ है उसी गैरसैंण में पहुंचकर सत्ता पक्ष और विपक्ष ने जनभावनाओं के अनुरूप सदन में चर्चा करना तक जरूरी नहीं समझा।
सबसे अजीबोगरीब स्थिति उत्तराखंड क्रांति दल की रही, जिसके एकमात्र विधायक और कैबिनेट मंत्री प्रीतम सिंह पंवार की इस मुद्दे पर मौजूदगी तक का अहसास भी नहीं हुआ। जबकि उक्रांद राज्य के गठन में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले दल होने का दम भरता है।
राजधानी का मुद्दा बना पहेली
दरअसल, गैरसैंण का राजधानी बनना एक पहेली बन गया है। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की नियत में ही खोट नजर आता है, लेकिन राजनीति क्या नहीं करवाती। करीब एक साल पहले सदन में जब हरिद्वार के विधायक मदन कौशिक ने गैरसैंण को अस्थाई राजधानी बनाने का संकल्प रखा तो सत्ता पक्ष ने उसे बहुमत से गिरा दिया।
अब चूंकि चुनाव से पहले विधानसभा का यह अंतिम सत्र है, इसलिए गैरसैंण को कोई बड़ा ओहदा देने की संभावनाएं तेजी से क्षीण होती दिख रही हैं। आज भी मुख्यमंत्री से मीडिया और स्थानीय लोगों ने गैरसैंण को राजधानी और जिला बनाने की मांग की तो वे बड़ी सफाई से भाजपा के कंधे पर बंदूक रखकर टाल गए।
उन्होंने विधानसभा परिसर की ओर इशारा कर इतना भर कहा कि देखिए शुरुआत तो हमने कर दी है। उधर, भाजपा विधानमंडल दल के मुख्य सचेतक मदन कौशिक ने मौके पर मुख्यमंत्री को स्वयं द्वारा लिए गए गैरसैंण राजधानी के संकल्प की याद दिलाई।
फिलहाल शुक्रवार को सदन में चलने वाली कार्यवाही तय करेगी कि कांग्रेस का चुनाव से पहले गैरसैंण को लेकर क्या रुख रहता है और इसी दिन से चुनावी शंखनाद की स्थिति भी बनेगी, जिसमें गैरसैंण पर दोनों दलों की बरसों से चली आ रही सियासत का पटाक्षेप भी होगा। इतना तय है पांच साल से सत्तारूढ़ कांग्रेस से पब्लिक गैरसैंण का हिसाब मांग सकती है।