35 साल से हर शिवरात्रि पर कर रहे ऐसा कि अब बना दिया रिकॉर्ड
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पर्यटन उनकी रग-रग में बसा है, यही उनका शौक, यही जुनून और यही व्यवसाय भी है। इसी जुनून के चलते नैनीताल के इस पर्यटन व्यवसायी ने 35 वर्ष पूर्व स्वयं से एक कठिन वादा किया।
अब 35 वर्ष बाद उसी वादे को निभाने वह शिवरात्रि के अवसर पर काठमांडू पशुपतिनाथ के दरबार में पहुंच गए हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि उनका यह काम गिनीज बुक के रिकॉर्ड में दर्ज होने लायक हो। रिकॉर्ड इसलिए कि वह वहां शिवरात्रि पर 35वीं बार गए हैं, वह भी हर साल लगातार। इस अनोखे जुनून ने खाती के खाते में एक खास ख्याति जोड़ दी है।
नैनीताल में पर्यटन यात्राओं के पर्याय बन चुके वाईटीडीओ के संस्थापक विजय मोहन सिंह खाती नैनीताल से भारत के कोने-कोने के लिए प्रतिवर्ष धार्मिक आदि स्थलों की यात्राएं आयोजित करते हैं। यूरोप, दुबई, थाईलैंड, मॉरीशस सहित तमाम देशों के टूर भी आयोजित करते हैं। खाती के टूरों को लोगों ने बहुत पसंद किया और आज उनका टूर प्रोग्राम जारी होते ही बुकिंग फुल हो जाती है लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि खाती स्वयं भी पर्यटन को इतने समर्पित हैं कि 35 वर्षों से निर्बाध रूप से हर शिवरात्रि पर नेपाल जाते हैं।
अंतर है तो इतना कि पहले दो दशक तक वह अकेले या अपने एक दो साथियों के साथ वहां जाते थे। अब श्रद्धालुओं का टूर लेकर जाते हैं। खाती बताते हैं कि वे सबसे पहले 1973 में शिवरात्रि पर नेपाल गए। इसके बाद 1983 में गए। इस बार उन्हें वहां कुछ ऐसी दैवी प्रेरणा हुई कि उन्होंने निश्चय किया कि जब तक शरीर साथ देगा वह यहां शिवरात्रि पर हर वर्ष आएंगे।
माओवाद के बाद भी जान हथेली पर रखकर पशुपतिनाथ
अगले दो वर्ष वहां के हालात और भी बिगड़ गए लेकिन खाती जान हथेली पर रख कर हर वर्ष फिर भी वहां हर वर्ष जाते रहे। हालात सामान्य होने पर खाती 10 वर्षों तक अपनी पत्नी को भी साथ ले गए। खाती बताते हैं पहले वह बंगाल से कंचनपुर होकर जाते थे, फिर बिहार के रक्सौल विराटनगर होते हुए जाने लगे, उसके बाद गोरखपुर अयोध्या भैरवा होकर जाने लगे। अब महेंद्रनगर बुटवल पोखरा होकर जाते हैं। महेंद्रनगर से काठमांडू 800 किमी मार्ग भारत की मदद से बना है जो बहुत बढ़िया बनाया गया है।
खाती बताते हैं इन 35 वर्षों में वहां भी व्यापक परिवर्तन आया है। पहले वहां हिप्पी कल्चर था। नशे का बेहद ज्यादा चलन था। बेरोजगारी, भ्रष्टाचार चरम पर था, अब इनमें बहुत बदलाव आया है। लोग रोजगार के प्रति जागरूक हुए हैं लेकिन समाज में गरीब, अमीर के बीच की खाई बहुत गहरी है। एक ओर भारी गरीबी है तो एक वर्ग हॉलीवुड स्टाइल में जीवन जी रहा है। खाती ने बताया कि वहां से श्रमिक, कुली के रूप में रोजगार की तलाश में भारत आने के बजाय लोग अब दुबई, खाड़ी देशों को प्राथमिकता दे रहे हैं।
बगैर पैसों के घूम आए दस देश
सैर कर दुनिया की गाफिल जिंदगानी फिर कहां, जिंदगानी गर रही तो ये जवानी फिर कहां। राहुल सांकृत्यायन ने जब ये प्रसिद्ध उक्ति कही थी तो शायद उन्हें भी भरोसा नहीं रहा होगा कि उनकी नसीहत पर कोई इस सीमा तक अमल करेगा, पर खाती ने ऐसा ही किया। खाती के दिल में पर्यटन को लेकर बचपन से ही दीवानगी की हद तक जुनून था।
संयोग से उन्हें अपने जैसा शौक रखने वाले राजा साह, राजीव पांडे, योगेश साह का साथ मिल गया। 1976 में डिग्री कॉलेज में पढ़ाई के दौरान वह बगैर जेब में पैसे के विश्व भ्रमण पर निकल पड़े। उन्होंने मुख्यत: सड़क मार्ग से महीनों की यात्रा कर अफगानिस्तान, ईरान, तुर्की, जॉर्डन, सीरिया, मिश्र, ग्रीस, इटली, यूगोस्लाविया, बुल्गारिया का भ्रमण किया। खाती बताते हैं कि इस दौरान उन्होंने ईरान में निर्माण कार्य में श्रमिक, सीरिया की फैक्ट्री में, जॉर्डन में होटल में काम कर खर्चा जुटाया।
इनके परिवारजनों की तो इनकी सुरक्षित वापसी की उम्मीद भी टूटने लगी थी। बाद में खाती ने इन साथियों के साथ नेपाल सहित उत्तराखंड के अनेक ग्लेशियर, बुग्यालों की भी यात्रा की। वह अमेरिका, चीन, यूरोप सहित विश्व के कई देशों का भ्रमण कर चुके हैं। उम्र के इस पड़ाव पर भी हर वर्ष किसी नए देश की यात्रा अवश्य करते हैं। अपने शौक को ही व्यवसाय भी बना चुके खाती ने युवाओं को पर्यटन के प्रति जागरूक करने को 1982 में नैनीताल में यूथ टूरिज्म डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन की स्थापना भी की।