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फोरेंसिक लैब में आधुनिक मशीनें उपलब्ध पर वैज्ञानिक नहीं
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स्मार्ट पुलिसिंग योजना के तहत फोरेंसिक लैब को लगातार अपग्रेड किया जा रहा है। नई-नई मशीनें भी आ रहीं, लेकिन इन पर जांच करने वाले वैज्ञानिकों की कमी अब तक दूर नहीं हो सकी है। हालात ये हैं कि निज वैैज्ञानिकों और विशेषज्ञों के भरोसे लैब शुरू की गई थी, उनकी मदद को अभी तक कोई नया नहीं आया है। इस दौरान सेवानिवृत्त जरूर हो गए हैं। वर्तमान में आधे से ज्यादा पद खाली हैं।
प्रदेश की विधि विज्ञान प्रयोगशाला (फोरेंसिक लैब) में डीएनए, डॉक्यूमेंट जांच, बैलेस्टिक, फिजिक्स, ऑडियो जांच आदि की व्यवस्था है। अत्याधुनिक मशीनें भी यहां पर मुहैया हैं। हाल ही में डीएनए के लिए एक बेहद आधुनिक प्रोफाइलिंग मशीन भी खरीदी गई थी, लेकिन वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों की कमी बनी हुई है। फोरेंसिक लैब के संचालन के लिए 105 पद स्वीकृत हैं। इनमें वैज्ञानिक, विशेषज्ञ, लैब सहायक आदि शामिल हैं, लेकिन इनमें से 65 पद खाली हैं।
पुलिस की ओर से इन सबकी भर्ती के लिए उत्तराखंड लोक सेवा आयोग को प्रस्ताव भेजे गए। फिलहाल, यहां से आठ वैज्ञानिकों की भर्ती के लिए प्रस्ताव भेजा गया था। इनके लिए आयोग ने विज्ञप्ति भी जारी कर दी, मगर अभी तक किसी वैज्ञानिक अधिकारी की भर्ती नहीं हो पाई है। हालांकि, पुलिस अधिकारी लगातार इसके लिए प्रयास कर रहे हैं। इन वैज्ञानिकों व विशेषज्ञों की कमी से वर्तमान में लंबित जांचों की संख्या भी बढ़ती जा रही है। कई अनुभागों में ऐसी 1200 से भी अधिक जांचें लंबित हैं।
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पेंडेंसी एक साल से भी अधिक
डीएनए प्रोफाइलिंग किसी भी लैंगिक अपराध की विवेचना में सबसे अधिक महत्वपूर्ण मानी जाती है। हत्या और गुमशुदगी में भी इसमें पीड़ितों को न्याय दिलाने में यह कारगर साबित होती है, लेकिन इनकी पेंडेंसी बढ़ती जा रही है। प्रयोगशाला में 550 से भी ज्यादा जांचें लंबित हैं, जो एक वर्ष तक पुरानी हैं। कारण है कि यहां सिर्फ एक ही वैैज्ञानिक काम करते हैं। उनकी सहायता के लिए एक सहायक मौजूद है, जबकि जरूरत यहां पर कम से कम चार वैज्ञानिकोें की है। इसके लिए प्रस्ताव भी भेजा गया है।
पॉक्सो में सबसे अधिक महत्वपूर्ण
नाबालिगों के साथ दुष्कर्म के मामलों में इसकी सबसे अधिक महत्ता होती है। मामले पॉक्सो कोर्ट में चलते हैं। यहां केवल तीन महीने के भीतर डीएनए जांच पूरी कर कोर्ट में दाखिल करनी होती है, मगर वैज्ञानिक न होने से पॉक्सो कोर्ट के मामले भी देरी से हो रहे हैं। पूरे देश में अधिकतर फोरेंसिक लैब में एक एक्सपर्ट एक महीने में ज्यादा से ज्यादा 20 जांच करता है, मगर उत्तराखंड में 50 जांच करने के बाद भी पेंडेंसी कम नहीं हो पा रही है।
साइंस बैकग्राउंड के पुलिसकर्मी कर रहे मदद
पुलिस इस काम में मदद के लिए भी किससे कहे। इसके लिए अपने ही विभाग के कर्मचारियों पर नजर जाती है। यहां पर पुलिस के उन सिपाहियों की मदद भी ली जा रही, जो साइंस बैकग्राउंड के हैं। यानी जिन्होंने बीएससी या एमएससी की पढ़ाई की है। अन्य ड्यूटी में जरूरत होने पर इन्हें यहां से भी बुला लिया जाता है।
डॉक्यूमेंट सेक्शन में अब नहीं कोई विशेषज्ञ
डॉक्यूमेंट सेक्शन भी फोरेंसिक में अहम रोल अदा करता है। सुसाइड नोट, दस्तावेजों की सत्यता आदि जांचकर बड़े मामलों में पुलिस की मदद की जाती है। यह सेक्शन भी एक ही वैज्ञानिक के भरोसे चल रहा था, लेकिन पिछले महीने वैज्ञानिक भी सेवानिवृत्त हो गए हैं। फौरी तौर पर इस सेक्शन को चलाने के लिए एक कर्मचारी को ट्रेनिंग पर भेजा गया है।
फोरेंसिक लैब को लगातार अपडेट किया जा रहा है। हमारी फोरेंसिक लैब के एक्सपर्ट ने बहुत से ऐसी बड़ी और जटिल जांचें की हैं, जो नजीर बनी हैं। जहां तक खाली पदों को भरने की बात है, तो इसके लिए समय-समय पर प्रस्ताव भेजे जा रहे हैं। आयोग ने कुछ पदों के लिए विज्ञप्ति भी निकाली हैं।
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प्रदेश की विधि विज्ञान प्रयोगशाला (फोरेंसिक लैब) में डीएनए, डॉक्यूमेंट जांच, बैलेस्टिक, फिजिक्स, ऑडियो जांच आदि की व्यवस्था है। अत्याधुनिक मशीनें भी यहां पर मुहैया हैं। हाल ही में डीएनए के लिए एक बेहद आधुनिक प्रोफाइलिंग मशीन भी खरीदी गई थी, लेकिन वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों की कमी बनी हुई है। फोरेंसिक लैब के संचालन के लिए 105 पद स्वीकृत हैं। इनमें वैज्ञानिक, विशेषज्ञ, लैब सहायक आदि शामिल हैं, लेकिन इनमें से 65 पद खाली हैं।
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पुलिस की ओर से इन सबकी भर्ती के लिए उत्तराखंड लोक सेवा आयोग को प्रस्ताव भेजे गए। फिलहाल, यहां से आठ वैज्ञानिकों की भर्ती के लिए प्रस्ताव भेजा गया था। इनके लिए आयोग ने विज्ञप्ति भी जारी कर दी, मगर अभी तक किसी वैज्ञानिक अधिकारी की भर्ती नहीं हो पाई है। हालांकि, पुलिस अधिकारी लगातार इसके लिए प्रयास कर रहे हैं। इन वैज्ञानिकों व विशेषज्ञों की कमी से वर्तमान में लंबित जांचों की संख्या भी बढ़ती जा रही है। कई अनुभागों में ऐसी 1200 से भी अधिक जांचें लंबित हैं।
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पेंडेंसी एक साल से भी अधिक
डीएनए प्रोफाइलिंग किसी भी लैंगिक अपराध की विवेचना में सबसे अधिक महत्वपूर्ण मानी जाती है। हत्या और गुमशुदगी में भी इसमें पीड़ितों को न्याय दिलाने में यह कारगर साबित होती है, लेकिन इनकी पेंडेंसी बढ़ती जा रही है। प्रयोगशाला में 550 से भी ज्यादा जांचें लंबित हैं, जो एक वर्ष तक पुरानी हैं। कारण है कि यहां सिर्फ एक ही वैैज्ञानिक काम करते हैं। उनकी सहायता के लिए एक सहायक मौजूद है, जबकि जरूरत यहां पर कम से कम चार वैज्ञानिकोें की है। इसके लिए प्रस्ताव भी भेजा गया है।
पॉक्सो में सबसे अधिक महत्वपूर्ण
नाबालिगों के साथ दुष्कर्म के मामलों में इसकी सबसे अधिक महत्ता होती है। मामले पॉक्सो कोर्ट में चलते हैं। यहां केवल तीन महीने के भीतर डीएनए जांच पूरी कर कोर्ट में दाखिल करनी होती है, मगर वैज्ञानिक न होने से पॉक्सो कोर्ट के मामले भी देरी से हो रहे हैं। पूरे देश में अधिकतर फोरेंसिक लैब में एक एक्सपर्ट एक महीने में ज्यादा से ज्यादा 20 जांच करता है, मगर उत्तराखंड में 50 जांच करने के बाद भी पेंडेंसी कम नहीं हो पा रही है।
साइंस बैकग्राउंड के पुलिसकर्मी कर रहे मदद
पुलिस इस काम में मदद के लिए भी किससे कहे। इसके लिए अपने ही विभाग के कर्मचारियों पर नजर जाती है। यहां पर पुलिस के उन सिपाहियों की मदद भी ली जा रही, जो साइंस बैकग्राउंड के हैं। यानी जिन्होंने बीएससी या एमएससी की पढ़ाई की है। अन्य ड्यूटी में जरूरत होने पर इन्हें यहां से भी बुला लिया जाता है।
डॉक्यूमेंट सेक्शन में अब नहीं कोई विशेषज्ञ
डॉक्यूमेंट सेक्शन भी फोरेंसिक में अहम रोल अदा करता है। सुसाइड नोट, दस्तावेजों की सत्यता आदि जांचकर बड़े मामलों में पुलिस की मदद की जाती है। यह सेक्शन भी एक ही वैज्ञानिक के भरोसे चल रहा था, लेकिन पिछले महीने वैज्ञानिक भी सेवानिवृत्त हो गए हैं। फौरी तौर पर इस सेक्शन को चलाने के लिए एक कर्मचारी को ट्रेनिंग पर भेजा गया है।
फोरेंसिक लैब को लगातार अपडेट किया जा रहा है। हमारी फोरेंसिक लैब के एक्सपर्ट ने बहुत से ऐसी बड़ी और जटिल जांचें की हैं, जो नजीर बनी हैं। जहां तक खाली पदों को भरने की बात है, तो इसके लिए समय-समय पर प्रस्ताव भेजे जा रहे हैं। आयोग ने कुछ पदों के लिए विज्ञप्ति भी निकाली हैं।