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राजजातः 14 साल बाद भाई लाटू से मिली नंदा

Sun, 31 Aug 2014 12:27 AM IST
अमर उजाला, देहरादून
अमर उजाला, देहरादून Updated Sun, 31 Aug 2014 12:27 AM IST
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maa nanda met her brother laatu

नंदा राजजात यात्रा में 14 साल बाद आखिरकार वह क्षण आया, जब नंदा अपने भाई लाटू से मिल पाई। सुबह ठीक 9.35 बजे निर्जन पड़ाव की यात्रा के लिए निकली नंदा वाण गांव से करीब एक किमी ऊपर लाटू देवता के मंदिर में पहुंची, तो मंदिर का नजारा ही बदल गया।

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कुरूड़ की नंदा के साथ-साथ लाता की डोली और सप्तकुंड की डोली सहित अन्य डोलियां और छंतोलियां मंदिर में पहुंची। पूजा-अर्चना के बीच लाटू मंदिर से बाहर निकले, तो पहले कटार भेंट कर उन्होंने नंदा की परीक्षा ली। नंदा इस परीक्षा में पास हुई तो उसके बाद वर्षों बाद मिले भाई-बहन का मिलन हो पाया।
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लाटू सीधे-साधे देवता है और ज्यादा बोल नहीं पाते हैं। हावभाव में लाटू ने बहन नंदा के आगे की यात्रा के लिए पथ-प्रदर्शक होने का निमंत्रण स्वीकार किया।

ठीक 10.35 मिनट पर लाटू की अगुवाई में नंदा अब कैलास यात्रा के लिए रवाना हो गई। आगे के निर्जन पड़ाव है और लाटू की अगुवाई में ही अन्य डोलियां और देव छंतोलियां आगे बढ़ रही है। यात्रा देर शाम रणकधार होते हुए गैरोली पातल पहुंची है। यहां देवी खुले आसमान के नीचे विश्राम करेगी।

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पहले निर्जन पड़ाव में खुली व्यवस्थाओं की पोल

maa nanda met her brother laatu

यात्रा के पहले निर्जन पड़ाव में मुख्यमंत्री हरीश रावत के दावों कलई खुलकर सामने आ गई। गैरोली पातल में देवी भगवती के जयकारे के बजाय उत्तराखंड सरकार के खिलाफ खूब नारेबाजी हुई। ज्यादा गुस्सा यात्रा समिति को है।

आरोप है कि सारी व्यवस्था अपने हाथ में लेने वाली सरकार ने निर्जन पड़ाव में भी कोई व्यवस्था नहीं की है। यात्रियों का कहना है कि वे रविवार को बेदनी पहुंच रहे मुख्यमंत्री हरीश रावत का विरोध करेंगे।

छोटी सी जगह गैरोली पातल में 100 से अधिक टेंट लगे हैं, लेकिन बरसात और नम मौसम के चलते ये टेंट यात्रियों को राहत देने वाले साबित नहीं हो रहे हैं। वन विभाग की चौकी में एक दुकान लगी है, जिसमें दुगने रेट पर यात्रियों को सामान दिया जा रहा है।

सरकार की तरफ पड़ाव पर नि:शुल्क भोजन व्यवस्था का दावा किया गया था, पर गैरोली पातल में ऐसी कोई व्यवस्था यात्रियों को नहीं मिली। खुद पड़ाव अधिकारी यह कहकर अपना पल्ला झाड़ते रहे कि उन्होंने तीन दिन से खाना नहीं खाया है।

मुसीबत यह है कि यात्रा का यह पहला निर्जन पड़ाव है और सारी छंतोलियों और डोलियों को यहीं पर रात्रि विश्राम करना है।

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