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Election 2024:...और ये धारणा टूट गई 'बोलंदा बदरीनाथ कभी नहीं हारते', राजनीतिक घटनाओं का एक चौंकाने वाला मोड़

Thu, 21 Mar 2024 01:57 PM IST
रेनू सकलानी शीशपाल गुसाईं, स्वतंत्र पत्रकार
शीशपाल गुसाईं, स्वतंत्र पत्रकार Published by: रेनू सकलानी Updated Thu, 21 Mar 2024 01:57 PM IST
सार

टिहरी गढ़वाल के महाराजा मानवेंद्र शाह को टिहरी गढ़वाल के लोग चुनावों में विजयी होते देखने के आदी थे और कई लोग उन्हें अपराजेय मानते थे, लेकिन पैन्यूली की जीत ने इस धारणा को तोड़ दिया और साबित कर दिया कि शाह अजेय नहीं थे।

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Lok Sabha Election 2024 Uttarakhand This belief was broken Bolanda Badrinath never loses
महाराजा मानवेंद्र शाह और  परिपूर्णानंद पैन्यूली - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

यह राजनीतिक घटनाओं का एक चौंकाने वाला मोड़ था जब टिहरी गढ़वाल के महाराजा मानवेंद्र शाह को बतौर निर्दलीय उम्मीदवार 1971 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार और स्वतंत्रता सेनानी परिपूर्णानंद पैन्यूली के हाथों हार का सामना करना पड़ा।

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शाह ने इससे पहले 1957, 1962 और 1967 में लगातार तीन बार टिहरी गढ़वाल लोकसभा सीट जीती थी। खुद को राजनीतिक परिदृश्य में एक मजबूत ताकत के रूप में स्थापित किया था। पैन्यूली के हाथों उनकी हार कई लोगों के लिए आश्चर्य की बात थी, खासकर शाह की चुनावी सफलता के ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए।
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टिहरी गढ़वाल के लोग महाराजा शाह को चुनावों में विजयी होते देखने के आदी थे और कई लोग उन्हें अपराजेय मानते थे। हालांकि, पैन्यूली की जीत ने इस धारणा को तोड़ दिया और साबित कर दिया कि शाह अजेय नहीं थे। पैन्यूली की जीत उनके राजनीतिक करियर में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर थी, क्योंकि वह शाह जैसे सुस्थापित और प्रभावशाली व्यक्ति को हराने में कामयाब रहे।
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इस हार ने इस धारणा को भी खारिज कर दिया कि ''बोलंदा बदरीनाथ कभी नहीं हारते''। पैन्यूली की जीत ने साफ कर दिया कि कोई भी चुनावी हार से अछूता नहीं है, चाहे कोई कितना भी अनुभवी या लोकप्रिय क्यों न हों। 'बोलंदा बदरीनाथ कभी नहीं हारते' टिहरी रियासत की गद्दी पर बैठे राजा को कहा जाता है। राजा प्रजा को यह बताने में सफल भी रहे कि वह भगवान विष्णु के प्रतिनिधि हैं। हर साल बदरीनाथ के कपाट खुलने की तारीखें टिहरी गढ़वाल राजमहल से घोषित होती हैं।

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