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कहानी चुनाव की : उत्तराखंड में विधानसभा तक तो पहुंचे वामपंथी, पर संसद का सपना हमेशा रहा अधूरा

Fri, 05 Apr 2024 05:01 PM IST
अलका त्यागी विजय लक्ष्मी भट्ट, अमर उजाला, देहरादून
विजय लक्ष्मी भट्ट, अमर उजाला, देहरादून Published by: अलका त्यागी Updated Fri, 05 Apr 2024 05:01 PM IST
सार

Lok sabha Election 2024 Uttarakhand: 1980 और 1989 के दो संसदीय चुनाव में वामपंथी दलों के उम्मीदवार प्रभाव छोड़ने में कामयाब रहे, लेकिन जीत से दूर ही रहे।

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Lok sabha Election 2024 Uttarakhand story Leftist reached assembly but dream of Parliament always unfulfilled
सांकेतिक फोटो। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

टिहरी रियासत के विरुद्ध मोर्चा लेने वाले वामपंथी दल टिहरी संसदीय सीट से चुनाव तो लड़े और दमखम भी दिखाया, लेकिन संसद तक पहुंचने की उनकी हसरत अभी तक भी पूरी नहीं हो पाई। राजशाही के दौरान जनपक्षीय मुद्दों को लेकर वामपंथी खासे मुखर रहे। अविभाजित उत्तर प्रदेश में संसदीय क्षेत्र की कुछ विधानसभा सीटों पर वामपंथ का खासा प्रभाव रहा।

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1980 और 1989 के दो संसदीय चुनाव में वामपंथी दलों के उम्मीदवार प्रभाव छोड़ने में कामयाब रहे, लेकिन जीत से दूर ही रहे। इसके बाद लोकसभा चुनावों में वामपंथी उम्मीदवारों की उपस्थिति रही, लेकिन चुनाव मैदान में वे खासा प्रभाव नहीं छोड़ पाए। टिहरी संसदीय सीट पर 1971 में विद्यासागर नौटियाल भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार के रूप में चुनाव मैदान में थे, तब उन्हें 15 फीसदी मत मिले और उनको कांग्रेस के परिणपूर्णानंद पैन्युली ने शिकस्त दी।
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इसके बाद भाकपा ने विद्यासागर नौटियाल को 1977 में फिर से चुनाव मैदान में उतारा, लेकिन इस बार मतप्रतिशत बढ़ने के बजाय घटकर 11 फीसदी ही रह गया। इस चुनाव में नौटियाल तीसरे स्थान पर रहे। 1980 का चुनाव वामपंथियों के लिए काफी यादगार रहा। तब भाकपा के उम्मीदवार विद्यासागर नौटियाल ने कांग्रेस प्रत्याशी त्रेपन सिंह नेगी को कड़ी चुनौती दी।
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इस चुनाव में भाकपा का मतप्रतिशत बढ़कर 26 फीसदी हो गया। इसके बावजूद नौटियाल को जीत तो नसीब नहीं हुई, लेकिन देश की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस के पसीना जरूर छुड़ा दिए और कांग्रेस के त्रेपन सिंह नेगी संसद तक पहुंचने में कामयाब रहे। वर्ष 1984 के लोकसभा चुनाव में भाकपा ने गोविंद सिंह नेगी को टिहरी संसदीय सीट से चुनाव मैदान में उतारा, लेकिन पार्टी का मत प्रतिशत एकदम से 12 फीसदी घटकर 14 फीसदी ही रह गया।

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वर्ष 1989 का लोकसभा चुनाव वामपंथियों को काफी सुकून देने वाला रहा। इस बार टिहरी संसदीय क्षेत्र से भाकपा ने काॅमरेड कमलाराम नौटियाल को प्रत्याशी बनाया और उनको कुल 84 हजार मत मिले। ये मत उन्हें कुल पड़े मतों का 20 प्रतिशत था। इसके बाद वर्ष 1998 के लोकसभा चुनाव में भाकपा ने कमलाराम नौटियाल को मैदान में उतारा, लेकिन उनको कांग्रेस प्रत्याशी ब्रह्मदत्त ने हराया। कमलाराम को तीसरे स्थान पर संतोष करना पड़ा।

वर्ष 1999 के लोकसभा चुनाव में भाकपा ने विद्यासागर नौटियाल को चुनाव मैदान में उतारा, लेकिन भाजपा के मानवेंद्र शाह से उनको करारी शिकस्त मिली। इस चुनाव के बाद से वामपंथी पार्टियों का ग्राफ लगातार गिरता ही गया। इसी का नतीजा रहा कि वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में बच्चीराम कंसवाल जैसे पार्टी के बड़े नेता चुनाव मैदान में उतरे, लेकिन जीत हासिल करनी तो दूर मत प्रतिशत नहीं बढ़ा पाए।

भाजपा में शिफ्ट हुआ वामपंथी दलों का वोट
टिहरी संसदीय क्षेत्र की कुछ विधानसभा सीटों पर प्रभाव रखने के बावजूद वामपंथी दलों का ग्राफ लगातार गिरता ही चला गया। भाजपा के उदय के बाद वामपंथियों का वोट बैंक धीरे-धीरे भाजपा की ओर शिफ्ट होता गया। 1989 तक इस सीट पर बेहतर प्रदर्शन करने वाले वामपंथी दल अगले लोकसभा चुनाव तक सिमट गए। 1989 के लोकसभा चुनाव में 20 प्रतिशत से अधिक मत प्राप्त करने वाले दल वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में 0.49% मत में ही सिमट गए।

‘धनबल नहीं होने से चुनाव नहीं जीत पाए’
संसाधनों की कमी खासकर धनबल के कारण वामपंथी उम्मीदवार चुनाव जीतने में सफल नहीं हो पाए। कार्यकर्ताओं का जमीनी स्तर पर संगठन है। जनपक्षीय मुद्दों को लेकर हमेशा से ही संघर्षरत रहे हैं, लेकिन जिस तरह से धनबल का प्रयोग बढ़ रहा, ऐसे में सीमित संसाधन वाले दलों के लिए चुनाव जीतना संभव नहीं है। 70 और 80 के दशक में वामपंथी दलों ने टिहरी, देवप्रयाग और हरिद्वार सीट पर विस चुनाव में जीत दर्ज की थी।
- जय प्रकाश पांडे, राज्य कमेटी सदस्य, भाकपा

वामपंथी मजदूर, किसान और वंचित लोगों के हितों के लिए हमेशा खड़ी रही है। पार्टी पहाड़ के लोगों के लिए हमेशा संघर्षरत रही है। चुनाव महंगे हो गए हैं, जिससे हम पिछड़ रहे हैं। धनबल का प्रयोग ज्यादा हो रहा है। राजनीतिक दलों ने सांप्रदायिक धुव्रीकरण, जातिवाद को आगे किया है। राष्ट्रवाद के नाम पर लोगों को गुमराह किया है। राष्ट्रवाद का मतलब तो गरीबों के अधिकारों की रक्षा करना है। बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार हो रहा है और फिर अपने आप को राष्ट्रवादी कहा जा रहा है। देश के साथ ही उत्तराखंड में भी इंडिया गठबंधन है।
-समर भंडारी, राज्य कमेटी के सदस्य, भाकपा माले

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