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Lockdown in Uttarakhand : आधी आबादी की अनदेखी, कहना और सहना मुश्किल, नहीं मिल रहे सैनिटरी नैपकिन

Sat, 30 May 2020 06:50 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal गंगोत्री वर्मा, अमर उजाला, हल्द्वानी
गंगोत्री वर्मा, अमर उजाला, हल्द्वानी Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal Updated Sat, 30 May 2020 06:50 PM IST
सार

  • कहीं पसंद का ब्रांड नहीं, तो कहीं साइज को लेकर आ रही समस्या

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Uttarakhand (UK) News in Hindi: Coronavirus Lockdown : women and girls did not get sanitary napkins
देहरादून में तालाबंदी

विस्तार

प्रदेश में पिछले 66 दिनों से लॉकडाउन है, ऐसे में सरकार जरूरतमंदों को भोजन से लेकर राशन तक उपलब्ध करा रही है लेकिन आधी आबादी की एक ऐसी जरूरत भी है, जिस पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। इसे कहना और सहना दोनों ही मुश्किल है। लॉकडाउन पीरियड के चलते दूरदराज के क्षेत्र की महिलाओं और बेटियों को सैनिटरी नैपकिन नहीं मिल पा रहे हैं।
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ऐसे में उन्हें ‘पैड मैन’ की तलाश है, जो उनकी जरूरत की ओर भी ध्यान दे। हालांकि चंपावत में ‘चेली बेटी सेवा’ के तहत फोन करने पर विभाग सैनेटरी पैड की होम डिलीवरी कर रहा है। लेकिन ये सुविधा सिर्फ नगर क्षेत्र के लिए है। कोरोना काल में जारी लॉकडाउन में महिलाओं को अपनी मांग के अनुसार सैनिटरी नैपकिन नहीं मिल पा रहे हैं।
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कहीं पसंद का ब्रांड नहीं मिल पा रहा है तो कहीं साइज को लेकर समस्या है। साकार जन सेवा समिति से जुड़ीं कंचन कश्यप इसके लिए सीधे सरकार को दोष  देती हैं, उनका कहना है कि हॉस्टल या पीजी में फंसी लड़कियों को दिक्कतें हो रही हैं। आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं या फिर एनजीओ की मदद से सैनिटरी नैपकिन बंटवाए जाने चाहिए।

साथ ही उनका सुझाव है कि सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए कैंप लगाकर नैपकिन बंटवाने चाहिए। पीलीकोठी निवासी मेडिकल कॉलेज की छात्रा अक्षिता कश्यप का भी कहना है कि बाजार में
पसंद के अनुसार ब्रांड और साइज नहीं मिल पा रहे हैं। मजबूरी में अन्य ब्रांड का इस्तेमाल करना पड़ रहा है।

आसपास की छोटी दुकानों में तो ये भी नहीं मिल पा रहे हैं। पुनर्नवा महिला समिति की सचिव शांति जीना, आकृति सोसायटी की अध्यक्ष कुसुम दिगारी का भी कहना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में ग्राम प्रधानों से मिलकर मुफ्त सैनिटरी नैपकिन बंटवाए जाने चाहिए।

राशन के साथ उपलब्ध करा रहीं सैनिटरी नैपकिन

सेल्फ रिलायंस इनिशिएटिव की अध्यक्ष तनुजा जोशी जरूरतमंदों को राशन उपलब्ध कराती हैं। उन्होंने राशन किट में नैपकिन को भी शामिल किया है। हर राशन किट में वह एक पैकेट सैनिटरी नैपकिन का भी रखती हैं। वह अभी तक 3000 पैकेट बांट चुकी हैं। उन्होंने कहा कि नैपकिन नहीं मिलने पर महिलाएं अन्य घरेलू तरीके अपनाती हैं, जिससे समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

शासन- प्रशासन के समक्ष उठाया मामला

चंपावत जिले की समाज सेविका और बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ की ब्रांड एबेंसडर रीता गहतोड़ी का कहना है कि सैनिटरी नैपकिन की समस्याओं को लेकर उन्होंने अप्रैल में पीएम, सीएम और डीएम को संबोधित पत्र लिखा। इसके बाद प्रशासन ने बाल विकास विभाग की मदद से जरूरतमंदों को मुफ्त नैपकिन उपलब्ध करवाए। उन्होंने कहा कि वह अपने स्तर से भी 150 पैकेट नैपकिन जरूरतमंदों को बांट चुकीं हैं।

आंगनबाडी केंद्रों से जैसे-जैसे लोगों की मांग आती थी। हम उन्हें सैनिटरी पैड लॉकडाउन पीरियड से पहले उपलब्ध कराते रहे हैं। हां, 25 मार्च के बाद इस कार्य में जरूर अवरोध आया होगा। जल्द ही हम घरों तक महिलाओं को बेहद सस्ते और अच्छी गुणवत्ता वाले सैनिटरी पैड उपलब्ध कराएंगे। सैनिटरी पैड का उपयोग करना या इसे मांगना शर्म का विषय नहीं बल्कि गर्व का विषय है और ये प्रकृति का दिया हुआ उपहार है, जिससे प्रकृति आगे बढ़ती है।
- रेखा आर्य, महिला एवं बाल पुष्टाहार मंत्री

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