{"_id":"65550b3401931597650c894e","slug":"it-still-remains-a-challenge-for-farmers-to-deliver-vikas-nagar-news-c-5-1-drn1030-287923-2023-11-15","type":"story","status":"publish","title_hn":"Dehradun News: चार खेड़ों में किसान और खच्चर खड़ी चढ़ाई पर ढो रहे कृषि उपज","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Dehradun News: चार खेड़ों में किसान और खच्चर खड़ी चढ़ाई पर ढो रहे कृषि उपज
विज्ञापन
I11 साल से अटकी रोपवे निर्माण की योजनाI
Iशासन से नहीं मिला योजना के लिए बजटI
राज्य निर्माण के बाद भी कालसी तहसील क्षेत्र के किसानों के लिए खेती और बाजार तक कृषि उपज पहुंचाना अब तक चुनौती बना हुआ है। चार खेड़ों से कृषि उपज को सड़क तक लाने के लिए चार किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई नापनी पड़ती है। किसान स्वयं या खच्चरों की सहायता से मुख्य मार्ग तक कृषि उपज ढो कर लाते हैे। करीब 11 साल पहले उद्यान विभाग की ओर रोपवे योजना तैयार की गई थी, लेकिन इसके लिए शासन की ओर से बजट ही नहीं मिल पाया।
वर्ष 2012-13 में उद्यान विभाग ने कृषि उपज को अमलावा गाड से मुख्य मार्ग स्थित भरंडआ धार तक लाने के लिए रोपवे योजना तैयार की थी। इससे ढकियारना, कोथी, अस्टाड और लोरली गांव के 200 से अधिक किसानों को लाभ मिलना था। इसी तरह अस्टी गांव के चरगाड खेड़े से लांबिया धार तक रोपवे निर्माण होना था। रोपवे निर्माण से अस्टी, जामुवा, तांगड़ी, डाबरा आदि गांवों के 80 से अधिक किसानों को कृषि उपज सड़क तक पहुंचाने की सुविधा मिलनी थी। कोटी विशायल और विकासखंड चकराता त्यूणी क्षेत्र में कृषि उपज के लिए रोपवे बनना था। 11 साल बीते के बाद भी चारों रोपवे निर्माण की योजना धरातल पर नहीं उतर पाई।
I40 किलोग्राम वजन के लिए 150 रुपये किरायाI
- किसान खच्चरों पर कृषि उपज को ढो कर मुख्य मार्ग तक लाते हैं। किसानों को इसके लिए खच्चर चालकों को प्रति 40 किलोग्राम वजन के लिए 150 रुपये किराया देना पड़ता है।
विज्ञापन
Iकृषि उपज हो जाती है खराबI
- अधिकांश किसान यहां नकदी फसलों की खेती करते हैं। सबसे अधिक टमाटर की खेती होती है। खच्चर पर लादकर सड़क तक लाने के दौरान टमाटर पिचक कर खराब हो जाता है।
I खेडे से मुख्य मार्ग तक सड़क नहीं है। खड़ी चढ़ाई अपने आप में बड़ी चुनौती है। कृषि उपज को सड़क तक खच्चरों पर लादकर लाते हैं। पहले खच्चरों का किराया फिर मंडी तक गाड़ी किराया देना पड़ता है। उपज को बेचने के बाद कुछ भी हाथ नहीं लगता है।- बालम सिंह चौहान, स्थानीय किसानI
I
I
Iकिसान थोड़े बहुत मुनाफे की आस में नकदी फसल की खेती कर रहे हैं। कृषि उपज का मुनाफा ढुलाई मेंं चला जाता है। अगर रोपवे बनता तो किसानों की समय और पैसा दोनों बचता।I
Iप्रीतम सिंह चौहान, स्थानीय किसानI
विज्ञापन
Iशासन से नहीं मिला योजना के लिए बजटI
राज्य निर्माण के बाद भी कालसी तहसील क्षेत्र के किसानों के लिए खेती और बाजार तक कृषि उपज पहुंचाना अब तक चुनौती बना हुआ है। चार खेड़ों से कृषि उपज को सड़क तक लाने के लिए चार किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई नापनी पड़ती है। किसान स्वयं या खच्चरों की सहायता से मुख्य मार्ग तक कृषि उपज ढो कर लाते हैे। करीब 11 साल पहले उद्यान विभाग की ओर रोपवे योजना तैयार की गई थी, लेकिन इसके लिए शासन की ओर से बजट ही नहीं मिल पाया।
वर्ष 2012-13 में उद्यान विभाग ने कृषि उपज को अमलावा गाड से मुख्य मार्ग स्थित भरंडआ धार तक लाने के लिए रोपवे योजना तैयार की थी। इससे ढकियारना, कोथी, अस्टाड और लोरली गांव के 200 से अधिक किसानों को लाभ मिलना था। इसी तरह अस्टी गांव के चरगाड खेड़े से लांबिया धार तक रोपवे निर्माण होना था। रोपवे निर्माण से अस्टी, जामुवा, तांगड़ी, डाबरा आदि गांवों के 80 से अधिक किसानों को कृषि उपज सड़क तक पहुंचाने की सुविधा मिलनी थी। कोटी विशायल और विकासखंड चकराता त्यूणी क्षेत्र में कृषि उपज के लिए रोपवे बनना था। 11 साल बीते के बाद भी चारों रोपवे निर्माण की योजना धरातल पर नहीं उतर पाई।
विज्ञापन
I40 किलोग्राम वजन के लिए 150 रुपये किरायाI
- किसान खच्चरों पर कृषि उपज को ढो कर मुख्य मार्ग तक लाते हैं। किसानों को इसके लिए खच्चर चालकों को प्रति 40 किलोग्राम वजन के लिए 150 रुपये किराया देना पड़ता है।
विज्ञापन
Iकृषि उपज हो जाती है खराबI
- अधिकांश किसान यहां नकदी फसलों की खेती करते हैं। सबसे अधिक टमाटर की खेती होती है। खच्चर पर लादकर सड़क तक लाने के दौरान टमाटर पिचक कर खराब हो जाता है।
I खेडे से मुख्य मार्ग तक सड़क नहीं है। खड़ी चढ़ाई अपने आप में बड़ी चुनौती है। कृषि उपज को सड़क तक खच्चरों पर लादकर लाते हैं। पहले खच्चरों का किराया फिर मंडी तक गाड़ी किराया देना पड़ता है। उपज को बेचने के बाद कुछ भी हाथ नहीं लगता है।- बालम सिंह चौहान, स्थानीय किसानI
I
I
Iकिसान थोड़े बहुत मुनाफे की आस में नकदी फसल की खेती कर रहे हैं। कृषि उपज का मुनाफा ढुलाई मेंं चला जाता है। अगर रोपवे बनता तो किसानों की समय और पैसा दोनों बचता।I
Iप्रीतम सिंह चौहान, स्थानीय किसानI