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Dehradun News: अजोला घास पशुओं के आहार पर आने वाले खर्च को 15 फीसदी करेगा कम

Sat, 07 Oct 2023 12:21 AM IST
Dehradun Bureau देहरादून ब्यूरो
Updated Sat, 07 Oct 2023 12:21 AM IST
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In the future, cattle farmers of the area will be able to
Iघास में 24 प्रतिशत से अधिक पाया जाता है प्रोटीनI
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Iक्षेत्र की जलवायु उत्पादन के लिए मुफीदI

भविष्य में क्षेत्र के पशुपालक अपने पशुओं को पारंपरिक आहार के साथ ही गैर पारंपरिक आहार भी दे सकेंगे। इससे पशुओं के आहार पर आने वाले खर्च में 15 फीसदी तक की कमी आएगी। पशुओं को भरपूर मात्रा में प्रोटीन भी मिलेगा। इसके लिए कृषि विज्ञान केंद्र ढकरानी के वैज्ञानिक इन दिनों अजोला घास (ग्रीन गोल्ड) के उत्पादन पर जोर दे रहे हैं।
कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि क्षेत्र का जलवायु अजोला घास के उत्पादन के लिए मुफीद है। प्रोफेसर पशु पोषण डॉ. अवनीश कुमार सिंह ने बताया कि अजोला घास के उत्पादन के लिए अक्टूबर से लेकर फरवरी तक का समय सबसे ज्यादा उपयुक्त होता है। इसके उत्पादन के लिए तीन फीट चौड़ा, डेढ़ से दो फीट गहरे और आवश्यकता के अनुसार लंबाई का गड्ढा तैयार करना होता है। सतह पर पॉलिथीन लगा दी जाती है। फिर इसमें 10 किग्रा गोबर और 15 किग्रा मिट्टी मिला कर पानी से भर दिया जाता है। 250-300 ग्राम अजोला घास मिला दी जाती है। 15-20 दिन के भीतर 12-15 किग्रा अजोला घास तैयार हो जाती है। उनका दावा है कि रोमंथी (जुगाली करने वाले) पशुओं को खिलाने वाले पारंपरिक आहार में इसकी 10-15 प्रतिशत मात्रा मिलाकर आहार के खर्च को 15 प्रतिशत तक कम किया जाता सकता है। अजोला घास को एक बार साफ पानी से धुलकर पशुओं के खिलाना चाहिए। ऐसा करने से घास की दुर्गंध समाप्त हो जाती है।
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Iपर्याप्त मात्रा में होते हैं पोषक तत्वI

अजोला घास में 24 प्रतिशत से अधिक प्रोटीन होता है। इसके साथ ही इसमें फास्फोरस, आयरन और कैल्शियम की मात्रा भी होती है। जिससे दूध का उत्पादन भी बढ़ता है।
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Iबड़े चाव से खाती हैं मुर्गियांI
डॉ. अवनीश कुमार सिंह ने बताया कि अजोला घास को मुर्गियों के दाने में भी मिलाया जा सकता है। इसके लिए पहले घास को सूखाना होगा। नमी दूर होने पर इसे मुर्गियों के दाने में मिलाया जाता है। मुर्गियां इसे बड़े चाव से खाती हैं।

I10-35 डिग्री तापमान की होती है जरूरतI
अजोला घास के उत्पादन के लिए 10-35 प्रतिशत तक तापमान की आवश्यकता होती है। अधिक तापमान होने पर शेड की आवश्यकता होती है। तेज धूप से इसे बचाना जरूरी होता है।



Iकेंद्र में उत्पादन का प्रयोग सफल रहा है। जल्द ही 50 प्रगतिशील किसानों का चयन कर उन्हें प्रशिक्षण, जागरूकता और केंद्र का विजट कराकर इसके उत्पादन के लिए प्रेरित किया जाएगा। - डॉ. एके शर्मा, प्रभारी वैज्ञानिक कृषि विज्ञान केंद्र ढकरानी I

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