हिंदी हैं हम : अपनी रचनाओं से कविवर सुमित्रानंदन पंत ने हिंदी को पहुंचाया शिखर तक
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हिंदी को शिखर तक पहुंचाने में कविवर सुमित्रानंदन पंत का योगदान हिंदी जगत में अलग स्थान रखता है। 20 मई 1900 को कौसानी में जन्मे कविवर पंत ने छायावाद, प्रगतिवाद और नव चेतनावाद की तीन प्रमुख धाराओं के अंतर्गत साहित्यिक रचनाएं कीं। छायावाद का यह दौर जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला और रामकुमार वर्मा जैसे स्तंभों का युग कहलाता है।
कविवर पंत की कविताओं के पहले चरण में प्रकृति और सौंदर्य का प्रतिबिंब दिखाई पड़ता है। दूसरे चरण की कविताओं में छायावाद का पुट मिलता है और अंतिम चरण की कविताओं में प्रगतिवाद और विचारशीलता समाई हुई है। कविवर सुमित्रानंदन पंत का जन्म कौसानी में चाय बागान के व्यवस्थापक पंडित गंगा दत्त पंत के घर 20 मई 1900 में हुआ।
जन्म के करीब छह घंटे बाद ही उनकी माता सरस्वती देवी का निधन हो गया। फिर उनकी देखरेख दादी ने की। मातृ स्नेह से वंचित भावुक कविवर पंत के काव्य में मां की पुनीत स्मृति बिखरी हुई मिलती है।
उन्होंने अपनी एक कविता में कहा है...
नियति ने ही निज कुटिल कर से सुखद
गोद भर लाड़ की थी छीन ली,
बाल में ही हो गई लुप्त हा
मातृ अंचल की अभय छाया मुझे.....
प्रारंभिक शिक्षा कौसानी के वर्नाक्यूलर स्कूल में नौ साल की आयु होते होते उन्हें अमरकोश, मेघदूत, चाणक्य नीति आदि ग्रंथों के अनेक श्लोकों का ज्ञान हो गया था। सात वर्ष की आयु में ही उन्हें अपने काव्य पाठ पर पुरस्कार मिल गया। 1916 में अल्मोड़ा अखबार में उनकी पहली कविता छपी।
1918 में जीआईसी अल्मोड़ा से नौवीं कक्षा पास करने के बाद आगे की शिक्षा के लिए उन्हें बनारस भेजा गया। 1960 में कला और बूढ़ा चांद की रचना में उन्हें साहित्य अकादमी और 1969 में चिदंबरा पर भारतीय ज्ञान पीठ पुरस्कार मिला। 1961 में उन्हें पद्मभूषण से नवाजा गया। वह अविवाहित रहे। 28 दिसंबर 1977 को इलाहाबाद में उनका निधन हो गया।
महात्मा गांधी के आह्वान पर छोड़ा अंग्रेजी कालेज
कविवर सुमित्रानंदन पंत 1918 में अपने मझले भाई के साथ काशी चले गए और वहां क्वींस कालेज में पढ़ाई की और हाईस्कूल के बाद इलाहाबाद के तत्कालीन प्रसिद्ध अंग्रेजी मीडियम के म्योर कालेज में पढ़ने चले गए। इस बीच 1921 में असहयोग आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी के आह्वान पर सुमित्रानंदन पंत ने म्योर कालेज छोड़ दिया और घर पर ही हिंदी साहित्य और संस्कृत आदि पढ़ने लगे।
चिदंबरा तथा कला और बूढ़ा चांद सहित कई चर्चित रचनाएं
प्रगतिशील पत्रिका रुपाभ का 1938 में संपादन किया। 1950 से 1957 तक आकाशवाणी के परामर्शदाता रहे, फिर 1958 में चिदंबरा का प्रकाशन हुआ। इसी रचना पर उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त हुआ। 1960 में कला और बूढ़ा चांद काव्य संग्रह के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। 1964 में उनके प्रसिद्ध महाकाव्य लोकायतन का प्रकाशन हुआ। उनकी कुछ अन्य रचनाओं में ग्रंथि, गुंजन, ग्राम्या, युगांत, स्वर्ण किरण, स्वर्ण धूलि, सत्यकाम आदि हैं। उनकी कुल 28 पुस्तकें प्रकाशित हुई जिसमें हिंदी कविताओं के अलावा नाटक और निबंध आदि शामिल हैं।
कौसानी के घर में अब है सुमित्रानंदन पंत वीथिका
कौसानी में स्थित कविवर सुमित्रानंदन पंत के घर में 1987 में सुमित्रानंदन पंत वीथिका स्थापित की गई। वीथिका में कविवर पंत को मिले सामान पत्र, उनकी जन्म कुंडली, उनके जीवन से जुड़े छाया चित्र, उनकी प्रयोग की गई कुर्सी मेज, चश्मा, अटेची, चादर आदि सामान रखा गया है।
गुसाईं दत्त से बदलकर खुद रखा था सुमित्रानंदन नाम
कौसानी में प्रारंभिक पढ़ाई के बाद जब वह चौथी कक्षा में प्रवेश के लिए अल्मोड़ा आए तो उनका ध्यान अपने नाम पर गया। कविवर पंत ने अपने संस्मरणों में कहा है कि राम के भाई लक्ष्मण से प्रभावित होकर उन्होंने खुद अपना नाम गुसाईं दत्त से सुमित्रानंदन रख लिया। नेपोलियन और रवींद्र नाथ टैगोर के युवा चित्रों को देखकर केश बढ़ा लिए और आजीवन उनका यह शौक बना रहा।