हिमालय खो रहा है अपनी उर्वरा शक्ति, मिट्टी को नहीं सहेजा तो भुगतना होगा भारी परिणाम
- उत्तराखंड के हालात बेहद खराब, हर साल बह जाती है प्रति हेक्टेयर 40 टन से अधिक मिट्टी
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मिट्टी की एक सेंटीमीटर परत को बनने में 400 साल लगते हैं। भू क्षरण में यही मिट्टी की परत कुछ ही समय में गायब हो रही है। हिमालय में भू क्षरण की दर सामान्य से बहुत अधिक पाई गई है। इसी का नतीजा है कि हिमालय अपनी उर्वरा शक्ति तेजी से खो रहा है। मुसीबत यह है कि आंखों के सामने हो रहे इस विनाश को रोकने की कोशिश प्राथमिकता में नजर नहीं आ रही है।
मिट्टी के बह कर चले जाने की हिमालय पर खासी मार है। उत्तराखंड के मामले में तो भू क्षरण की मार खतरनाक हद को पार करती दिख रही है। प्रदेश के एक तिहाई हिस्से में 40 टन प्रति हेक्टेयर प्रति वर्ष मिट्टी अपनी जगह छोड़ रही है और यह सामान्य से चार गुना अधिक है। मिट्टी की इस ऊपरी सतह पर ही वनस्पतियों का जीवन, वनों की सेहत, वन्य जीवों और मानव आबादी का भोजन निर्भर करता है।
वैज्ञानिकों के मुताबिक वैसे तो यह सामान्य प्रक्रिया है, लेकिन सामान्य से अधिक भू क्षरण के दूरगामी प्रभाव देखने को मिलते हैं। खेती से लेकर रहन सहन तक इससे प्रभावित होगा। भारतीय मृदा एवं जल संरक्षण संस्थान के आकलन के मुताबिक उत्तराखंड के गंभीर रूप से प्रभावित हिस्सों से प्रति वर्ष करीब 732 लाख टन मिट्टी बह जा रही है। यह मिट्टी का सबसे उपजाऊ हिस्सा है। भारतीय मृदा एवं जल संरक्षण संस्थान के कार्यकारी निदेशक पीआर ओजस्वी के मुताबिक मिट्टी के संरक्षण को प्राथमिकता के आधार पर लेना अब अनिवार्य हो गया है।
समझें कि कटाव में सबसे उपजाऊ और कीमती हिस्सा बहता है मिट्टी का
भू क्षरण हिमालय की सबसे प्रमुख समस्या है। प्राकृतिक रूप से मिट्टी का कटाव तो होता ही आया है, लेकिन अब कई कारणों से मिट्टी का कटाव कई स्थानों पर बहुत अधिक हो गया है। उत्तराखंड के हालात तो बहुत ही खराब हैं। यहां 34.2 प्रतिशत क्षेत्र में 40 टन प्रति हेक्टेयर प्रति वर्ष से अधिक का क्षरण हो रहा है। भू क्षरण मिट्टी की गहराई, ढाल, गुरुत्व, वनस्पति का आवरण, बारिश की तीव्रता आदि पर निर्भर करता है। भू क्षरण से मिट्टी का सबसे उपजाऊ हिस्सा बह जाता है। देश में 20,000 लाख हेक्टेयर निमभन (डिग्रेडिड) भूमि है और 84 प्रतिशत यह पानी और हवा की वजह से है। सामान्य स्तर का भू क्षरण ढाई से लेकर 12.5 टन प्रति हेक्टेयर प्रति वर्ष है। देश में औसतन 53340 लाख टन मिट्टी का क्षरण हर वर्ष हो रहा है। भू क्षरित मिट्टी का कुल 29 प्रतिशत सागर, 10 प्रतिशत बांध सहित अन्य जल कुंडों और 61 प्रतिशत एक स्थान से दूसरे स्थान पर जमा हो रहा है।
तब जमीन किसी काम की नहीं रह जाती
भू क्षरण से दो क्षेत्र सीधे प्रभावित होते हैं। एक जहां से क्षरण हुआ (इन साइट) और दूसरा जहां मिट्टी बह कर पहुंची (ऑफ साइट)। ऑफ साइट में मसलन बांध है तो उसमें जल्दी मिट्टी भरने से उसकी आयु कम हो जाएगी। भू क्षरण में मिट्टी का सबसे उपयोगी हिस्सा बहता है, लिहाजा जहां यह जमा होगा, वहां अत्यधिक खरपतवार सहित अन्य वनस्पतियों की अधिक वृद्धि की समस्या होगी। भू क्षरण न रोका गया तो सतत कृषि (ससटेनेबल एग्रीकल्चर) पर सवाल खड़ा हो जाएगा। जल चक्र प्रभावित हो जाएगा और जमीन किसी काम की नहीं रहेगी।
भू क्षरण के प्रभाव को नीतिगत स्तर पर अधिक गंभीरता से लेने की जरूरत है। इसके दूरगामी प्रभाव होता है और यह प्रभाव दिखने भी लगे हैं। जलवायु परिवर्तन भी अब एक बड़ा कारक बन रहा है। जलवायु परिवर्तन से बारिश की अवधि कम हो रही है, लेकिन मात्रा उतनी ही है। जाहिर है कि बारिश की तीव्रता बढ़ रही है। भू क्षरण जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ रहा है और यह जलवायु परिवर्तन को बढ़ा भी रहा है, मिट्टी में जमा कार्बन तेजी से वायुमंडल में पहुंच जाता है।
भूमि प्रबंधन बहुत जरूरी है। खेती को इस तरह से किया जाए कि मिट्टी कम से कम बहे। जहां भू क्षरण है, वहां इसे रोकने के उपाय प्राथमिकता के स्तर पर किए जाएं। यह साफ समझा जाए कि भू क्षरण के कारण किसी न किसी रूप से सभी प्रभावित होते हैें। इसका सबसे बढ़ा प्रभाव तो कृषि पर ही है।
- डॉ. डीवी सिंह, प्रिंसिपल साइंटिस्ट, भारतीय मृदा एवं जल संरक्षण संस्थान
उत्तराखंड
कुल भूभाग का 58.2 प्रतिशत क्षेत्र भू क्षरण से किसी न किसी रूप से प्रभावित है। गंभीर बात यह है कि कुल भूभाग का 34.2 प्रतिशत क्षेत्र में ऊपरी सतह की मिट्टी 40 टन प्रति हेक्टेयर प्रति वर्ष से अधिक के हिसाब से क्षरण का शिकार हो रही है। अधिकतर ऐसे क्षेत्र पर्वतीय जिलों के ही हैं। माना जाता है कि करीब दस टन प्रति हेक्टेयर प्रति वर्ष तक हो रहा भू क्षरण वहनीय (टोलरेंस) स्तर तक का है। साफ है कि प्रदेश के 34.2 प्रतिशत क्षेत्र में इस वहनीय सीमा का चार गुना भू क्षरण हो रहा है।
हिमाचल प्रदेश
हिमाचल के हालात भी ठीक नहीं है लेकिन उत्तराखंड से बेहतर हैं। हिमाचल में 32.4 प्रतिशत क्षेत्र में दस टन प्रति हेक्टेयर प्रति वर्ष से अधिक का भू कटाव पाया गया है। वैज्ञानिकों के मुताबिक हिमाचल में खेती सही होना, बागवानी अधिक होने से भू क्षरण का कम प्रभाव हुआ है। फिर भी हिमाचल प्रदेश के लिए भू क्षरण के प्रति संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान करने और प्राथमिक स्तर पर इस क्षरण को रोकने का उपाय करने का सुझाव दिया गया है।
जम्मू कश्मीर, लद्दाख
भू क्षरण के मामले में जम्मू कश्मीर, लद्दाख सहित अन्य हिमालयी राज्यों से बेहतर स्थिति में है। यहां 15.8 प्रतिशत भूभाग में ही 10 टन प्रति हेक्टेयर प्रति वर्ष से अधिक के हिसाब से भू क्षरण पाया गया है। यहां ग्रीन कवर अधिक होना, पहाड़ों का मजबूत होना इसकी वजह मानी गई है। इसके बावजूद इन केंद्र शासित प्रदेशों को भू क्षरण की रोकथाम के लिए उपाय करने का सुझाव दिया गया है।
शिवालिक क्षेत्र में हालात बदतर
सबसे अधिक खराब हालत शिवालिक में पाई गई है। करीब 2400 किलोमीटर की इस रेंज में 80 टन प्रति हेक्ेटयर प्रति वर्ष तक का भू क्षरण हो रहा है। उत्तराखंड सहित अन्य हिमालयी राज्यों के लिए यह खतरे की घंटी है। यहां भू क्षरण सामान्य स्थिति से आठ गुना अधिक है। देश में करीब 39 प्रतिशत क्षेत्र है जिसमें दस टन प्रति हेक्टेयर प्रति वर्ष से अधिक का भू क्षरण हो रहा है।
34 लाख टन खाद्यान का नहीं होता उत्पादन
भू क्षरण के कारण देश में 15 प्रतिशत अनाज, 18 प्रतिशत तिलहन और 16 प्रतिशत दलहन का उत्पादन प्रभावित होता है। उत्तर की बजाय दक्षिण में यह समस्या अधिक है। 34 लाख टन खाद्यान का उत्पादन भू क्षरण के कारण नहीं हो पाता।
क्या हैं भू क्षरण रोकने के उपाय
- अधिक भू क्षरण के क्षेत्र की पहचान करें और सबसे पहले यहीं पर क्षरण रोकने की कोशिश करें।
- वनस्पतियां जितनी अधिक होंगी, भू क्षरण उतना ही कम होगा
-जलवायु परिवर्तन के कारण भू क्षरण में तेजी आई है, भू उपयोग भी एक कारण है। लिहाजा इस तरह की नीतियां बनें कि भू क्षरण के प्रभाव को कम किया जा सके। भूमि प्रबंधन महत्वपूर्ण है।
-ढाल से मिट्टी के कटाव को कम किया जाए,
-भू क्षरण मिट्टी की गहराई पर भी निर्भर है। यह जांचने के बाद ही क्षरण रोकने के लिए प्रयास करें।