हरिद्वार: गंगा घाटों के आसपास बिकने वाले सिक्के न प्राचीनकाल के हैं और न असली, पढ़ें खास रिपोर्ट
गंगा और अन्य नदियों में सिक्के चढ़ाने की परंपरा बहुत पुरानी है। आस्था ही नहीं इसके पीछे वैज्ञानिक पहलु भी माना जाता है। प्राचीनकाल में सिक्के तांबे, सोने और चांदी के होते थे। बताया जाता है कि यह सिक्के पानी को फिल्टर करने का काम भी करते थे।
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हरकी पैड़ी और प्रमुख गंगा घाटों के साथ सड़कों के किनारे बिक रहे सिक्कों को असली समझने की गलती मत करना। प्राचीनकाल और तांबे के बताकर सामान्य धातु के सिक्कों को श्रद्धालुओं को महंगे दामों पर बेचा जाता है। श्रद्धालु भी उन्हें असली समझकर मनोकामनाएं पूरी करने की प्रार्थना के लिए मां गंगा में अर्पित करते हैं तो कई शौक के लिए संग्रह करते हैं।
नदियों में सिक्के चढ़ाने की परंपरा बहुत पुरानी
गंगा और अन्य नदियों में सिक्के चढ़ाने की परंपरा बहुत पुरानी है। आस्था ही नहीं इसके पीछे वैज्ञानिक पहलु भी माना जाता है। प्राचीनकाल में सिक्के तांबे, सोने और चांदी के होते थे। बताया जाता है कि यह सिक्के पानी को फिल्टर करने का काम भी करते थे। सोना, चांदी, तांबा व सोने की पवित्र धातु और नदियां आस्था से जुड़ी थीं। तीर्थों में पहुंचने वाले श्रद्धालु चांदी, तांबा और सोने के सिक्कों को नदी में समर्पित करते थे।
बदलते वक्त के साथ तांबे और चांदी के बर्तनों की जगह स्टील और लोहा ने ले ली है। सिक्के भी अब फेरिटिक स्टेललैस स्टील धातु के बनने लगे हैं। लेकिन लोगों की आस्था अब भी गंगा में सिक्के डालने की चली आ रही है। हरिद्वार में प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं। श्रद्धालु गंगा में मनोकामनाएं पूरी करने की प्रार्थना के लिए सिक्के समर्पित करते हैं। श्रद्धालुओं की इसी आस्था एवं परंपरा को देखते हुए हरकी पैड़ी एवं आसपास क्षेत्र में करीब 20 जगहों पर तांबे एवं अन्य धातुओं के सिक्के बता कर बेचे जाते हैं।
प्राचीनकाल के नाम पर बेचे जा रहे नकली सिक्के
सिक्कों को देखकर वहां से गुजरते लोगों के कदम ठहर जाते हैं। यह सिक्के प्राचीनकाल के नाम पर नकली होते हैं। सिक्के बेचने वाले दावा करते हैं उनके पास ईसा पूर्व से लेकर मुगल कालीन और ईस्ट इंडिया कंपनी के दौर के तांबे एवं अन्य धातुओं के सिक्के हैं। सिक्के जितने पुराने बताए जाते हैं, उतनी उनकी कीमत तय करते हैं।
हरकी पैड़ी पर गंगा से निकालते हैं सिक्के
श्रद्धालुओं की आस्था कई गरीबों का भरण पोषण भी करती है। हरकी पैड़ी एवं आसपास के घाटों में 120 लोग गंगा से सिक्के बीनकर गुजर बसर करते हैं। पूरे साल सिक्के बीनने पर ही निर्भर रहते हैं। चंडीघाट निवासी बिहारी लाल बताता है, रोजाना पांच सौ से सात सौ रुपये के सिक्के गंगा से बटोर लेते हैं। कई बार सोना एवं चांदी के आभूषण के कटपीस भी मिल जाते हैं। सोना-चांदी के कटपीस अस्थि विसर्जन की राख में आते हैं।
आज के दौर में हरिद्वार में ईसा पूर्व से लेकर ईस्ट इंडिया कंपनी के असली सिक्के मिलना संभव नहीं है। ईसा पूर्व के एक सिक्के की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में करोड़ों रुपये है। हरिद्वार ही नहीं किसी भी धार्मिक स्थल पर बिकने वाले सिक्के असली नहीं हो सकते हैं। लोगों को असली बताकर बेचना उनकी आस्था के साथ खिलवाड़ है।
- प्रो. देवेंद्र गुप्ता, प्राचीन भारतीय इतिहास एवं संस्कृति पुरातत्व विभाग गुरुकुल विश्वविद्यालय