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गांधी जयंती 2020 : बापू ने मसूरी में बनाई थी आजादी के आंदोलन की रणनीति, दस दिन रहे थे महात्मा गांधी

Fri, 02 Oct 2020 02:37 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, मसूरी
न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, मसूरी Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal Updated Fri, 02 Oct 2020 02:37 PM IST
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Gandhi jayanti 2020: Bapu formulated the strategy of freedom movement in Mussoorie
- फोटो : mkgandhi.org

महात्मा गांधी वर्ष 1929 में एक कार्यक्रम में शिरकत करने दून आए थे। इसी दौरान वह दो दिन के लिए मसूरी भी पहुंचे थे। इतिहासकार गोपाल भारद्वाज ने बताया कि वर्ष 1946 में महात्मा गांधी दोबारा मसूरी आए और अकादमी क्षेत्र स्थित हैप्पी वैली बिड़ला हाउस में दस दिन तक ठहरे थे।

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उन्होंने बताया कि महात्मा गांधी उस समय मसूरी के तत्कालीन कांग्रेस के बड़े नेताओं में शामिल पुष्करनाथ तन्खा के सहयोग से देश के अन्य बड़े नेताओं के साथ बैठक कर आजादी के लिए रणनीति बनाते थे। उन्होंने 1946 में सिल्वर्टन मैदान में जनसभा भी की थी। 
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गोपाल भारद्वाज के अनुसार सबसे पहले बापू 1929 में मसूरी आए थे। 15 अक्तूबर 1929 को हरिद्वार में लाला लाजपत राय मेमोरियल उत्तर प्रदेश राष्ट्रीय सेवा और खादी के लिए धन एकत्र किया और अगले दिन मसूरी आए। 16 अक्तूूबर 1929 को उन्होंने बाबू पुरुषोत्तम दास टंडन के नेतृत्व में दून में कांग्रेस के जिला सम्मेलन को संबोधित किया। इसके बाद वह मसूरी आए।

18 अक्तूबर को फिर से मसूरी पहुंचे और यूरोपीय नगर पालिका पार्षदों को संबोधित किया। वह 24 अक्तूबर तक हैप्पी वैली के पास बिड़ला हाउस में रहे और कई महत्वपूर्ण बैठकें कीं।

सिल्वर्टन मैदान में एक विशाल जनसभा को संबोधित किया

डॉक्टरों की सलाह पर गांधी जी ने 28 मई 1946 को फिर से मसूरी का दौरा किया। यहां आजादी के लिए उन्होंने सिल्वर्टन मैदान में एक विशाल जनसभा को संबोधित किया। 

भारद्वाज बताते हैं कि गांधी जी मसूरी में स्वास्थ्य लाभ भी लिया करते थे। वह कहा करते थे कि यहां की सुंदर पहाड़ियों को देखकर मैं अपने सारे दुख दर्द भूल जाता हूं। इसका जिक्र उनके द्वारा मसूरी एंड दून गाइड बुक के पहले पन्ने में गांधी जी के आर्टिकल में भी किया गया था। प्रार्थना सभा के बाद लोगों में गांधी जी की बातों से जोश भर जाता था। 

भारद्वाज ने बताया कि उनके पिता आरजीआर भारद्वाज विश्वविख्यात ज्योतिषाचार्य थे। गांधीजी जब 1946 में बिड़ला हाउस में ठहरे थे तो उन्होंने उनके पिता को लाने के लिए दो रिक्शा भेजे थे। स्थानीय लोगों ने गांधी जी को चांदी की छड़ी और रिक्शा उपहार स्वरूप भेंट किया था।

गांधी जी ने उस उपहार को स्वीकार कर उसे उसी समय बेचने के लिए बोली लगाई। जिस पर स्थानीय लोगों ने 800 रुपये एकत्रित कर इसे खरीद लिया। यह रुपये गांधी जी ने मौके पर ही खादी ग्रामोद्योग को दान कर दिए। उस समय खादी के उत्थान के लिए स्वदेशी वस्तु अभियान चलाया जा रहा था। 

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