डीएनए खोलेगा हिमालय के इतिहास के सारे 'राज'
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हिमालय में बिखरे जीवाश्म और अवशेषों से यहां वन्य जीवों और वनस्पतियों के इतिहास के बारे में तो पता चल जाता है, लेकिन मानव यहां कब आबाद हुआ? कौनसी जनजातियां यहां पहले आईं? उनके सामाजिक संबंध कैसे विकसित हुए? इस राज से अब डीएनए पर्दा हटाएगा।
भारतीय मानव सर्वेक्षण (एएसआई) ने उत्तराखंड की पांच प्रजातियों के डीएनए सैंपल जांच के लिए भेज दिए हैं। इस जांच से हिमालय में मानव सभ्यता के विकास के नए अध्याय खुलेंगे। पांच करोड़ साल से विकसित हो रहे हिमालय में मिली अस्थियां आदि मानव के होने की पुष्टि तो कर रही हैं, लेकिन मानव सभ्यता का संगठित विकास यहां कब हुआ? इसका पता नहीं है।
मध्य हिमालयी क्षेत्र में राजी, बोक्सा, भूटिया, जौनसारी और थारू जनजातियां सदियों से रह रही हैं। अलग-अलग समय में इन जनजातियों ने हिमालयी क्षेत्र की कंदराओं को अपना आशियाना बनाया था। पुरातन काल के उनके रहने के तरीकों की निशानदेही तो हो रही है, लेकिन इनके अभ्युदय के साथ विकास के चरणों का रिकार्ड नहीं है।
भारतीय मानव सर्वेक्षण के क्षेत्रीय कार्यालय ने वर्ष 2012 से इस शोध पर कार्य शुरू किया था। प्रत्येक जनजाति के पुरुष और महिलाओं के 120 ब्लड सैंपल लिए गए हैं। इन्हें जांच के लिए एएसआई के कोलकाता स्थित मुख्यालय भेज दिया गया है। डीएनए के पैटर्न की जांच से इनके यहां आने के वक्त का पता चलेगा। इसके साथ ही पैटर्न के कोड में आए बदलाव यह भी बताएंगे कि हिमालय में ही एक से दूसरे स्थान पर कब पलायन हुआ है।
डीएनए में बदलाव से यह भी पता चलेगा कि जनजातियों में आपसी मेल-मिलाप, वैवाहिक संबंध कब से शुरू हुए। एएसआई की सह अनुसंधानकर्ता कोयल मुखर्जी ने बताया कि भौगोलिक स्थिति में बदलाव के साथ वैवाहिक संबंधों से डीएनए कोड में बदलाव आता है। बीमारियों के कोड एक-दूसरे में स्थानांतरित हो जाते हैं। इससे एक जनजाति के दूसरे के संपर्क में आने का पता चलता है।
उत्तराखंड की पांच जनजातियों के ब्लड सैंपल लेकर जांच के लिए भेज दिए गए हैं। डीएनए की जांच से उनके बसने और एक-दूसरे के संपर्क में आने का पता चलेगा।
- डा. हर्षवर्धन, कार्यालयाध्यक्ष, एएसआई