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खतरे में है देहरादून की धरोहर का अस्तित्व
अमर उजाला, देहरादून
Updated Tue, 08 Oct 2013 01:12 PM IST
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देहरादून स्थित प्रसिद्घ खलंगा स्मारक के दो सौ मीटर दायरे में भवन बनाने की अनुमति से गोरखा समुदाय नाराज है।
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अतिक्रमण बढ़ने की आशंका
हालांकि, अनुमति उन्हीं लोगों को मिली है जिनके स्मारक के पास पहले से प्लॉट हैं, लेकिन गोरखा समुदाय के लोग मानते हैं कि इस आदेश के बाद लोग यहां जमीनें कब्जाने लगेंगे और मकान बनाने की अनुमति मांगेंगे। इससे स्मारक के पास अतिक्रमण बढ़ने की आशंका रहेगी।
साथ ही ऐतिहासिक धरोहर के लिए भी हर वक्त खतरा बना रहेगा। उनका कहना है कि कहीं भी, किसी भी स्मारक के पास ऐसी अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
यह था मामला
प्रदेश में 42 स्मारकों की देखरेख का जिम्मा संस्कृति विभाग के पास है। स्मारकों के संरक्षण के लिए वर्ष 2010 में राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण बनाया गया था। ढाई वर्ष पूर्व खलंगा स्मारक के पास भवन बनाने के लिए आठ लोगों ने आवेदन किया था, जिन्हें प्राधिकरण के सक्षम प्राधिकारी और संस्कृति सचिव उमाकांत पंवार ने हाल ही में अनुमति दे दी थी।
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इसके अलावा काशीपुर के गोविषाण टीला में भी सात मकानों को मंजूरी दी गई। इसके बाद संस्कृति विभाग 43 और प्रस्ताव प्राधिकरण को भेजने की तैयारी में है।
यह है खलंगा स्मारक
शहर के नालापानी स्थित खलंगा में दो सौ साल पहले गोरखा सेना और अंग्रेजों के बीच युद्ध हुआ था। वीर बलभद्र के नेतृत्व में गोरखा सेना ने अंग्रेजी सेना के प्रमुख जनरल गेलिस्पी को मार गिराया था।
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गोरखा सेना के 600 सैनिक और उनके परिवार खलंगा किले में थे। अंग्रेजों ने किले तक पानी जाने के सारे स्रोत बंद कर दिए। इससे भीतर घायल सैनिक, बच्चे-बुजुर्ग, महिलाएं तड़पने लगे। वीर बलभद्र से उनका दर्द देखा नहीं गया। उन्होंने अंग्रेजों से कहा, तुम हमें हरा नहीं सकते।
हम खुद ही किला छोड़कर जा रहे हैं। बाद में यहां बलभद्र का 45 फीट ऊंचा स्मारक बनाया गया। हर साल यहां मेला लगता है, जिसमें हजारों लोग जुटते हैं। खलंगा स्मारक ऐतिहासिक धरोहर है। इसके दो सौ मीटर में भवन निर्माण की अनुमति मिलना ठीक नहीं है। इससे स्मारक के लिए खतरा हो सकता है।
- सूर्य विक्रम शाही, सदस्य, खलंगा विकास समिति
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