बिल घोटाला: ‘मास्टरमाइंड’ को बचाने का चल रहा खेल
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आडिट में उठे सवालों के बाद स्वास्थ्य विभाग भले ही दो ट्रैवल एजेंसियों पर ताबड़तोड़ मुकदमे दर्ज करा रहा हो, लेकिन इस पूरी कवायद पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।
माना जा रहा है कि करोड़ों के तेल बिल घोटाले में इन दोनों एजेंसियों के संचालकों संग स्वास्थ्य विभाग के ही कई अधिकारी और कुछ नेता भी शामिल रहे हैं। सूत्रों की मानें तो चार साल तक लगातार कोई एजेंसी विभाग को चूना लगाती रहे, यह बिना अधिकारियों की मिलीभगत के संभव नहीं हो सकता।
लेकिन, घोटाले के इन ‘मास्टरमाइंड’ को बचाने की पूरी कोशिश की जा रही है। सूत्रों का कहना है कि मामले की निष्पक्ष जांच हो तो विभागीय अधिकारियों समेत कई सफेदपोश के चेहरे भी बेनकाब हो सकते हैं।
विभागीय मद में दिखाया दौरा
सूत्रों की मानें तो जिन वाहनों के बिल स्वास्थ्य विभाग को भेजे गए थे, वे दरअसल वर्ष 2009 से 2013 तक विभिन्न नेताओं के दौरे में शामिल थे। लेकिन, मिलीभगत के चलते इन बिलों को स्वास्थ्य विभाग के मद में जोड़ लिया गया। इसके बाद दून समेत हरिद्वार, ऊधमसिंह नगर और टिहरी जिले के विभिन्न अस्पतालों, मुख्य चिकित्साधिकारी कार्यालयों के जरिये भुगतान करवाया गया।
भुगतान एक जगह से, मुकदमे अलग-अलग जगह
विभागीय सूत्र बताते हैं कि सभी बिलों का अंतिम भुगतान स्वास्थ्य महानिदेशालय से हुआ है। ऐसे में घटनास्थल स्वास्थ्य महानिदेशालय ही है। लेकिन, महानिदेशालय ने अपने स्तर से ट्रैवल एजेंसी संचालकों पर एक मुकदमा दर्ज कराने के बजाय संबंधित चारों जिलों के मुख्य चिकित्साधिकारियों और संबंधित अस्पतालों के चिकित्सा अधीक्षकों को अलग-अलग मुकदमे कराने के लिए कहा।
ऐसे में दो एजेंसियों पर चारों जिलों में दर्जनों मुकदमे हो गए हैं। अकेले दून में ही इन दोनों ट्रैवल एजेंसियों पर अब तक तीन मुकदमे हो चुके हैं।
दागी ही करा रहे मुकदमा
तेल बिल घोटाले का खुलासा गत वर्ष आडिट जांच में हुआ था। आडिट रिपोर्ट में चिकित्सा अधीक्षकों और चिकित्साधिकारियों पर सवाल उठाए गए थे। लेकिन, ये दागी अधिकारी अब भी पदों पर बने हुए हैं।
यही नहीं, अब ये ही अधिकारी ट्रैवल एजेंसियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा रहे हैं। महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि अब पुलिस जांच करने अस्पतालों में जाएगी तो इन अधिकारियों से ही उसे दस्तावेज जुटाने होंगे। ऐसे में जांच की निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
सुलग रहे हैं अभी ये सवाल
मुख्य चिकित्साधिकारियों और चिकित्सा अधीक्षकों ने अप्रत्याशित रूप से हर महीने बढ़े लाखों रुपये के बिलों का भुगतान स्वीकृत क्यों किया?
एक ही दिन में दर्जनों वाहन शासकीय या विभागीय कार्य से कहां और किस लिए भेजे जा रहे हैं, स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों द्वारा इसकी पड़ताल क्यों नहीं की गई?
सभी जिलों और अस्पतालों के बिलों के भुगतान की अंतिम स्वीकृति और बजट जारी करने की प्रक्रिया स्वास्थ्य महानिदेशालय के स्तर से हुई। स्वास्थ्य महानिदेशालय ने बिना आपत्ति और लेखा जांच के करोड़ों रुपये का भुगतान कैसे जारी कर दिया?
ट्रैवल एजेंसी द्वारा अपनी लॉग बुक में यात्रा के कुल किलोमीटर और तिथियों का जिक्र होता है। टैक्सी चालक लॉग बुक में यात्रा करने वाले के हस्ताक्षर भी कराता है। विभिन्न टैक्सियों की लॉग बुक में हुए हस्ताक्षरों का मिलान क्यों नहीं कराया गया?
विशेषज्ञों का है कहना
होना तो यह चाहिए था कि मुकदमा एक ही दर्ज किया जाता। लेकिन कानूनी तौर पर अलग-अलग मुकदमे भी गलत नहीं ठहराए जा सकते, क्योंकि कई जगह धोखाधड़ी हुई है। अब सवाल आता है जांच का तो अलग-अलग मुकदमे इसे सही दिशा से भटका सकते हैं। जितने मुकदमे हैं, उतनी जांचें होने से आरोपियों को फायदा मिल सकता है। यह भी हो सकता है कि पर्दे के पीछे छिपे लोगों को बचाने के लिए ही यह रास्ता अपनाया गया हो। ऐसे में अगर विभाग की मंशा साफ है तो उसे शासन से मामले की पूरी जांच के लिए एक विशेष समिति की मांग करनी चाहिए। ऐसा हुआ तो पूरा खेल खुल जाएगा।
-चंद्रशेखर तिवारी, वरिष्ठ अधिवक्ता