Corona in Uttarakhand: खड़ा दीया अनुष्ठान के लिए 120 दंपतियों ने किया पंजीकरण, कोविड-19 निगेटिव रिपोर्ट जरूरी
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उत्तराखंड के श्रीनगर में कोविड-19 निगेटिव रिपोर्ट साथ लाने वाले दंपतियों को ही बैकुंठ चतुर्दशी के पर्व पर आयोजित होने वाले खड़ा दीया अनुष्ठान में शामिल होने की अनुमति मिलेगी। अब तक 120 नि:संतान दंपति खड़ा दीया अनुष्ठान के लिए पंजीकरण करा चुके हैं। शनिवार को कमलेश्वर मंदिर में अनुष्ठान का आयोजन होगा। इसी दिन कमलेश्वर मंदिर सहित अन्य शिवालयों में 365 रुई की बत्तियां भी भगवान शिव को अर्पित की जाएंगी।
हर साल कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी के मौके पर कमलेश्वर महादेव में खड़ा दीया अनुष्ठान होता है। यहां संतान प्राप्ति की कामना लेकर नि:संतान दंपति रात भर हाथों में दीपक लेकर खड़े रहते हैं। इस अनुष्ठान के लिए काफी समय पूर्व पंजीकरण शुरू हो जाता है। पिछले वर्ष अनुष्ठान में 175 नि:संतान दंपति शामिल हुए थे। इस बार कोरोना संक्रमण के कारण अनुष्ठान और मेले पर असर पड़ा है।
कमलेश्वर महादेव मंदिर के महंत आशुतोष पुरी ने बताया कि अनुष्ठान के लिए उत्तराखंड सहित अन्य प्रदेशों के 120 निसंतान दंपतियों ने पंजीकरण करवाया है। जो भी अनुष्ठान में शामिल होगा, उसे कोविड-19 की निगेटिव रिपोर्ट लानी होगी। उन्होंने बताया कि इसी दिन मंदिर में श्रद्धालु 365 बत्ती चढ़ाने भी आएंगे। सोशल डिस्टेसिंग का पालन करवाने के लिए प्रशासन से अनुरोध किया गया है।
नि: संतान ऋषि दंपति को मिला था संतान प्राप्ति का वर
पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, एक बार देवता दानवों से पराजित हो गए। तब वह भगवान विष्णु की शरण में गए। दानवों पर विजय प्राप्त करने के लिए भगवान विष्णु यहां भगवान शिव की तपस्या करने आए। पूजा के दौरान वह शिव सहस्रनाम के अनुसार शिवजी के नाम का उच्चारण कर सहस्र (एक हजार) कमलों को एक-एक करके शिवलिंग पर चढ़ाने लगे।
विष्णु की परीक्षा लेने के लिए शिव ने एक कमल पुष्प छिपा लिया। एक कमल पुष्प कम होने से यज्ञ में कोई बाधा न पड़े इसके लिए भगवान विष्णु ने अपना एक नेत्र अर्पित करने का संकल्प लिया। इससे प्रसन्न होकर भोलेनाथ ने भगवान विष्णु को अमोघ सुदर्शन चक्र दिया, जिससे भगवान विष्णु ने राक्षसों का विनाश किया।
सहस्र कमल चढ़ाने की वजह से इस मंदिर को कमलेश्वर महादेव मंदिर कहा जाने लगा। इस पूजा को एक नि: संतान ऋषि दंपति देख रहे थे। मां पार्वती के अनुरोध पर शिव ने उन्हें संतान प्राप्ति का वर दिया। तब से यहां कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी (बैकुंठ चतुर्दशी) की रात संतान की मनोकामना लेकर लोग पहुंचते हैं।