उत्तरा के तबादले की गुहार पर सीएम ने लगाई फटकार, लेकिन हर कानून से परे ‘महानुभावों’ के चहेते
पिछले दिनों एक शिक्षिका ने सीएम जनता दरबार में तबादले की गुहार लगाई तो उन्हें फटकार मिली। इतना हीं नहीं सस्पेंड कर दिया गया। लेकिन उत्तराखंड में यह नियम केवल आम जनता के लिए हैं, 'महानुभावों' के चहेतों का इससे दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं है।
प्रदेश में ट्रांसफर एक्ट भले ही लागू हो गया हो लेकिन मंत्री-विधायकों व अधिकारियों की पत्नियों, नजदीकी रिश्तेदारों और चहेतों पर यह लागू नहीं हो रहा।
इनको एडजस्ट करने के लिए तमाम कायदे-कानूनों को दरकिनार किया जा रहा है। आम शिक्षक जहां वर्षों दुर्गम की मुश्किलों के बीच नौकरी करने को मजबूर हैं, वहीं पहुंच वालों की पूरी सेवा सुगम में ही कट रही है।
1998 से अजबपुर में मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत की पत्नी सुनीता
2008 में उनकी पदोन्नति राजकीय कन्या पूर्व माध्यमिक विद्यालय, अजबपुर कलां में हुई। तब से वह उसी विद्यालय में कार्यरत हैं।
सुनीता रावत ने बताया कि 1992 में उन्होंने खिर्सू ब्लॉक, पौड़ी गढ़वाल के कफल्डी विद्यालय में पहली ज्वाइनिंग दी थी। यह विद्यालय सड़क से करीब चार-पांच किमी की पैदल चढ़ाई पर था। इसके बाद 1996 से 1998 तक उन्होंने कालसी के अतिदुर्गम विद्यालय में सेवाएं दी।
पांच साल से अटैच हैं कैबिनेट मंत्री की पत्नी चंद्रा पंत
पहुंच वालों के लिए रास्ते कई हैं
नियम-कायदों के बावजूद पहुंच वाले शिक्षक दुर्गम की सेवा से बचने का रास्ता ढूंढ ही लेते हैं। सरकार और विभाग भी उनके लिए रास्ता निकालने में पीछे नहीं हटता। ऐसा ही एक मामला भाजपा प्रदेश उपाध्यक्ष ज्योति प्रसाद गैरोला की पत्नी का भी है। अटैचमेंट पर रोक के बाद उन्हें चार अन्य शिक्षकों के साथ शिक्षा निदेशालय अटैच कर दिया गया। शिक्षक शिकायत प्रकोष्ठ के नाम पर ये पांचों शिक्षक दून स्थित निदेशालय में जमे हुए हैं।
दमयंती पर कार्रवाई का दम नहीं जुटा पाई थी सरकार
करीब दो साल विद्यालय से बिना बताए गायब रहने पर सरकार ने उत्तरा पंत बहुगुणा को सस्पेंड करने का आदेश जारी कर दिया है। इससे करीब एक साल पहले के दमयंती रावत प्रकरण की यादें फिर ताजा हो गई है। दमयंती भी करीब 14 माह तक विभाग से बिना बताए गायब रहीं। हालांकि जीरो टॉलरेंस की सरकार उनके खिलाफ कार्रवाई की हिम्मत नहीं जुटा पाई थी। इसके बाद दमयंती को मनचाही तैनाती भी मिल गई।
दमयंती रावत पहली बार तब चर्चा में आईं जब अगस्त 2012 में विजय बहुगुणा सरकार के दौरान बीईओ सहसपुर रहते हुए उन्हें बीज एवं जैविक प्रमाणीकरण अभिकरण में निदेशक पद पर प्रतिनियुक्ति दी गई। प्रतिनियुक्ति के लिए दमयंती ने शिक्षा विभाग से एनओसी नहीं ली। तत्कालीन शिक्षा मंत्री मंत्री प्रसाद नैथानी ने इस पर आपत्ति जताई, जिसको लेकर उनका तत्कालीन कृषि मंत्री डा. हरक सिंह रावत से खासा विवाद भी हुआ। मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की मध्यस्थता के बावजूद दोनों के बीच तनातनी की खबरें भी आई। जिस पर दो माह बाद दमयंती को निदेशक पद से हटाकर छह अक्तूबर 2012 को कृषि विभाग में ओएसडी बना दिया गया। हालांकि दमयंती ने निदेशक का पद नहीं छोड़ा।
20 मई 2016 को कृषि एवं विपणन अनुभाग ने दमयंती को निदेशक पद से कार्यमुक्त करते हुए वापस मूल विभाग भेज दिया। इसके बाद करीब 14 माह तक दमयंती ने शिक्षा विभाग में ज्वाइनिंग नहीं दी। लंबे समय तक बिना सूचना के गायब रहने के मुद्दे पर शिक्षा विभाग ने 17 फरवरी 2017 को उन्हें आरोप पत्र भी जारी किया। इस पर दमयंती ने 10 जुलाई 2017 को शिक्षा विभाग में ज्वाइनिंग कर ली। करीब पांच माह सेवा देने के बाद उन्हें श्रम विभाग में प्रतिनियुक्ति पर नई तैनाती दी गई। इस बार भी उन्होंने शिक्षा विभाग से एनओसी नहीं ली। उल्टा अपर कार्याधिकारी पद पर ज्वाइनिंग लेने के बाद बोर्ड ने शिक्षा विभाग को एनओसी के लिए लिखा। इस मामले में शिक्षा मंत्री अरविंद पांडेय ने उन्हें कार्रवाई की चेतावनी दी। हालांकि बाद में वे बैकफुट पर चले गए और विभाग ने दमयंती को एनओसी जारी कर दी।