कुटीर रोकेगा पलायन : कभी घराट के इर्द गिर्द घूमता था पहाड़ का जीवन
- आमदनी का सबसे सशक्त जरिया मिटने की कगार पर
- हर गांव को आज भी रोजगार देने में सक्षम हैं घराट
- अपग्रेडेड घराट बन रहे हैं लोगों की आर्थिकी का जरिया
विस्तार
केदारघाटी के अंतिम गांव गौंदार के एक बुजुर्ग की धुंधलाई हुई नजरों को पास ही में पानी से चलता घराट ताकत देता है। उरेडा की मदद से अपग्रेड किए गए इस घराट से वह अनाज पीसते हैं और बिजली बनाते हैं।
उनकी यह पहल दम तोड़ रहे घराटों को नए जीवन देने की उम्मीद जगाती है और हौसला देती है कि प्रयास हों तो पहाड़ के जीवन की धुरी फिर से घराट बन सकता है। उरेडा की मानें तो प्रदेश में करीब 17 हजार घराट अब भी मौजूद हैं। इनमें से मात्र 1300 का अपग्रेडेशन हो पाया है। दावा यह भी है कि प्रदेश में 70 हजार से अधिक घराट मौजूद हैं।
कभी गाड़ गदेरों से लेकर नदियों तक के पानी से चलने वाले घराट पर्वतीय क्षेत्र में आमदनी का जरिया होने के साथ ही मेल मिलाप स्थल भी थे। घराट ही थे जिनसे पिसकर निकलने वाला अनाज जरूरी सामान के रूप में लेन देन के जरिये दिखाई देता था। घराट सिर्फ घराट नहीं थे, बल्कि लोगों की सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन की धुरी हुआ करते थे।
विशेषज्ञों के मुताबिक आज से करीब 50 साल पहले ही हर गांव में खासी संख्या में घराट हुआ करते थे। हैस्को के संस्थापक निदेशक अनिल जोशी के मुताबिक, हिमालय क्षेत्र में करीब दो लाख घराट थे। उत्तराखंड में ही इनकी संख्या में 70 हजार से अधिक थी। समय के बदलने के साथ ही इन घराटों की उपयोगिता कम हुई और इनके आधुनिकीकरण पर ध्यान न देने की वजह से गांवों का यह कुटीर उद्योग समाप्त होने की कगार पर पहुंच गया।
गांव गौंदार आज भी घराट से मिलने वाली बिजली से रोशन होता
ऊखीमठ घाटी का अंतिम गांव गौंदार आज भी घराट से मिलने वाली बिजली से रोशन होता है। संरक्षित वन क्षेत्र में होने के कारण इस गांव तक अभी बिजली नहीं पहुंची है। गांव के लोग घराट से अनाज भी पीसते हैं और इससे बिजली भी लेते हैं। यह घराट का आधुनिक स्वरूप है, जो अपनी उपयोगिता बनाए हुए है।
इतना होने पर भी मौसम के बदलाव के कारण भी घराटों पर असर पड़ा है। सोमेश्वर सहित चमोली की कई घाटियों में पानी कम होने के कारण घराट बंद हुए। दूसरी ओर बेहद कम पानी से चल जाने वाले घराट इनकी जगह स्थापित नहीं किए गए।
घराट से पिसाई और बिजली उत्पादन
पिथौरागढ़ जनपद के चैंसर गांव में कृष्ण राम कोहली घराट से गेहूं, मसाले पीसने के साथ बिजली भी तैयार कर रहे हैं। घराट से एक घंटे में 60 किलो. गेहूं पीसा जाता है और दो किलोवाट तक बिजली बन रही है।
उत्तराखंड अक्षय ऊर्जा विकास अभिकरण (उरेडा) की योजना के तहत कृष्ण राम ने वर्ष 2017 में पुराने घराट का उच्चीकरण किया। जिस पर 2.10 लाख रुपये की लागत आई। जिस पर सरकार से 1.5 लाख रुपये का अनुदान मिला। अब उनकी घराट से 50 किलोवाट तक बिजली उत्पादन करने की योजना है।
जिला - अपग्रेड घराटों की संख्या
पौड़ी - 62
टिहरी - 226
चमोली - 298
उत्तरकाशी - 108
रुद्रप्रयाग - 48
देहरादून - 155
नैनीताल - 111
अल्मोड़ा - 42
बागेश्वर - 150
चंपावत - 86
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कुल - 1341
एक नजर में...
- दो लाख से अधिक घराट थे हिमालय क्षेत्र में
- मास्टरों को वेतन मिलता था घराट के टैक्स से
- कभी वह भी दौर था कि घराटों से होने वाली पिसाई की एवज में अंग्रेज हुकूमत टैक्स लिया करती थी। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि घराट पर्वतीय क्षेत्र में कितने प्रचलित थे। इतना ही नहीं यह टैक्स इतना था कि इससे मास्टरों को वेतन दिया जाता है
- उरेडा के सर्वे के अनुसार प्रदेश में 15449 पारंपरिक घराट हैं, इन घराटों का आधुनिकीकरण कर बिजली तैयार की जा रही है
- दुर्गम क्षेत्रों में घराट अनाज, मसाला पीसने के साथ ही बिजली बनाने के काम में आ सकते हैं
- पांच किलोवाट तक के घराट को अपग्रेड करने के लिए छह हजार रुपये की सब्सिडी भी है
मेरा साफ मानना है कि घराट से पहाड़ की अर्थव्यवस्था सुधारी जा सकती है। हैस्को ने कई घराटों का आधुनिकीकरण किया और पाया कि इससे घराट संचालकों की आमदनी में खासा इजाफा हुआ। नई तकनीक से घराट अब बहुपयोगी हो गए हैं। इनसे बिजली पैदा की जा सकती है और तेल निकालने, अनाज पीसने से लेकर कई और काम किए जा सकते हैं। गांव-गांव में घराट लगते हैं तो रोजगार का यह बड़ा साधन हो सकता है। हैस्को ने जिन घराटों को अपग्रेड किया उनसे लोग 25 हजार रुपये प्रति माह से अधिक की आमदनी कर रहे हैं।
- डा. अनिल जोशी, संस्थापक हैस्को