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Uttarakhand High court: सरकार का नियम रद्द, 32 साल के संघर्ष के बाद वीरांगना को मिलेगी पेंशन, पढ़ें पूरा मामला
Thu, 20 Oct 2022 11:35 PM IST
अलका त्यागी
संवाद न्यूज एजेंसी, नैनीताल
संवाद न्यूज एजेंसी, नैनीताल
Published by: अलका त्यागी
Updated Thu, 20 Oct 2022 11:35 PM IST
सार
32 साल पहले पेंशन के लिए आवेदन करने वाली इस वीरांगना को प्रदेश के गृह विभाग ने इस आधार पर पेंशन देने से मना कर दिया था कि उनके पति स्वाधीनता संग्राम में दो महीने तक जेल में नहीं रहे।
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नैनीताल हाईकोर्ट
- फोटो : PTI
विस्तार
स्वतंत्रता सेनानियों के आश्रितों को इस आधार पर पेंशन से वंचित नहीं रखा जा सकता कि सेनानी दो माह तक जेल में नहीं रहा। प्रदेश सरकार की ओर से 2014 में बनाया गया वह नियम हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया है, जिसमें प्रावधान था कि उन्हीं सेनानियों के आश्रितों को पेंशन का लाभ देय होगा, जो कम से कम दो महीने जेल में रहे हों।
इसी के साथ अदालत ने एक स्वतंत्रता सेनानी की वीरांगना को आवेदन की तिथि से अब तक की पेंशन का भुगतान करने का निर्देश दिया है। 32 साल पहले पेंशन के लिए आवेदन करने वाली इस वीरांगना को प्रदेश के गृह विभाग ने इस आधार पर पेंशन देने से मना कर दिया था कि उनके पति स्वाधीनता संग्राम में दो महीने तक जेल में नहीं रहे।
वरिष्ठ न्यायमूर्ति संजय कुमार मिश्रा की एकलपीठ के समक्ष हल्दूचौड़ (नैनीताल) के गंगापुर कब्डाल निवासी मोहिनी देवी की याचिका पर बृहस्पतिवार को सुनवाई हुई। याचिका में मोहिनी ने कहा है कि उनके पति मथुरा दत्त कब्डाल की 1979 में मृत्यु हो गई थी लेकिन उनको पेंशन नहीं दी जा रही है। उनके पति 1946 में ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध प्रदर्शन करने पर जेल गए थे। उन्हें दो माह के कारावास की सजा सुनाई गई थी।
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मोहिनी ने पति की मृत्यु के बाद 1990 में प्रशासन के समक्ष स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित पेंशन के लिए आवेदन किया। पट्टी पटवारी ने रिपोर्ट लगाई और अपर जिलाधिकारी ने संस्तुति सहित प्रकरण शासन को भेजा। 2018 में गृह विभाग उत्तराखंड ने पेंशन का आवेदन इस आधार पर निरस्त कर दिया कि 2014 में पुराना नियम बदल दिया गया है। अब उसी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी या आश्रित को पेंशन दी जाएगी जो न्यूनतम दो माह तक जेल में रहा हो।
याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि उनके पति के नाम पर एनडी तिवारी ने विद्यालय सभागार बनाया। शिलापट में भी उनका नाम दर्ज है। पक्षों की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की एकलपीठ ने सरकार के 2014 में बदले गए नियम को निरस्त करते हुए वीरांगना को आवेदन के वर्ष 1990 से अब तक की पेंशन का भुगतान करने के आदेश दिए हैं।
सेनानियों के आश्रितों को पेंशन के लिए चार दशक का इंतजार, कष्टदायक : हाईकोर्ट
हाईकोर्ट की एकलपीठ ने टिप्पणी की कि जिन स्वतंत्रता सेनानियों के त्याग और संघर्ष की वजह से हम खुली हवा में सांस ले रहे हैं, उनके आश्रितों को पेंशन के लिए चार दशक का इंतजार करना पड़ा, यह बेहद कष्टदायक है।
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इसी के साथ अदालत ने एक स्वतंत्रता सेनानी की वीरांगना को आवेदन की तिथि से अब तक की पेंशन का भुगतान करने का निर्देश दिया है। 32 साल पहले पेंशन के लिए आवेदन करने वाली इस वीरांगना को प्रदेश के गृह विभाग ने इस आधार पर पेंशन देने से मना कर दिया था कि उनके पति स्वाधीनता संग्राम में दो महीने तक जेल में नहीं रहे।
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वरिष्ठ न्यायमूर्ति संजय कुमार मिश्रा की एकलपीठ के समक्ष हल्दूचौड़ (नैनीताल) के गंगापुर कब्डाल निवासी मोहिनी देवी की याचिका पर बृहस्पतिवार को सुनवाई हुई। याचिका में मोहिनी ने कहा है कि उनके पति मथुरा दत्त कब्डाल की 1979 में मृत्यु हो गई थी लेकिन उनको पेंशन नहीं दी जा रही है। उनके पति 1946 में ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध प्रदर्शन करने पर जेल गए थे। उन्हें दो माह के कारावास की सजा सुनाई गई थी।
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मोहिनी ने पति की मृत्यु के बाद 1990 में प्रशासन के समक्ष स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित पेंशन के लिए आवेदन किया। पट्टी पटवारी ने रिपोर्ट लगाई और अपर जिलाधिकारी ने संस्तुति सहित प्रकरण शासन को भेजा। 2018 में गृह विभाग उत्तराखंड ने पेंशन का आवेदन इस आधार पर निरस्त कर दिया कि 2014 में पुराना नियम बदल दिया गया है। अब उसी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी या आश्रित को पेंशन दी जाएगी जो न्यूनतम दो माह तक जेल में रहा हो।
याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि उनके पति के नाम पर एनडी तिवारी ने विद्यालय सभागार बनाया। शिलापट में भी उनका नाम दर्ज है। पक्षों की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की एकलपीठ ने सरकार के 2014 में बदले गए नियम को निरस्त करते हुए वीरांगना को आवेदन के वर्ष 1990 से अब तक की पेंशन का भुगतान करने के आदेश दिए हैं।
सेनानियों के आश्रितों को पेंशन के लिए चार दशक का इंतजार, कष्टदायक : हाईकोर्ट
हाईकोर्ट की एकलपीठ ने टिप्पणी की कि जिन स्वतंत्रता सेनानियों के त्याग और संघर्ष की वजह से हम खुली हवा में सांस ले रहे हैं, उनके आश्रितों को पेंशन के लिए चार दशक का इंतजार करना पड़ा, यह बेहद कष्टदायक है।