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शहादत के दस साल बाद भी परिवार के साथ हैं बहादुर
Updated Fri, 27 Jul 2018 02:18 AM IST
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आफताब अजमत, देहरादून
शहादत के दस साल बाद भी बहादुर सिंह बोहरा परिवार के साथ रहते हैं। वह बेटियों की शिकायतें सुनते हैं तो पत्नी की उदासी भी दूर करते हैं। परिवार के हर खुशी-गम का हिस्सा बनते हैं। यह कोई फसाना नहीं बल्कि सच्चाई है एक वीर नारी की अपने शहीद पति से प्रेम की, बेटियों की अपने पिता से लगाव की। यह हकीकत है, शहादत का दुख दूर कर जोशीली यादों को संजोकर रखने की। यह दास्तां है गढ़ी कैंट, घंघोड़ा के बिलासपुर कांडली गांव में अशोक चक्र विजेता शहीद बहादुर सिंह बोहरा के परिवार की। आंगन में स्थापित बहादुर सिंह बोहरा की प्रतिमा से परिवार को कभी उनकी कमी महसूस नहीं होती है।
हवलदार बहादुर सिंह बोहरा 10 पैरा में तैनात थे। 26 सितंबर वर्ष 2008 को जम्मू-कश्मीर के गांदरबल जिले में आतंकियों से लोहा लेते हुए वह शहीद हो गए। शहादत से पहले अपने नाम के मुताबिक, उन्होंने बहादुरी से पांच आतंकियों को मौत के घाट उतारा था। उनकी इसी जांबाजी के लिए उन्हें 26 जनवरी 2009 को मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित किया गया। उधर, परिवार के लिए उनकी शहादत दुखों के साथ चुनौतियां भी लेकर आई। उनकी बड़ी बेटी चार साल और छोटी बेटी दो साल की थी। पत्नी शांति बोहरा के लिए यह परिस्थितियां बेहद विकट थीं। ऐसे में उन्होंने पति को ही जीने का सहारा बनाने का फैसला किया।
शांति बताती हैं कि उन्होंने घर के आंगन में ही शहीद पति की प्रतिमा स्थापित कर ली। इससे लगता है कि हर समय वह साथ हैं। जब कोई परेशानी होती है तो वह पति की प्रतिमा के पास जाती हैं। कभी याद सताती है तो भी पति की प्रतिमा के पास चली जाती हैं। जब बेटियों (मानसी, साक्षी) को पापा की याद आती है तो वे भी उनकी प्रतिमा के पास जाकर खड़ी हो जाती हैं। परिवार का विश्वास है कि शहीद बहादुर सिंह बोहरा हर समय साथ हैं। हर सुख-दुख में वे पहले उन्हें याद करते हैं। शांति ने बताया कि उनकी शहादत पर हर साल 26 सितंबर को गांव में शहीद दिवस मनाया जाता है।
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बेटियों को पिता पर गर्व
शहीद हवलदार बहादुर सिंह बोहरा की बेटियों को अपने पिता पर गर्व है। उनका कहना है कि भले ही वह अपने पापा को बचपन में न देख पाए हों, लेकिन अब उन्हें उनके न होने का गम नहीं है। क्योंकि पापा हर समय साथ रहते हैं। बड़ी बेटी का कहना है कि मौका मिला तो वह भी सेना में जाना पसंद करेंगी।
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सरकार पेट्रोल पंप देना भूली
शहीद परिवार के लिए सरकार की बेरुखी परिवार के लिए मुश्किल हालात पैदा करने वाली है। शहीद की पत्नी शांति बोहरा बताती हैं कि जब उनके पति शहीद हुए थे तो सरकार ने पेट्रोल पंप आवंटित करने की घोषणा की थी। उन्होंने कई बार मांग की, अधिकारियों से मिलीं, लेकिन आज तक पेट्रोल पंप आवंटित नहीं हुआ है।
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शहादत के दस साल बाद भी बहादुर सिंह बोहरा परिवार के साथ रहते हैं। वह बेटियों की शिकायतें सुनते हैं तो पत्नी की उदासी भी दूर करते हैं। परिवार के हर खुशी-गम का हिस्सा बनते हैं। यह कोई फसाना नहीं बल्कि सच्चाई है एक वीर नारी की अपने शहीद पति से प्रेम की, बेटियों की अपने पिता से लगाव की। यह हकीकत है, शहादत का दुख दूर कर जोशीली यादों को संजोकर रखने की। यह दास्तां है गढ़ी कैंट, घंघोड़ा के बिलासपुर कांडली गांव में अशोक चक्र विजेता शहीद बहादुर सिंह बोहरा के परिवार की। आंगन में स्थापित बहादुर सिंह बोहरा की प्रतिमा से परिवार को कभी उनकी कमी महसूस नहीं होती है।
हवलदार बहादुर सिंह बोहरा 10 पैरा में तैनात थे। 26 सितंबर वर्ष 2008 को जम्मू-कश्मीर के गांदरबल जिले में आतंकियों से लोहा लेते हुए वह शहीद हो गए। शहादत से पहले अपने नाम के मुताबिक, उन्होंने बहादुरी से पांच आतंकियों को मौत के घाट उतारा था। उनकी इसी जांबाजी के लिए उन्हें 26 जनवरी 2009 को मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित किया गया। उधर, परिवार के लिए उनकी शहादत दुखों के साथ चुनौतियां भी लेकर आई। उनकी बड़ी बेटी चार साल और छोटी बेटी दो साल की थी। पत्नी शांति बोहरा के लिए यह परिस्थितियां बेहद विकट थीं। ऐसे में उन्होंने पति को ही जीने का सहारा बनाने का फैसला किया।
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शांति बताती हैं कि उन्होंने घर के आंगन में ही शहीद पति की प्रतिमा स्थापित कर ली। इससे लगता है कि हर समय वह साथ हैं। जब कोई परेशानी होती है तो वह पति की प्रतिमा के पास जाती हैं। कभी याद सताती है तो भी पति की प्रतिमा के पास चली जाती हैं। जब बेटियों (मानसी, साक्षी) को पापा की याद आती है तो वे भी उनकी प्रतिमा के पास जाकर खड़ी हो जाती हैं। परिवार का विश्वास है कि शहीद बहादुर सिंह बोहरा हर समय साथ हैं। हर सुख-दुख में वे पहले उन्हें याद करते हैं। शांति ने बताया कि उनकी शहादत पर हर साल 26 सितंबर को गांव में शहीद दिवस मनाया जाता है।
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बेटियों को पिता पर गर्व
शहीद हवलदार बहादुर सिंह बोहरा की बेटियों को अपने पिता पर गर्व है। उनका कहना है कि भले ही वह अपने पापा को बचपन में न देख पाए हों, लेकिन अब उन्हें उनके न होने का गम नहीं है। क्योंकि पापा हर समय साथ रहते हैं। बड़ी बेटी का कहना है कि मौका मिला तो वह भी सेना में जाना पसंद करेंगी।
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सरकार पेट्रोल पंप देना भूली
शहीद परिवार के लिए सरकार की बेरुखी परिवार के लिए मुश्किल हालात पैदा करने वाली है। शहीद की पत्नी शांति बोहरा बताती हैं कि जब उनके पति शहीद हुए थे तो सरकार ने पेट्रोल पंप आवंटित करने की घोषणा की थी। उन्होंने कई बार मांग की, अधिकारियों से मिलीं, लेकिन आज तक पेट्रोल पंप आवंटित नहीं हुआ है।