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वन विकास निगम को नहीं मिल रहे कत्था कारोबारी
Updated Sat, 21 Jul 2018 02:04 AM IST
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ब्यूरो / अमर उजाला ब्यूरो, देहरादून ।
राज्य में खैर की लकड़ी से कत्था बनाने वाली फैक्ट्रियों के बंद होने की वजह से दो करोड़ कीमत की खैर की लकड़ी वन विकास निगम के गोदामों में यूं ही बर्बाद हो रही है। अब वन विकास निगम के अफसरों ने इन लकड़ियों को बेचने के लिए दूसरे राज्यों के कत्था बनाने वाली फैक्ट्रियों के संचालकों से संपर्क साधा है।
उल्लेखनीय है कि राज्य के विभिन्न इलाकों में बड़े पैमाने पर खैर के पेड़ पाए जाते हैं। वैसे तो वन क्षेत्र में खड़े हरे पेड़ों को काटने पर प्रतिबंध है, लेकिन नदियों के किनारे खड़े तमाम खैर के पेड़ बारिश के दौरान उखड़कर नदियों में समा जाते हैं। इन्हें वन विकास निगम की ओर से इकट्ठा कर लिया जाता है। निगम के सूत्रों की माने तो राज्य के अलग अलग गोदामों में दो करोड़ से ज्यादा कीमत की 200 ट्रक खैर की लकड़ी यूं ही बर्बाद हो रही है। कत्था बनाने की फैक्ट्रियों के बंद हो जाने से इनका कोई खरीदार नहीं मिल रहा है। हल्द्वानी और नजीबाबाद में संचालित कत्था निर्माण करने वाली फैक्ट्रियों में लकड़ी की खपत हो जाती थी, लेकिन अब इन दोनों फैक्ट्रियों के बंद हो जाने से खैर की लकड़ी का कोई खरीदार नहीं है। वन विकास निगम के प्रबंध निदेशक एवं एपीसीसीएफ जेएस सुहाग ने बताया कि खैर की लकड़ी को बेचा जा सके, इसके लिए दूसरे राज्यों में स्थित कत्था फैक्ट्रियों के संचालकों से संपर्क साधा जा रहा है। जल्द ही इन लकड़ियों को बेचने का इंतजाम किया जाएगा।
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राज्य में खैर की लकड़ी से कत्था बनाने वाली फैक्ट्रियों के बंद होने की वजह से दो करोड़ कीमत की खैर की लकड़ी वन विकास निगम के गोदामों में यूं ही बर्बाद हो रही है। अब वन विकास निगम के अफसरों ने इन लकड़ियों को बेचने के लिए दूसरे राज्यों के कत्था बनाने वाली फैक्ट्रियों के संचालकों से संपर्क साधा है।
उल्लेखनीय है कि राज्य के विभिन्न इलाकों में बड़े पैमाने पर खैर के पेड़ पाए जाते हैं। वैसे तो वन क्षेत्र में खड़े हरे पेड़ों को काटने पर प्रतिबंध है, लेकिन नदियों के किनारे खड़े तमाम खैर के पेड़ बारिश के दौरान उखड़कर नदियों में समा जाते हैं। इन्हें वन विकास निगम की ओर से इकट्ठा कर लिया जाता है। निगम के सूत्रों की माने तो राज्य के अलग अलग गोदामों में दो करोड़ से ज्यादा कीमत की 200 ट्रक खैर की लकड़ी यूं ही बर्बाद हो रही है। कत्था बनाने की फैक्ट्रियों के बंद हो जाने से इनका कोई खरीदार नहीं मिल रहा है। हल्द्वानी और नजीबाबाद में संचालित कत्था निर्माण करने वाली फैक्ट्रियों में लकड़ी की खपत हो जाती थी, लेकिन अब इन दोनों फैक्ट्रियों के बंद हो जाने से खैर की लकड़ी का कोई खरीदार नहीं है। वन विकास निगम के प्रबंध निदेशक एवं एपीसीसीएफ जेएस सुहाग ने बताया कि खैर की लकड़ी को बेचा जा सके, इसके लिए दूसरे राज्यों में स्थित कत्था फैक्ट्रियों के संचालकों से संपर्क साधा जा रहा है। जल्द ही इन लकड़ियों को बेचने का इंतजाम किया जाएगा।
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