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सेवा तो दूर गुजारे को भी मोहताज मां-बाप प्र
Updated Tue, 01 May 2018 02:04 AM IST
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ब्यूरो/अमर उजाला/देहरादून।
वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम के तहत दो ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें कुछ महीनों तक भरण पोषण भत्ता देने के बाद संतानों ने फिर से मां-बाप से किनारा कर लिया। ऐसी बेमुरव्वत औलादों की वजह से अब इन बुजुर्गों को कोई राह नहीं सूझ रही है।
दरअसल बच्चों द्वारा घर से निकाले गए मां-बाप के भरण-पोषण के लिए सरकार की ओर से राज्य में वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम लागू किया गया है। इस अधिनियम के तहत आने वाले मामलों की सुनवाई एसडीएम की अध्यक्षता में होती है। काउंसिलिंग के दौरान पहले अधिकारी मां-बाप की सेवा के लिए संतानों को प्रेरित करते हैं। संतानों द्वारा सेवा से इनकार करने की स्थिति में प्रशासन माता-पिता के भरण-पोषण के लिए मासिक भत्ता तय कर देते हैं। यह भत्ता संतानों को देना होता है।
ऐसा ही एक मामला अजबपुर खुर्द निवासी बृजमोहन पंत का है। बृजमोहन पंत ने वर्ष 2016 में समाज कल्याण विभाग में अपील की थी। इसके बाद एसडीएम की अध्यक्षता में हुई सुनवाई के बाद माता-पिता को एक कमरा देने और समय पर भोजन देने के आदेश दिए गए। बृजमोहन के अनुसार कुछ महीने तक बेटे ने उनका ख्याल रखा, लेकिन अब हालात पहले से भी बदतर हैं।
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दूसरा मामला मोती बाजार के निवासी गुरचरण कौर का है। जिनके बेटे को प्रशासनिक अधिकारी ने 3000 रुपये प्रतिमाह गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया था। बेटे ने कुछ समय तक आदेशों के अनुपालन में गुजारा भत्ता दिया, लेकिन कुछ समय बाद ही आर्थिक तंगी का हवाला देकर रुपये देने के इनकार कर दिया। इसके कारण गुरचरण कौर बेहद तंगहाली में जी रहे हैं।
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मामला मेरे संज्ञान में नहीं है। अगर कोई भी परिजन दुखी हैं और आदेश के बाद भी उन्हें गुजारा भत्ते का लाभ नहीं मिल पा रहा है तो ऐसे परिजन कोतवाली में जाकर रिपोर्ट दर्ज करा सकते हैं।
-प्रत्यूष सिंह, एसडीएम सदर
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वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम के तहत दो ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें कुछ महीनों तक भरण पोषण भत्ता देने के बाद संतानों ने फिर से मां-बाप से किनारा कर लिया। ऐसी बेमुरव्वत औलादों की वजह से अब इन बुजुर्गों को कोई राह नहीं सूझ रही है।
दरअसल बच्चों द्वारा घर से निकाले गए मां-बाप के भरण-पोषण के लिए सरकार की ओर से राज्य में वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम लागू किया गया है। इस अधिनियम के तहत आने वाले मामलों की सुनवाई एसडीएम की अध्यक्षता में होती है। काउंसिलिंग के दौरान पहले अधिकारी मां-बाप की सेवा के लिए संतानों को प्रेरित करते हैं। संतानों द्वारा सेवा से इनकार करने की स्थिति में प्रशासन माता-पिता के भरण-पोषण के लिए मासिक भत्ता तय कर देते हैं। यह भत्ता संतानों को देना होता है।
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ऐसा ही एक मामला अजबपुर खुर्द निवासी बृजमोहन पंत का है। बृजमोहन पंत ने वर्ष 2016 में समाज कल्याण विभाग में अपील की थी। इसके बाद एसडीएम की अध्यक्षता में हुई सुनवाई के बाद माता-पिता को एक कमरा देने और समय पर भोजन देने के आदेश दिए गए। बृजमोहन के अनुसार कुछ महीने तक बेटे ने उनका ख्याल रखा, लेकिन अब हालात पहले से भी बदतर हैं।
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दूसरा मामला मोती बाजार के निवासी गुरचरण कौर का है। जिनके बेटे को प्रशासनिक अधिकारी ने 3000 रुपये प्रतिमाह गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया था। बेटे ने कुछ समय तक आदेशों के अनुपालन में गुजारा भत्ता दिया, लेकिन कुछ समय बाद ही आर्थिक तंगी का हवाला देकर रुपये देने के इनकार कर दिया। इसके कारण गुरचरण कौर बेहद तंगहाली में जी रहे हैं।
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मामला मेरे संज्ञान में नहीं है। अगर कोई भी परिजन दुखी हैं और आदेश के बाद भी उन्हें गुजारा भत्ते का लाभ नहीं मिल पा रहा है तो ऐसे परिजन कोतवाली में जाकर रिपोर्ट दर्ज करा सकते हैं।
-प्रत्यूष सिंह, एसडीएम सदर