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बारिश में भक्ति से सराबोर होकर झूमे श्रद्धालु
Updated Thu, 19 Jul 2018 02:08 AM IST
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बारिश में भक्ति से सराबोर होकर झूमे श्रद्धालु
ब्यूरो/अमर उजाला
देहरादून। मां डाट काली सिद्धपीठ के 215वें वार्षिकोत्सव के उपलक्ष्य में बुधवार को शिवाजी धर्मशाला से नगर परिक्रमा शोभायात्रा निकाली गई। परिक्रमा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल रहे। रिमझिम बारिश के दौरान जगह-जगह नगर परिक्रमा का पुष्प वर्षा कर स्वागत किया गया। 20 जुलाई को डाट काली मंदिर में भव्य जागरण का आयोजन किया जाएगा।
बुधवार दोपहर में शिवाजी धर्मशाला से नगर परिक्रमा शोभायात्रा शुरू की गई। इस दौरान श्रद्धालु जयकारे लगाते चल रहे थे। रिमझिम बारिश के दौरान परिक्रमा में शामिल भक्तजनों में खासा उत्साह था। उन्होंने एक दूसरे पर रंग लगाया। अनेक लोग हाथ में पांच झंडे लिए चल रहे थे। बैंडबाजों की धुन से वातावरण भक्तिमय हो गया। जगह-जगह लोगों ने पुष्प वर्षा कर परिक्रमा शोभायात्रा का स्वागत किया।
शिवाजी धर्मशाला से शुरू हुई परिक्रमा सहारनपुर चौक, झंडा बाजार से होते हुए शाकंभरी देवी मंदिर, अखाड़ा बाजार से हनुमान चौक पहुंची। वहां से परिक्रमा वापस शिवाजी धर्मशाला पहुंचकर संपन्न हुई।
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इससे पहले शिवाजी धर्मशाला में आयोजित प्रेसवार्ता में महंत रमन प्रसाद गोस्वामी ने बताया कि शहर में चल रहे अतिक्रमण हटाओ अभियान और यातायात व्यवस्था को देखते हुए परिक्रमा का दायरा कम रखा गया है। जिससे लोगों को परेशानी न हो। साथ ही झांकियां भी नहीं निकाली गईं। उन्होंने बताया कि परंपरा के तहत पांच झंडों में एक झंडा शाकंभरी देवी मंदिर, एक भद्रकाली मंदिर, एक हनुमान चौक और दो डाट काली मंदिर में रखे जाएंगे। उन्होंने बताया कि 20 जुलाई को मंदिर में भव्य जागरण होगा।
सेवादार गौरव ने बताया कि मंदिर से हजारों श्रद्धालुओं की आस्था जुड़ी है। वार्षिकोत्सव में कई राज्यों से भक्त आते हैं। उन्होंने बताया कि जागरण में पंजाब के कंद कलेर व सुरजीत माही, दिल्ली से मन्नू नूर व मास्टर नय्यर भजनों की प्रस्तुति देंगे। इस दौरान सेवादल से दिनेश अग्रवाल, हरीश, पवन सैनी, विशाल सूरी, सुनील चौहान, शिवम गोयल, पंकज, सोनू चौधरी, सुनील आहूजा आदि मौजूद रहे।
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डाट काली मंदिर का इतिहास
मां डाट काली मंदिर की स्थापना 15 जून सन 1804 को अषाढ़ माह की शुक्ल पक्ष की अष्टमी को हुई थी। स्थापना के अगले ही दिन मंदिर में भंडारा रखा गया। तब से आज तक अषाढ़ माह में शुक्ल पक्ष की अष्टमी को मंदिर में वार्षिकोत्सव धूमधाम से मनाया जाता है। घाटी में होने के कारण पहले इसे घाटकाली और सुरंग बनाने के बाद डाट काली के नाम से जाना जाता है।
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ब्यूरो/अमर उजाला
देहरादून। मां डाट काली सिद्धपीठ के 215वें वार्षिकोत्सव के उपलक्ष्य में बुधवार को शिवाजी धर्मशाला से नगर परिक्रमा शोभायात्रा निकाली गई। परिक्रमा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल रहे। रिमझिम बारिश के दौरान जगह-जगह नगर परिक्रमा का पुष्प वर्षा कर स्वागत किया गया। 20 जुलाई को डाट काली मंदिर में भव्य जागरण का आयोजन किया जाएगा।
बुधवार दोपहर में शिवाजी धर्मशाला से नगर परिक्रमा शोभायात्रा शुरू की गई। इस दौरान श्रद्धालु जयकारे लगाते चल रहे थे। रिमझिम बारिश के दौरान परिक्रमा में शामिल भक्तजनों में खासा उत्साह था। उन्होंने एक दूसरे पर रंग लगाया। अनेक लोग हाथ में पांच झंडे लिए चल रहे थे। बैंडबाजों की धुन से वातावरण भक्तिमय हो गया। जगह-जगह लोगों ने पुष्प वर्षा कर परिक्रमा शोभायात्रा का स्वागत किया।
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शिवाजी धर्मशाला से शुरू हुई परिक्रमा सहारनपुर चौक, झंडा बाजार से होते हुए शाकंभरी देवी मंदिर, अखाड़ा बाजार से हनुमान चौक पहुंची। वहां से परिक्रमा वापस शिवाजी धर्मशाला पहुंचकर संपन्न हुई।
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इससे पहले शिवाजी धर्मशाला में आयोजित प्रेसवार्ता में महंत रमन प्रसाद गोस्वामी ने बताया कि शहर में चल रहे अतिक्रमण हटाओ अभियान और यातायात व्यवस्था को देखते हुए परिक्रमा का दायरा कम रखा गया है। जिससे लोगों को परेशानी न हो। साथ ही झांकियां भी नहीं निकाली गईं। उन्होंने बताया कि परंपरा के तहत पांच झंडों में एक झंडा शाकंभरी देवी मंदिर, एक भद्रकाली मंदिर, एक हनुमान चौक और दो डाट काली मंदिर में रखे जाएंगे। उन्होंने बताया कि 20 जुलाई को मंदिर में भव्य जागरण होगा।
सेवादार गौरव ने बताया कि मंदिर से हजारों श्रद्धालुओं की आस्था जुड़ी है। वार्षिकोत्सव में कई राज्यों से भक्त आते हैं। उन्होंने बताया कि जागरण में पंजाब के कंद कलेर व सुरजीत माही, दिल्ली से मन्नू नूर व मास्टर नय्यर भजनों की प्रस्तुति देंगे। इस दौरान सेवादल से दिनेश अग्रवाल, हरीश, पवन सैनी, विशाल सूरी, सुनील चौहान, शिवम गोयल, पंकज, सोनू चौधरी, सुनील आहूजा आदि मौजूद रहे।
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डाट काली मंदिर का इतिहास
मां डाट काली मंदिर की स्थापना 15 जून सन 1804 को अषाढ़ माह की शुक्ल पक्ष की अष्टमी को हुई थी। स्थापना के अगले ही दिन मंदिर में भंडारा रखा गया। तब से आज तक अषाढ़ माह में शुक्ल पक्ष की अष्टमी को मंदिर में वार्षिकोत्सव धूमधाम से मनाया जाता है। घाटी में होने के कारण पहले इसे घाटकाली और सुरंग बनाने के बाद डाट काली के नाम से जाना जाता है।