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आपदा के पांच साल बाद भी पुनर्जीवित नहीं हो सके घराट
Updated Thu, 26 Jul 2018 02:24 AM IST
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- जनजातीय क्षेत्र जौनसार बावर में क्षतिग्रस्त पड़े हैं 96 घराट
ब्यूरो/अमर उजाला/विकासनगर/साहिया।
एक ओर प्रदेश सरकार पहाड़ी अंचलों में स्थित घराटों को पर्यटन से जोड़ने की बात कर रही है वहीं, जनजातीय क्षेत्र जौनसार बावर में करीब 96 ऐसे घराट हैं जो वर्ष 2013 में आई आपदा के बाद से अब तक पुनर्जीवित नहीं हो सके हैं। इन घराटों के सहारे जीवन गुजर-बसर करने वाले लोग आज मजदूरी कर पेट पालने को मजबूर हो गए हैं। दो साल पूर्व अक्षय ऊर्जा विकास अभिकरण (उरेडा) ने इन घराटों को उच्चीकृत कर लोगों को रोजगार देने के साथ ही इन घराटों की मदद से बिजली उत्पादन शुरू करने की बात कही थी, लेकिन अब योजना का पता ही नहीं है।
पहाड़ी अंचलों में छोटी-छोटी नदियों और खड्डों के किनारे बने इन घराटों में पिसे हुए गेहूं, मंडुआ, जौ, मक्की और रामदाना के आटे की बाजार में भारी डिमांड रहती है। ऐसे में इन पारंपरिक घराटों को जहां उच्चीकृत कर उनकी पिसाई क्षमता बढ़ाने की जरूरत थी। वहां यह घराट आपदा के बाद से अब तक पुनर्जीवित नहीं हो सके हैं। आपदा में यह घराट भी बह गए। अमलावा नदी में सेवना के पास घराट चलाने वाले दौलतू, चरगाड़ खड्ड स्थित घराट के स्वामी कल सिंह और हईया स्थित घराट के स्वामी गुमान सिंह, भज्जू आदि का कहना है कि आपदा ने उनसे उनकी रोजी-रोटी छिन ली। लेकिन इसके बाद सरकार ने भी हमारी कोई सुध नहीं ली। आज घराट बंद होने के बाद वह रोजी-रोटी के लिए मजदूरी पर निर्भर हो कर रह गए हैं। पूर्व में यह घराट पर्यटकों को भी खासा लुभाते थे। वर्ष 2013 में आई आपदा के बाद से अमलावा, मोकाडखड्ड, चरगाड़ खड्ड, सैलीगाड, तारलीगाड, सुइनाड़ खड्ड, अच्छेड़पुल, जामुवा, अस्टी खड्, सिलिया खड्ड समेत कई गाड-गदेरों में बने घराट क्षतिग्रस्त पड़े हुए हैं।
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ब्यूरो/अमर उजाला/विकासनगर/साहिया।
एक ओर प्रदेश सरकार पहाड़ी अंचलों में स्थित घराटों को पर्यटन से जोड़ने की बात कर रही है वहीं, जनजातीय क्षेत्र जौनसार बावर में करीब 96 ऐसे घराट हैं जो वर्ष 2013 में आई आपदा के बाद से अब तक पुनर्जीवित नहीं हो सके हैं। इन घराटों के सहारे जीवन गुजर-बसर करने वाले लोग आज मजदूरी कर पेट पालने को मजबूर हो गए हैं। दो साल पूर्व अक्षय ऊर्जा विकास अभिकरण (उरेडा) ने इन घराटों को उच्चीकृत कर लोगों को रोजगार देने के साथ ही इन घराटों की मदद से बिजली उत्पादन शुरू करने की बात कही थी, लेकिन अब योजना का पता ही नहीं है।
पहाड़ी अंचलों में छोटी-छोटी नदियों और खड्डों के किनारे बने इन घराटों में पिसे हुए गेहूं, मंडुआ, जौ, मक्की और रामदाना के आटे की बाजार में भारी डिमांड रहती है। ऐसे में इन पारंपरिक घराटों को जहां उच्चीकृत कर उनकी पिसाई क्षमता बढ़ाने की जरूरत थी। वहां यह घराट आपदा के बाद से अब तक पुनर्जीवित नहीं हो सके हैं। आपदा में यह घराट भी बह गए। अमलावा नदी में सेवना के पास घराट चलाने वाले दौलतू, चरगाड़ खड्ड स्थित घराट के स्वामी कल सिंह और हईया स्थित घराट के स्वामी गुमान सिंह, भज्जू आदि का कहना है कि आपदा ने उनसे उनकी रोजी-रोटी छिन ली। लेकिन इसके बाद सरकार ने भी हमारी कोई सुध नहीं ली। आज घराट बंद होने के बाद वह रोजी-रोटी के लिए मजदूरी पर निर्भर हो कर रह गए हैं। पूर्व में यह घराट पर्यटकों को भी खासा लुभाते थे। वर्ष 2013 में आई आपदा के बाद से अमलावा, मोकाडखड्ड, चरगाड़ खड्ड, सैलीगाड, तारलीगाड, सुइनाड़ खड्ड, अच्छेड़पुल, जामुवा, अस्टी खड्, सिलिया खड्ड समेत कई गाड-गदेरों में बने घराट क्षतिग्रस्त पड़े हुए हैं।
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