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मटोगी में खेली गई दूध, घी और मक्खन की होली
Updated Thu, 19 Jul 2018 02:08 AM IST
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ब्यूरो/ अमर उजाला, विकासनगर।
बिन्हार के अंतिम गांव मटोगी में सावन संक्रांति पर मनाए जाने वाले कुफ्फू पर्व में आस्था और लोक संस्कृति का अद्भुत संगम देखने को मिला। लोगों ने ढोल-नगाड़ों की थाप पर दूध और मक्खन की होली खेली। इससे पूर्व कुफ्फू देवता के प्रतीक (व्यक्ति) का अनाज की बालियों और हरे पत्तों से शृंगार किया गया। इसके बाद देव प्रतीक ने पूरे गांव की परिक्रमा की। अंत में गांव स्थित बावड़ी में भद्रराज देवता का पूजन कर होली का शुभारंभ हुआ। इस मौके पर कृष्णा देवी, महादेई, सेमानी, मीमू देवी, शर्मिला, सुनीता तोरम, छाया, पूजा, रूचि, स्वराज सिंह, मातवर सिंह, श्रीपाल सिंह, गीतम, महिपाल, योगेंद्र तोमर, कैलाश आदि मौजूद रहे।
पर्यटन एवं सांस्कृतिक विकास समिति मटोगी के अध्यक्ष संजीत तोमर ने बताया कि मटोगी से लेकर मसूरी तक के रास्ते में कहीं भी प्राकृतिक जलस्रोत नहीं हैं। किवदंती के अनुसार इस रास्ते से गुजरने वाले राहगीरों की परेशानी को देखते हुए भद्रराज देवता ने मटोगी में अपनी शक्ति से बावड़ी प्रकट की। इस बावड़ी की खासियत यह है कि इसमें 12 महीने जल का स्तर एक समान रहता है। भद्रराज देवता के आदेश पर ही गांव में खुशहाली के लिए कुफ्फू पर्व मनाया जाता है।
अनाज के देवता हैं कुफ्फू
कुफ्फू देवता को अनाज से जुड़ा देवता माना गया है। बालियों से कुफ्फू देवता के शृंगार करने के पीछे धारणा यह है कि इससे गांव में अन्न का उत्पादन प्रचुर मात्रा में होगा, जबकि हरी पत्तियों से शृंगार करने में मानव के प्रकृति से जुड़े रहने की अवधारणा निहित है। पर्व का समापन बावड़ी की घी और मक्खन से पूजन के साथ होता है। इसके बाद मक्खन, दूध और घी से होली खेली जाती है। इसका कारण गांव में आर्थिक संपन्नता बने रहने की धारणा छिपी है।
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बिन्हार के अंतिम गांव मटोगी में सावन संक्रांति पर मनाए जाने वाले कुफ्फू पर्व में आस्था और लोक संस्कृति का अद्भुत संगम देखने को मिला। लोगों ने ढोल-नगाड़ों की थाप पर दूध और मक्खन की होली खेली। इससे पूर्व कुफ्फू देवता के प्रतीक (व्यक्ति) का अनाज की बालियों और हरे पत्तों से शृंगार किया गया। इसके बाद देव प्रतीक ने पूरे गांव की परिक्रमा की। अंत में गांव स्थित बावड़ी में भद्रराज देवता का पूजन कर होली का शुभारंभ हुआ। इस मौके पर कृष्णा देवी, महादेई, सेमानी, मीमू देवी, शर्मिला, सुनीता तोरम, छाया, पूजा, रूचि, स्वराज सिंह, मातवर सिंह, श्रीपाल सिंह, गीतम, महिपाल, योगेंद्र तोमर, कैलाश आदि मौजूद रहे।
पर्यटन एवं सांस्कृतिक विकास समिति मटोगी के अध्यक्ष संजीत तोमर ने बताया कि मटोगी से लेकर मसूरी तक के रास्ते में कहीं भी प्राकृतिक जलस्रोत नहीं हैं। किवदंती के अनुसार इस रास्ते से गुजरने वाले राहगीरों की परेशानी को देखते हुए भद्रराज देवता ने मटोगी में अपनी शक्ति से बावड़ी प्रकट की। इस बावड़ी की खासियत यह है कि इसमें 12 महीने जल का स्तर एक समान रहता है। भद्रराज देवता के आदेश पर ही गांव में खुशहाली के लिए कुफ्फू पर्व मनाया जाता है।
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अनाज के देवता हैं कुफ्फू
कुफ्फू देवता को अनाज से जुड़ा देवता माना गया है। बालियों से कुफ्फू देवता के शृंगार करने के पीछे धारणा यह है कि इससे गांव में अन्न का उत्पादन प्रचुर मात्रा में होगा, जबकि हरी पत्तियों से शृंगार करने में मानव के प्रकृति से जुड़े रहने की अवधारणा निहित है। पर्व का समापन बावड़ी की घी और मक्खन से पूजन के साथ होता है। इसके बाद मक्खन, दूध और घी से होली खेली जाती है। इसका कारण गांव में आर्थिक संपन्नता बने रहने की धारणा छिपी है।
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