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गैरसैंण के लिए लड़ रहा है बनारस का छोरा
Updated Sun, 25 Feb 2018 11:00 PM IST
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महेश जुयाल
गैरसैंण। पिछले 24 सालों से राज्य आंदोलन की भावना रही गैरसैंण को पहचान दिलाए जाने के लिए बनारस का छोरा (प्रवीण सिंह) लड़ाई लड़ रहा है। प्रवीण यहां पिछले चार दिन से गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाए जाने की मांग को लेकर आमरण अनशन पर है। यही नहीं प्रवीण सिंह शीतकालीन सत्र के दौरान सात दिसंबर से भी गैरसैंण के रामलीला मैदान में अपने चार अन्य साथियों के साथ अनशन पर बैठे थे। उन्हें प्रशासन ने 11 दिसंबर को उठाकर पहले गैरसैंण अस्पताल और फिर श्रीनगर के बाद देहरादून रेफर कर दिया था।
बनारस के जेपी कॉलोनी में रहने वाले प्रवीण सिंह का कहना है कि पिछले साल बदरीनाथ भ्रमण के दौरान पहाड़ के प्रति प्रेम पैदा हुआ। इस दौरान उनके (प्रवीण) के दोस्त की तबीयत खराब हुई। उन्हें एम्स ऋषिकेश ले जाया गया, लेकिन तय दामों से अधिक शुल्क वसूलने से एम्स में आंदोलन करना पड़ा। हालांकि आंदोलन के बाद एमस प्रशासन ने तय शुल्क ही लिए, लेकिन लोगों के पैसे वापस दिलाने के नैनीताल हाईकोर्ट जाना पड़ा। यहां वरिष्ठ अधिवक्ता डीके जोशी, उत्तराखंड अधिवक्ता संघ के अध्यक्ष, गोबिंद भंडारी तथा नैनीताल समाचार के संपादक राजीव लोचन शाह, दयाकृष्ण कांडपाल, उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी के अध्यक्ष पीसी तिवारी से मुलाकात पर गैरसैंण के बारे में जाना। राज्य आंदोलन में गैरसैंण की मुख्य भूमिका होने के बावजूद गैरसैंण की उपेक्षा सरकारों द्वारा की गई। इसके लिए प्रवीण सिंह ने सात दिसंबर से गैरसैंण में राइट टू हेल्थ के तहत आंदोलन शुरू किया। नतीजा हुआ कि राइट टू हेल्थ के सदस्यों को प्रशासन द्वारा उठाने के बाद यहां आंदोलन की नींव पड़ गई। प्रवीण सिंह का कहना है कि गैरसैंण ही इस पहाड़ी प्रदेश की परिकल्पना को सार्थक कर सकता है। दर्शनशास्त्र के छात्र रहे प्रवीण सिंह ने कहा कि जब तक प्रदेश की राजधानी घोषित करने के मामले में प्रदेश सरकार कोई कार्रवाई नहीं करेगी, तब तक समिति के साथ मिलकर आंदोलन जारी रहेगा।
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गैरसैंण। पिछले 24 सालों से राज्य आंदोलन की भावना रही गैरसैंण को पहचान दिलाए जाने के लिए बनारस का छोरा (प्रवीण सिंह) लड़ाई लड़ रहा है। प्रवीण यहां पिछले चार दिन से गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाए जाने की मांग को लेकर आमरण अनशन पर है। यही नहीं प्रवीण सिंह शीतकालीन सत्र के दौरान सात दिसंबर से भी गैरसैंण के रामलीला मैदान में अपने चार अन्य साथियों के साथ अनशन पर बैठे थे। उन्हें प्रशासन ने 11 दिसंबर को उठाकर पहले गैरसैंण अस्पताल और फिर श्रीनगर के बाद देहरादून रेफर कर दिया था।
बनारस के जेपी कॉलोनी में रहने वाले प्रवीण सिंह का कहना है कि पिछले साल बदरीनाथ भ्रमण के दौरान पहाड़ के प्रति प्रेम पैदा हुआ। इस दौरान उनके (प्रवीण) के दोस्त की तबीयत खराब हुई। उन्हें एम्स ऋषिकेश ले जाया गया, लेकिन तय दामों से अधिक शुल्क वसूलने से एम्स में आंदोलन करना पड़ा। हालांकि आंदोलन के बाद एमस प्रशासन ने तय शुल्क ही लिए, लेकिन लोगों के पैसे वापस दिलाने के नैनीताल हाईकोर्ट जाना पड़ा। यहां वरिष्ठ अधिवक्ता डीके जोशी, उत्तराखंड अधिवक्ता संघ के अध्यक्ष, गोबिंद भंडारी तथा नैनीताल समाचार के संपादक राजीव लोचन शाह, दयाकृष्ण कांडपाल, उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी के अध्यक्ष पीसी तिवारी से मुलाकात पर गैरसैंण के बारे में जाना। राज्य आंदोलन में गैरसैंण की मुख्य भूमिका होने के बावजूद गैरसैंण की उपेक्षा सरकारों द्वारा की गई। इसके लिए प्रवीण सिंह ने सात दिसंबर से गैरसैंण में राइट टू हेल्थ के तहत आंदोलन शुरू किया। नतीजा हुआ कि राइट टू हेल्थ के सदस्यों को प्रशासन द्वारा उठाने के बाद यहां आंदोलन की नींव पड़ गई। प्रवीण सिंह का कहना है कि गैरसैंण ही इस पहाड़ी प्रदेश की परिकल्पना को सार्थक कर सकता है। दर्शनशास्त्र के छात्र रहे प्रवीण सिंह ने कहा कि जब तक प्रदेश की राजधानी घोषित करने के मामले में प्रदेश सरकार कोई कार्रवाई नहीं करेगी, तब तक समिति के साथ मिलकर आंदोलन जारी रहेगा।
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