जश्न-ए-आजादी के लिए गुलजार हुए सरहद के गांव
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चमोली जिले में भारत-तिब्बत सीमा पर स्थित नीती घाटी में जश्न ए आजादी की तैयारियां पूरी हो चुकी हैं। अपने पैतृक गांवों में आजादी का जश्न मनाने के लिए कई प्रवासी ग्रामीण भी घाटी को लौट आए हैं।
नीती घाटी के गमशाली, नीती, बांपा, फरकिया, जुम्मा, मलारी, द्रोणागिरी, मेहरगांव और कैलाशपुर गांवों में भोटिया जनजाति के ग्रामीण निवास करते हैं।
बुनियादी सुविधाओं के अभाव में नीती घाटी से साल-दर-साल पलायन हो रहा है। युवा वर्ग रोजगार की चाह में बाहरी क्षेत्रों का रुख कर रहे हैं लेकिन बावजूद इसके आजादी का जश्न मनाने के लिए ये प्रवासी अपने घर आना नहीं भूलते।
बांपा के महेंद्र और रमेश का कहना है कि वे दिल्ली में एक साफ्टवेयर कंपनी में कार्यरत हैं, लेकिन अपने पैतृक गांव में स्वतंत्रता दिवस मनाने आना नहीं भूलते हैं। स्वतंत्रता दिवस के मौके पर महिला मंगल दल और युवक मंगल दल द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाएंगे।
महरंगाव की पूर्व प्रधान गुड्डी देवी का कहना है कि सरहद क्षेत्र में आजादी का जश्न मनाने की सभी तैयारियां पूरी कर दी गई हैं। बाहरी क्षेत्रों में रहने वाले गांव के कई लोग अपने घरों को लौट आए हैं।
सरहद पर कुछ यूं मनाते हैं स्वतंत्रता दिवस
घाटी के सभी ग्रामीण पहले अपने-अपने गांवों में ध्वजारोहण के बाद दंपूधार नामक स्थान में अपनी पारंपरिक वेशभूषा में प्रभात फेरी आयोजित करते हैं। दंपूधार पहुंचने के बाद आईटीबीपी के जवानों के साथ यहां ध्वजारोहण कर मिष्ठान वितरण किया जाता है।
तिब्बत से आए थे तिरंगा फहराने
आजादी के वक्त तिब्बत से घाटी का व्यापार होता था। 15 अगस्त को रेडियो पर देश आजादी की सूचना मिलते ही कई ग्रामीण व्यापार छोड़कर तिब्बत से खुशी मनाते हुए नीती घाटी के गमशाली गांव पहुंचे।
यहां ग्रामीणों ने आजाद भारत में तिरंगा फहराकर अपनी खुशी का इजहार किया। तभी से गांव के ग्रामीण स्वतंत्रता दिवस को आज भी त्यौहर के रुप में मनाते आ रहे हैं।
पूर्व विधायक का है कहना
नीती घाटी के ग्रामीण आज भी स्वतंत्रता दिवस को त्यौहार के रुप में मनाते हैं। ग्रामीण देश की अखंडता को बनाए रखने का संकल्प भी लेते हैं और मांग करते हैं कि चीन के प्रभाव से जो व्यापार समाप्त हुआ है, भारत सरकार इस ओर सकारात्मक कार्रवाई कर सीमा क्षेत्र के गांवों को फिर से आबाद करे।
-केदार सिंह फोनिया, पूर्व विधायक, बदरीनाथ क्षेत्र।