{"_id":"5738027c4f1c1b9e12919833","slug":"illegal-marijuana-and-cannabis-cultivation-in-himachal","type":"story","status":"publish","title_hn":"ऑर्डर के हिसाब से चल रहा चरस की खेती का कारोबार","category":{"title":"Crime","title_hn":"क्राइम ","slug":"crime"}}
ऑर्डर के हिसाब से चल रहा चरस की खेती का कारोबार
ब्यूरो/अमर उजाला, शिमला
Updated Mon, 16 May 2016 05:04 PM IST
विज्ञापन
कुल्लू में भांग की खेती।
- फोटो : अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
हिमाचल में नशे की खेती का दायरा साल दर साल बढ़ता जा रहा है। यह दायरा डिमांड के हिसाब से बढ़ रहा है। सरकार इस पर अंकुश लगाने में नाकाम हो रही है। वर्तमान में प्रदेश की करीब चार प्रतिशत पंचायतें ऐसी हैं, जहां नशे की खेती जोर-शोर से चल रही है। सरकार के पास तमाम इंटेलिजेंस से लेकर सेटेलाइट मैपिंग जैसे हथियार हैं।
विज्ञापन
इनकी मदद से वह निगरानी का दावा करती हैं, लेकिन हालात यह हैं कि पांच सौ से ज्यादा गांवों में लोग सामान्य कृषि छोड़कर नशे की खेती कर रहे हैं। यह तब है, जब केंद्र से लेकर राज्य की एजेंसियां नशे के इस कारोबार और खेती पर अंकुश लगाने की कवायद कर रही हैं। सूत्रों की मानें तो सरकारी उपेक्षा और सिस्टम की ओर से सामान्य खेती पर उचित पैसा न मिलना भी नशे की खेती के बढ़ने के प्रमुख कारण हैं। सूत्र बताते हैं कि विदेशों से आने वाले सैलानियों के लिए भी हिमाचल अब यहां की सुंदरता से ज्यादा नशे के लिए आकर्षित करता है।
विज्ञापन
देशी से लेकर विदेशी वैराइटी हो रही तैयार
भांग की खेती प्रदेश में कई तरह से हो रही है। पहली होती है जंगली, जो कहीं भी लग जाते हैं। इसके अलावा दूसरी वो खेती होती है, जिसमें प्रदेश या देश के दूसरे स्थानों पर सप्लाई के लिए नशे की फसल तैयार की जाती है। इसके अलावा तीसरी पैदावार सिर्फ विदेश के लिए होती है। मलाणा जैसे अपर हिमाचल के वो इलाके, जहां पुलिस तो क्या आम लोग भी कम ही जा पाते हैं। उन इलाकों में विदेशों से लाए बीजों के जरिये नशे की फसल तैयार की जाती है।
विज्ञापन
कई तरह के नशों की धरती बन गई देवभूमि
देवभूमि कही जाने वाली हिमाचल की धरती पर अब नशे का कारोबार ज्यादा होता है। भांग की खेती से कई तरह के नशीले पदार्थ तैयार होते हैं। इनमें, भांग के पौधे के फूल से गांजा तैयार होता है, जिसे दूसरे प्रदेशों को सप्लाई किया जाता है। पौधे की पत्ती को मसलकर चरस तैयार की जाती है। इसका उपभोग हिमाचल और बाहर दोनों जगह होता है।
इसी तरह, अफीम के पौधों से भी अफीम तैयार होता है। इसके अलावा ब्राउन शुगर भी इसी से तैयार की जाती है। वहीं, आम आदमी के खाने में इस्तेमाल होने वाले पोस्ता दाना को भी अफीम के बीज से बनाया जाता है। हाल के दिनों में पंजाब से हिमाचल में प्रचलित हुए भुक्की को भी अफीम के छिलके से तैयार किया जाता है।