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सुरक्षा के लिहाज से आखिर क्यों जरूरी हुआ जम्मू-कश्मीर में राज्यपाल शासन?

Sun, 14 May 2017 12:35 PM IST
श्रेयांश त्रिपाठी/अमर उजाला/जम्मू
श्रेयांश त्रिपाठी/अमर उजाला/जम्मू Updated Sun, 14 May 2017 12:35 PM IST
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is governor rule essential in jammu and kashmir
कश्मीर में तैनात जवान - फोटो : File Photo

कश्मीर में बिगड़ते हालातों और एलओसी पर पाकिस्तान की ओर से हो रही गोलाबारी के बीच जम्मू कश्मीर एक बार फिर सुरक्षा की अनिश्चितता से जूझता दिख रहा है। बीते कुछ दिनों में कश्मीर घाटी में जिस तरह छात्र हिंसा और स्टूडेंट अनरेस्ट की स्थिति उपजी है उससे रियासत और खासकर घाटी के हालातों में सुरक्षा के नजरिए से किसी बड़े फैसले की जरूरत दिखने लगी है लेकिन इस फैसले के पहले रियासत में सियासत को माप लेना काफी अहम होगा।

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दरअसल कश्मीर में जैसे हालात हैं उसे देखकर ये लगने लगा है कि राज्य में राष्ट्रपति शासन की जरूरत स्थितियां बनने लगी हैं। इसका कारण सियासी हो न हो लेकिन सुरक्षा के नजरिए से उस वक्त की जरूरत आ गई है जबकि सत्ता और सियासत को सुरक्षा के रास्ते में बाधा बनने से रोकना होगा। 
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सुरक्षा के लिहाज से कश्मीर में तमाम एजेंसियां पत्थरबाजों पर बड़ी कार्रवाई के पक्ष में हैं। सूत्रों के मुताबिक एजेंसियों की सिफारिश है कि पत्थरबाजों की गिरफ्तारी के बाद उन्हें कश्मीर घाटी से बाहर की किसी जेल में रखा जाए।

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बड़े फैसले के लिए सियासी मजबूरियोें से दूरी की जरूरत

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महबूबा मुफ्ती व नरेंद्र मोदी - फोटो : फाइल फोटो

ऐसे में अगर ये फैसला लेना है तो इसके लिए बड़ी सियासी इच्छा शक्ति की जरूरत पड़ेगी क्योंकि पिछले दिनों ये बात देखने को मिली थी कि कई पत्थरबाजों को इस छिपी मजबूरी के कारण रिहा किया गया कि कश्मीर की राजनीतिक पार्टियों का अपना वोटबैंक बचा रह जाए। 

इसके अलावा ये भी देखने को मिला है कि कश्मीर में कट्टरवादियों के एक बड़े धड़े का गुस्सा रियासत में भारतीय जनता पार्टी और पीडीपी के बीच हुए गठबंधन के खिलाफ है। ये कट्टरवादी कई बार महबूबा पर ये आरोप लगाते रहे हैं कि महबूबा कश्मीर में एनएसए अजीत डोवाल के एजेंडे पर कार्रवाई करा रही हैं। सियासी असंतोष की इस बात का खामियाजा महबूबा को श्रीनगर के चुनावों में भी उठाना पड़ा है। 

ऐसे में ये कहा जा रहा है कि कश्मीर में सियासी पार्टियों के सरकार में न होने पर कुछ हद तक अमन बहाली की स्थितियां बहाल करने में आसानी हो सकेगी। इसके साथ ही किसी बड़े फैसले के बीच सियासी मजबूरियों वाली बाधा भी दूर हो सकेगी।

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